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नयी किताब – क्षितिज रॉय की गंदी बात

क्षितिज रॉय की गंदी बात

 

गंदी बात -ये उपन्यास नहीं, मगध एक्सप्रेस है जो एक दिन पटना से एक प्रेम कहानी लेकर दिल्ली आती है और फिर इसमें से प्रेम दिल्ली में कहीं खो जाता है और बस कहानी रह जाती है जो एक दिन फिर डाउन मगध एक्सप्रेस में सवार होकर एक अँधेरे में गुम हो जाती है।

दो युवा पात्रों के इर्द गिर्द बुनी गयी कथा के दोनों पात्र जीवन के या हम सबके बहुत नजदीक महसूस होते हैं। भले ही आपकी कोई डेजी LSR में हो न हो पर एक गोल्डन हमारे आपके सबके भीतर किसी न किसी अनुपात में जरूर मिल जाएगा। और यमुना किनारे, मंदिरों, घाटों, जल बोर्ड ऑफिस को पार करके एक उजाड़ मैदान के रास्ते पर जब यह प्रेम कहानी चलती है तो सबकुछ जिया जिया सा लगता है। एक ‘डेजावू’ टाइप अनुभव होता है। ये इस प्रेम कहानी का ‘रियलिज्म’ है। पर डेजी और गोल्डन की आवारा और फ़िल्मी प्रेम कहानी एक फोरग्राउंड है जिसके बैकग्राउंड में एक कैनवास चलता रहता है जिसमें दिल्ली है, दिल्ली की पॉलटिक्स है, चुनाव है और पॉलिटिकल क्राइम है। “ऑटो के भीतर अब सलमान की जगह केजरीवाल ने ले ली थी।” यही कैनवास इस उपन्यास को आजकल ट्रेंड में चल रहे समकालीन शहरी प्रेम कहानियों से अलग करता है
इसका रियालिज्म गढ़ने में इसकी भाषा बहुत साथ देती है। उपन्यास की पृष्ठभूमि, कहानी और पात्रों के अनुरूप इसके लिए एक नयी भाषा गढ़ने और उसे पूरे उपन्यास के दौरान मेंटेन रखने में बहुत मेहनत की गयी है। ये भाषा बोल चाल में तो सामान्यतः चलन में रही है पर इस बार साहित्य में इसका सधा हुआ प्रयोग किया गया है। प्रभावस्वरूप कहानी और पात्र दोनों पाठक के और नजदीक पहुँचते हैं।
हल्के फुल्के तेवर में चलती हुई कहानी में कई जगह किसी पैराग्राफ के बीच या अंत में कोई ऐसी लाइन आ जाती है कि आप किताब के उस पन्ने में उंगली फंसाकर उसे बंद करके, होठों पे एक हतप्रभ मुस्कान लिए सोचते रह जाते हैं। कुछ बानगी देखिये – “पंखा मुल्क की सरकारों की तरह चलने का भरम टाइप फील दे रहा था”

“छोटे शहरों का कस्बाई प्यार बुनियादी तौर पे हिंसक ही होता है। हिंसा ही वो बुनियाद है जिसपे कस्बाई प्यार पनपते हैं। जिस किसी महानुभाव को ऐसा लगता कि कस्बों का रोमांस छुपमछुपाई करते हुए की गयी दिल्लगी है – या तो उन्हें क़स्बा समझ नहीं आता या फिर इश्क या फिर दोनों।”

इन पंक्तियों से ही उपन्यास के तेवर और क्राफ्ट का थोड़ा बहुत अंदाजा मिल जाता है।
अपने अंत की तरफ बढ़ते हुए उपन्यास किसी थ्रिलर की तरह महसूस होने लगता है। और एक पत्र की शैली में भी इस थ्रिल और रोमांच को पूरी शिद्दत से परोस सकने में क्षितिज कामयाब रहा है। गोल्डन का आख़िरी खत तो एक इंटेंस पॉलिटिकल क्राइम स्टेटमेंट बन गया है। पर गौरतलब बात यह है कि है यह फिर भी ये एक प्रेमपत्र ही।

 

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