ग्लोबल गुमटी

होली

होली तो होती थी हमारे ज़माने में हमारे पांडेपुर में.. एकदम टन-टन होली

                                                  आजकल की होली

आजकल की होली भी कोई होली है, एक होली मिलन का गेट टूगेदर होता है , टीका लगाया जाता  है, डीजे वाले बाबू गाना बजाते हैं ” मैं तो तंदूरी मुर्गी हूँ यार , गटका ले ज़रा अल्कोहल से” और सब अंग्रेजी में “Happy Holi” कह कर happy हो जाते हैं।

ये भी कोई होली हुई भला, होली तो होती थी हमारे ज़माने में हमारे पांडेपुर में। एकदम तन तन होली और होली तो खेलते हैं मोहल्ले के लौंडे, लफूट आशिक जो अपनी अपनी औकात के और उस लफूटाई वाले गैंग में अपने स्टेटस के हिसाब से अपनी आइटम और दूसरों की भाभीजी चुन लेते हैं ।वैसे ये पूरा मामला घोर understanding वाला और बाउसूल होता है  ।भाभी को पूरी इज्ज़त दी जाती है और मज़ाल है कि दूसरेमौहल्ले का कोई छोरा भाभीजी पर नज़र भी लगा दे।

आते हैं उस होली पर, आशिकों वाली होली पर. जब रंग से लाल, नीले पीले हुए लड़के, ग्रीज़ पोते सब एक से नज़र आते थे।पर अपनी वाली के घर भी जाना था, उसे रंग लगाने। होली का यही फायदा है कि उसके पापा जो वैसे तो चौधरी बने फिरते हैं आज किसी को रोक न पायेंगे क्यूंकि आज तो “बुरा न मानो होली है “। पिछली बार उसने जो ख़त भिजवाया था मोहल्ले के आशिकों के पोस्टमैन “बबलू” से , उसमें कहा था कि होली के दिन रंग लगाओ तब जाकर  हम मानें कि मोहब्बत सच्ची है तुम्हारी।

एक तो मोहब्बत पर चैलेंज उस पर उसका “तब जाकर हम जानें” वाला अंदाज़, होली पर रंग लगाना तो था ही।अब चाहे इसके लिये चौधरी पापा से कुटाई ही क्यूँ न हो जाये। हाँ तो ऐसी होती थी भाई पांडेपुर की होली.चेहरे को पूरा ढँक कर हम पहुंचे  थे होली मिलन के लिये उनके घर।पापा जी के चरण स्पर्श किया और विश किया ” हैप्पी होली अंकल जी “।

पापा जी – आओ आओ बच्चों (सोचते हुये कि ये किसके बच्चे हैं) ……….आवाज़ लगते हुये ” अरे कुछ नाश्ता वाश्ता ले कर आओ “।

और सीन में एंट्री होती है होली की हीरोइन ,हमारी हीरोइन की…………….और बैकग्राउंड में ” जोगी जी प्रेम का रोग लगा हमको, अब इसकी दवा कोई हो तो कहो ” गाना बिना किसी के बजाए हीं बजने लगता है।

हाथ में ट्रे लेकर हमारी हीरोइन आती है , मुस्कराहट को छिपाते हुए।

हम सब ” हैप्पी होली आपको ” , टीका लगते हुये .हम सभी बारी बारी से टीका लगते हैं मैडम को और चौधरी साहेब कुछ नहीं कह पाते क्यूंकि आज तो “बुरा न मानो, होली है “।

इस रंग लगाने का हैंगओवर दो दिन तक नहीं जाता तब भी जब भांग उतर जाती है।

वहां घर में चौधरी साहब सोच रहे हैं कि ये लड़के किसके घर से आये हैं और चौधरानी जी बैकग्राउंड में कोस रही हैं अपने पति को ” अब हर किसी को दही बड़े खिलने कि क्या जरुरत है, कोई आया नहीं कि अरे दही बड़े खिलाओ बच्चों को।

वो भी एक होली थी, चुराकर मुस्कराहट रंगने वाली आशिकों की होली।

और ये भी कोई होली होती है ,गेट टुगेदर वाली save water वाली होली।

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