ग्लोबल गुमटी

रेलगाड़ी..एक दिन का घर

रेलगाड़ी..एक दिन का घर

“रेलगाड़ी” मेरे जीवन मेँ एक शिक्षक,एक संस्थान,एक गाईड की तरह है। मैँने न जाने देश दुनिया के कितने रंग इसी रेलगाड़ी मेँ देखे और न जाने कितनी बातेँ जानी सीखी और न जाने कितने दर्शन समझे।मैँ खोरठा बोलने वाला झारखंडी खाली रेल चढ़ चढ़ कर मैँने मागधी, मैथिली, बांग्ला, अंगिका, भोजपुरी, मारवाड़ी, छत्तीसगढ़ी और मोटा मोटी पंजाबी टाईप जैसी कई तो भाषाएँ सीख ली।

कहीँ जाऊँ ना जाऊँ पर दिल्ली हावड़ा करते करते ही उत्तर दक्षिण-पुरब पश्चिम पुरे भारत का रंग ढंग साईड अपर सीट पर बैठे बैठे देख लिया।अब देखिए न रेल क्या क्या सिखाता और कर के दिखाता है।

एक छोटी घटना देखिए। अभी घर को जा रहा था। रेल मेँ एक परिवार साथ साथ सफर मेँ था। रात को जब पति पत्नी बच्चे सब खाना निकाल बाँट खाने लगे तो एहसास हुआ कि “एक रेलगाड़ी ही ऐसी जगह है जहाँ एक मध्यम वर्गीय शहरभोगी भारतीय परिवार अपने पुरे सगे-सदस्योँ के साथ बैठ के सुकुन के साथ खाना खाता है”। ना कोई हड़बड़ी ना कोई फोन ना जल्दी जल्दी खा के काम को भागने की टेँशन। नही तो देखिये न साहब एक शहरी “मीडिल खलास” (क्लास) परिवार की दिनचर्या।सुबह 6 बजे बच्चा उठ जाता है,मम्मी पहले हड़बड़ हड़बड़ बुतरूआ को जैसे तैसे पोँछ कपड़ा पहिना तैयार करती है, फिर बेचारी बिना मुँह धोये बिना नहाये दौड़ी किचन जाती है,बच्चे का नाश्ता खाना पैक किया, एक हाथ मेँ सेँडविच और दुसरे मेँ एप्पल थमा स्कुल बस तक छोड़ आयी। इधर बच्चे को छोड़ आई कि 7.30 तक बच्चे के पापा जग गये,पेपर पढ़ते हुए चाय पिया, जल्दी जल्दी नहाया फिर अकेले टेबल पर पत्नी ने नाश्ता कराया और निकल गये काम पर। तब जा के पत्नी नहाई और अकेले दिन का खाना खाया। 3 बजे बच्चे स्कुल से आये,माँ ने खाना गर्म कर बच्चे को खिलाया। शाम को थका हारा पति आया! अकेला टीवी देखता हुआ चाय पिया। तब तक बच्चे खेल कुद के आये। जल्दी खा के पढ़ने बैठे और सो गये। तब तक पापा को भुख लगी। पत्नी किचन से गर्म गर्म रोटी सीधे निकाल खिलाई,पति भी गया फिर सोने, अंत मेँ थरिया कढ़ाही समेट 10.30 तक पत्नी ने खाना खाया। मतलब शायद ही कोई ऐसी तारिख हो जब पुरा परिवार एक साथ तीन टाइम खाना खा पाये। पर भारतीय रेल जिँदाबाद। 8 बजे थे कि सीट के नीचे से झोला निकाला,डब्बे से पुड़ी निकाला, प्लेट मेँ आलु गोभी का भुजिया। तब तक मेँ पति ने कहा”पीला वाला पॉलिथिन किधर रखी हो, उसमेँ अँचार होगा निकालो”! इतने मेँ अपर सीट से पलटु उछल के नीचे आया “पापा हमुँ खायेँगेँ”! मम्मी ने तब तक कहा “चलो रिँकीँ को जगाओ”। इतने मेँ पत्नी ने लाल डिब्बा निकाला” ऐ जी एगो पेड़वा ले लिजिए नय त फेर खराबे न होगा”! पति ने एक पेड़ा उठाया,दो पुड़ी अपनी से ले पत्नी की तरफ सरका दिया। इधर पल्टु चिल्लाया”मम्मी तीता लगा.बाप रे पानी दो,नय पापा पेप्सी”। “चुप माजा रखा है पीयो पहले” तुरंत निकाल दिया मम्मी ने।पेपर बिछा है,पुरा परिवार एक साथ हिचक लटक के चलती ट्रेन मेँ जिँदगी का सबसे सुकुन वाला डिनर कर रहा है।

रेल अगर 10-20 घंटे लेट है तो क्या साहब।एक शानदार यादगार डिनर और बन जाता है। सच रेल को घर मान कर केवल भारतीय ही यात्रा करता है और रेल को घर बना कर उसके साथ कुछ भी केवल भारतीय ही करता है साहब। एक भारतीय ही है जो ये कतई नहीँ सोचता कि वो एक 10-20 घंटे के सफर का एक यात्री भर है और किराया दे के चढ़ा है फिर अपने स्टेशन उतर जायेगा, वो अपनी सीट से इतने भावनात्मक रूप से जुड़ जाता है कि जैसे वो सीट उसने बड़का बाबू से हिस्सा कर कोर्ट मेँ केस कर जीत के पाया है । “भारतीय रेल” की बात…हजारोँ बातेँ हैँ। एक एक कर जो देखा समझा सुनाता रहुँगा कभी कभार जी।

सच रेल कितनी भी लेट पहुँचे पर भारतीय रेल मेँ जीवन बड़े गति मेँ होता है साहब। जय हो

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