ग्लोबल गुमटी

इंग्लिश इस्कूल

इंग्लिश इस्कूल

इंग्लिश इस्कूल

गाँव में इंग्लिश इस्कूल तो खुल गया है पर अंगरेजी ने भी तो भारत में आकर एक नया शब्द सीख हीं लिया Caste (कास्ट)| मूल लैटिन में तो इसका अर्थ होता था शुद्ध और सबसे अलग| पुर्तगाली इसका प्रयोग एक परिवार, वंश या नस्ल के लिए करते थे| पर दुनिया भर के बंदरगाहों पे लंगर डालकर हिदुस्तान आये पुर्तगाली, हिन्दुओं की जाति व्यवस्था को देखकर अपना सारा प्राचीन लैटिन साहित्य और शब्दकोष खंगालकर भी इस व्यवस्था के लिए सही शब्द नहीं तलाश पाए तो काम चलाने के लिए caste शब्द का ही प्रयोग कर लिया| तो गाँव में इंग्लिश इस्कूल तो खुल गया है पर इस्कूल के मास्टर जी तो गाँव वालों के लिए  झा जी, तिवारी बाबा और शर्मा माटसाब ही रहेंगे| पर खबर ये नहीं, खबर ये है कि गाँव में इंग्लिश इस्कूल तो खुल गया है|

इससे क्या कि गाँव के हरिजन बच्चे सो कर उठते हैं, मुंह पर पानी मारकर क्या करना है, इससे बामन तो बन नहीं जायेंगे, आँखें मलते हुए बस्ता उठाते हैं और बिना चप्पल चल पड़ते हैं सरकारी इस्कूल| चप्पल हो तब न पहनें| और चप्पल तो इनके बाप-मतारी के पास नहीं है जिन्हें खेतों में मजदूरी करने जाना होता है तो ये कौन से लाटसाब के नाती हैं कि इस्कूल जाने के लिए चप्पल की फरमाइश करें| आखिर इस्कूल जाके मिलना क्या है? एक समय का भोजन, कभी-कभी इस्टैपन के कुछ पैसे और कभी किसी दिन गुरूजी का मन कर गया या किसी अफसर का निरीक्षण करने का मूड बन आया तो कुछ ज्ञान भी| पर गाँव में इंग्लिश इस्कूल खुल गया है|

इस गाँव के एक हरिजन ने अपने बच्चों का दाखिला इस स्कुल में करवाया है| ये आदमी शहर जाने के नाम से ही घबराता है, क्यूंकि इसे लगता है कि शहर में यह कितनी भी चालाकी से काम लेगा तो भी ठगा कर ही लौटेगा अंत में| सो इसने मुझसे आग्रह किया कि मैं उसके बच्चों की पढ़ाई के लिए सारे जरूरी सामान शहर से खरीद कर अगले दिन आते समय लेती आऊं| उस दिन लौटती हुई मैं बाजार में स्कूल के सामानों की दुकान पर चली गयी| सच उस पूरी खरीदारी के दौरान बार-बार ऐसा लगता रहा मानों मेरे अन्दर बैठा बच्चा बार-बार बाहर आने को जिद कर रहा| कभी कभी बाहर आ भी जाता, चेहरे पे| वो छोटे-बड़े, लाल-पीले, कार्टून कैरेक्टर वाले, तितली वाले डब्बे देखकर मुस्कान आ जाती, जैसे मैं अभी चहकती हुई सारे डब्बे उठा लूं| फिर डांटकर याद दिलाती खुद को, किंडर गार्डेन की विद्यार्थी नहीं, खुद एक शिक्षिका हूँ और स्कुल चला रही हूँ| अगली सुबह सब गाड़ी पर लादा और चल दी स्कुल| रास्ते में भी कुछ बच गयी खरीदारी करते हुए वो बच्चा जो कल मुझमें जगा था याद आता रहा और मैं मुस्काती रही|

पहुंचकर बच्चों को उनका सामान दिया तो वो बहुत खुश हुए| इस खुशी को देखकर एक ईर्ष्या जगी कहीं भीतर|  बड़े होकर वैसी वाली खुशी हम कभी नहीं महसूस कर सकते , चाहे कितनी ही बड़ी चीज क्यूँ न पा लें| उस सामान में एक वाटर बोटल भी था जिसमें कैप हटाते ही पाइप ऊपर आ जाता था अपने आप| ये बोटल बच्चों के अन्दर गुदगुदी पैदा कर रहा था और सबमें इसे लेकर कौतूहल था| बाकी बच्चे कोल्ड ड्रिंक या रेल नीर की उस बोतल में पानी लाते थे जो उनके दादा-दादी ने काशी जी से दर्शन कर लौटकर उन्हें दिया था|| लंच का समय हुआ, मैं बच्चों को शांत कराने में पसीने पसीने होकर इधर उधर घूम रही थी| तभी एक दृश्य देखकर ठिठक गयी| देखा तो बहुत सारे बच्चे एक साथ खड़े होकर बारी बारी से उस  जादुई बोतल से ढक्कन हटाते और पानी का एक घूँट पीकर दुसरे को बढ़ा देते| कौन नहीं मुस्करा देगा ऐसा दृश्य देखकर, पर फिर भी अगर ये वाकया अगर गाँव में ऊँची जात वालों को पता चल जाए जिनके बच्चों ने इस बोतल से पानी पीया था तो उन बच्चों के साथ साथ मेरे नए नए खुले स्कुल की  शामत आ जायेगी| पर मुझे तो कम से कम इसकी वजह पता भी होगी पर बच्चे तो बेचारे मुफ्त में पिटेंगे, बिना ये जाने कि आखिर उनका कसूर क्या था| अगर कसूर बताया भी गया तो वे कहाँ समझ पायेंगे कि उस जादुई बोतल से पानी पीना कैसे अपराध हो गया| फिर इस हिदायत के साथ छोड़ें जायेंगे कि आगे से ऐसा नहीं करना है और अपने मन में सवाल लिए ही वो भागेंगे जान लेकर| पर खतरा इसका है कि शायद बाद में बड़े होकर भी भले वो समझ न पायें कि आखिर वो कसूर क्या था पर तब भी वो सवाल नहीं करेंगे और शायद अपने बच्चों को भी वो यही समझा दें कि ऐसा करना अपराध है और इसपे सवाल करना और भी बड़ा पाप और ये सिलसिला पीढ़ियों तक चलता रहे| पर जबतक ऐसी जादुई बोतलें बनाने वाले रहेंगे, बच्चे कहाँ मानेंगे कतार में खड़े होकर एक घूँट के बाद बोतल अगले को बढ़ा देने से| अब इससे क्या फर्क पड़ता है कि बोतल किसने बढ़ाई थी और आगे किसने पकड़ी|  इंग्लिस इस्कूल का कैम्पस सब छुपा लेता है अपने में|

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