ग्लोबल गुमटी

अँचार का आचार

अँचार का आचार

 

अहा “अँचार “.. नाम सुनते ही दाँत सिलसिलाने लगता है और मुँह मेँ इतना पानी भर जाता है कि मानो मुँह मेँ पाताल कुँआ फूट पड़ा हो। अभी गर्मीयोँ का मौसम है और अभी अँचार बनने का सबसे माकुल समय होता है जब आम अपने किशोरावस्था मेँ होता है, कटहल जवानी पर होता है साथ ही नीँबु, हरी मिर्च, बड़का लाल मिर्च, अदरख इत्यादि तो हमेशा तैयार ही रहते हैँ अँचार बनने को, असल मेँ मई जून की धुप मेँ अँचार बढ़िया से गलता भी है और सुखता भी है, ऊपर से गर्मी के मौसम मेँ खटाई पीने खाने का एक अलग ही मजा है।

अच्छा अँचार पर पोस्ट युँ ही नहीँ लिख रहा, असल मेँ ये अँचार है ही इतना अद्भुत के क्या कहुँ!  कल जब अपने मित्र शर्देन्दु जी के यहाँ अँचार खा रहा था के अचानक अँचार के सारे चटख मटक फलक खुलने लगे। मैनेँ महसुस किया के आप चाहे देश के किसी कोने का बना अँचार खाइए पर अँचार का स्वाद एक सा होता है। ये अँचार मामुली खाद्य एक्सेसीरीज भर नहीँ है बल्कि विविधताओँ से बने भारत के साँस्कृतिक समन्वयता का सबसे नायाब संकेतक है। मैनेँ जोधपुर की एक धर्मबहन से राजस्थान की बनी अँचार खायी,  एक बार अपने मित्र अब्बास मेँहदी जी के घर अकबरपुर मेँ अँचार खायी, अमित शाह के आतंक वाले आजमगढ़ की अँचार भी खिलाई मित्र गोविँद जी ने, मेरा उड़ीसा का रूम पार्टनर था उसी मित्र केशव की लाई अँचार खायी, बेँगलुरू से भाई ने वहाँ की अँचार चखाई और अपने एक कश्मीरी खान मित्र के यहाँ की अँचार चखाई, दिल्ली का अँचार तो हर शनिवार खरीद खा रहा हुँ,  साहब सारे जगह का अँचार खाया पर स्वाद एक सा पाया।

अपने चरित्र मेँ इतना प्योर भारतीय केवल अँचार ही हो सकता है कि उत्तर हो या दक्षिण, पूर्व या पश्चिम ,चाहे किसी भी जाति,धर्म,या प्रदेश मेँ भिन्न भिन्न मसालोँ से भले बने पर जब वो अँचार बनता है तो बस खाँटी “हिन्दुस्तानी” बनता है। जिस तरह लिखित संविधान के रूप मेँ एकल नागरिकता, एकल न्यायपालिका जैसे प्रबंधन और प्रावधान देश को एक सशक्त अखंड भारत के रूप मेँ स्थापित करते हैँ वैसे अलिखित रूप मेँ “एकल अँचार स्वाद”  हमारी साँस्कृतिक एकता को बड़े भावुक बंधन मेँ बाँधता प्रतित होता है। पुरे देश को एक स्वाद मेँ पिरोने वाला अँचार भारत की एकल संस्कृति का वाहक है। आप दुनिया के नक्शे पर कहीँ भी बैठ अँचार का डिब्बा खोलिये, उसकी महक बता देगी के किसी भारतीय माँ के हाथोँ की बनी अँचार है ये। अँचार का गजबे जलवा है, घर मेँ मेहमान आयेँ हो तो जब तक थाली मेँ खट्टा अँचार ना सजाया तो लगता ही नहीँ के रिश्ते मेँ मिठास है, भला बिना अँचार कोय खाना होता है क्या, जितना प्यारा मेहमान उतने प्रकार का अँचार थाली मेँ।

अच्छा अँचार का लोकताँत्रिक चरित्र देखिये, चाहे गाँव के जमीँदार होँ या खेत का मजदुर सबके साथ बड़े मजे मेँ निभा देता है ये अँचार। जमीँदार गजराज बाबु की थाली मेँ जा उनके भोजन को खास बना देता है, उनके घर का चाकर फूचन बता रहा था ” बाप रे खान पान के रहीसी त ठाकुर साहब के देखेँ, बिना तीन तरह के अँचार लिये खाना नहीँ खाते हैँ कबो”! दुसरी तरफ ये अँचार गाँव के किसान गिरधर मड़ैया के साथ भी खड़ा हो उसे ढाँढस देता है, खुद गिरधर कहता है “का करीँ, अब तरकारी सब्जी रोज खाइल इ मँहगाईँ मेँ जुलुम है सो रोटी अँचार खा दिन काट लेते हैँ”। वाह रे अँचार, ये है अँचार का रेँज, ऊपर से ले के नीचे तक सबके साथ पुरी आत्मियता के साथ खड़ा है अँचार, जहाँ जैसी भुमिका मिली वैसा निभा दिया बिना किसी ना नुकुर।

समाज मेँ शांति बहाल करने मेँ भी योगदान दे देता है कभी कभी, शराब पी के कोई उपद्रव कर रहा हो बस थोड़ा अँचार चटा दीजिए नशा उतर जाता है, ऐसा डाक्टरी हुनर भी रखता है ये अँचार। इसका पारिवारिक दायित्व देखिये के जब आपके आँगन खुशियाँ आने वाली हो और आपकी गोद भरने वाली हो तो यही अँचार खाने की इच्छा के रूप मेँ एक शुभ शगुण वाले लक्षण और संकेत के रूप मेँ प्रकट होता है। जनता की सेवा के लिये किसी से भी बिना शर्त सार्थक गठबंधन धर्म निभाना भी कोई अँचार से सीखे। जी नुक्कड़ पर बिक रहा पराठा हो तो अँचार वहाँ साथ दे के जले महके पराठे का बेड़ा पार करवा देता है, आप शनि शांति की खिचड़ी खा रहे होँ तो वहाँ खिचड़ी से यारी निभा आपका शनिवार चटख बना डालेगा, रेल का सफर हो तब पुड़ी के साथ अँचार ही आपकी खाद्य सुरक्षा का आधार होता है, चुड़ा पोहा मुरमुरे सबको सपोर्ट करता है, गर्मी मेँ पानी भात मेँ मिल के उसे चाट जैसा चटकामृत कर देगा, बड़े रेस्तराँ मेँ बैठिये तो पहले खुद आ जायेगा टेबुल पर और जितनी देर मेँ आपका आर्डर आयेगा उतनी देर चट खट कर आपकी जीभ का मन बहलायेगा। सच बताईए है कोई अँचार जैसा समर्पित और फ़िट।

अँचार बनना खेल नहीँ, अपने बनने से लेकर खाने तक का सफर किसी तपस्वी के सफर की तरह होता है साहब। कच्ची उम्र मेँ टुटना, टुकड़ो मेँ कटना, तेल मसालोँ मेँ मिलना, धुप मेँ गलना, सुखना तब मर्तबान मेँ सजना और फिर परोसा जाना। देश मेँ चुनाव खतम हो चुके हैँ, आचार संहिता खतम हो चुकी है, काश अँचार का आचार आदमी अपना ले और अँचार संहिता लागु कर ले, कितना लचीला, कितना समन्वयी, मिलनसार, उदार, सबके साथ चलने वाला, लोकतांत्रिक अँचार की तरह। पर मालुम है अँचार बनाना आसान है, पर  “अँचार बनना”  मुश्किल है साहब, उसकी खातिर तपस्वी होना होगा। सो जाने दीजिए, आईये हम बस अँचार लगायेँ, आम का, कटहल का, दर्शन का, बुध्द महावीर से लेकर गाँधी के विचारोँ का…। देखना है, अबकी बार… कौन सा अँचार। जय हो।

 

नीलोत्पल मृणाल

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