ग्लोबल गुमटी

एक पाती अंजलि सचिन तेंदुलकर के नाम…

एक पाती अंजलि सचिन तेंदुलकर के नाम..

आदरणीया अंजलि कितना भारी-भरकम शब्द है न ये आदरणीया ? ऐसा लगता है जैसे स्नैच, क्लीन और जर्क शैलियों का वज़न एकसाथ उठा लिया गया हो … पर क्या करूँ, आपके किये को हल्के में ले भी तो नहीं सकता … आपका किया कराया मेरे जैसे न जाने कितनों के साथ करीब दो दशकों तक ऐसे साथ रहा कि उंसके बारे में कुछ भी कहना शुरू कैसे करना है नहीं पता … पता होगा भी कैसे? ऊपरवाला रोज़-रोज़ “अंजलि सचिन रमेश तेंदुलकर” थोड़े ही बनाता है … आज सोचा कि आपसे  कुछ साझा किया जाये … आपके पहलुओं पर एक सरसरी निगाह डालने की कोशिश की जाये … और बस लिखने बैठ गया ये पाती दरअसल 15 नवम्बर आ गया  है … अब 15 तारीख़ आ गयी है तो 16 भी आनी ही थी , उसमें क्या ख़ास बात है ? पर मेरे लिये तो ये बस दो लगातार दिन नहीं बल्कि भारतीय क्रिकेट के एक युग की पूरी दास्तान है जिसका नाम है सचिन तेंदुलकर …

Sachin

सचिन पा’जी ने अपना पहला मैच 15 नवम्बर 1989 को ही खेला था और 16 नवम्बर 2013 को वो क्रिकेट ग्राउंड पर एक खिलाड़ी के तौर पर आख़िरी बार उतरे थे … इन 24 सालों में अधिकतर उनके कन्धे से कन्धा मिलाकर कोई खड़ा था तो वो आप ही थीं … आप सचिन का वो सम्बल हो जिसके बिना उनके बारे में कुछ कहा ही नहीं जा सकता …एक डॉक्टर होते हुए भी आपने अपने पेशे को छोड़ा ताकि सचिन सिर्फ़ अपनी क्रिकेट पर ध्यान दे सकें … उन्हें घर-परिवार , माँ-बाप और बच्चों की रोज़मर्रा की फ़िक्र से दूर रखा … याद है मुझे 6 मार्च 1996 की वो होली जो आप दोनों की शादी के बाद की पहली होली थी … सचिन उस दिन विश्व कप में ज़िम्बाब्वे के खिलाफ मैच खेल रहे थे … तब आपने ही तो कहा होगा कि यहाँ का सबकुछ मैं देख लूँगी तुम ग्राउण्ड के अंदर ही देखो … और फ़िर उसी साल दशहरा-दीपावली के बीच टाइटन कप सीरीज़ … ऐसे न जाने कितने पर्व त्यौहारों को आपने अकेले ही मनाया होगा बिना किसी शिकवा-शिकायत के … 1998 में तो सचिन ख़ुद अपने जन्मदिन के दिन शारजाह में ऑस्ट्रेलिया के धुर्रे उड़ा रहे थे – आप अकेली थीं घर पर … बच्चों की बर्थडे पार्टीज़ , आपकी शादी की सालगिरह या घर में होने वाला छोटा मोटा आयोजन – सब तो अकेले किया आपने …1999 की वो मई जब सचिन के पिता श्री रमेश तेंदुलकर जी का निधन हो गया था तब आप ही सचिन की ताक़त बनके आयीं थीं … तब आपने ही उन्हें हौसला दिया था की दुःख की इस घड़ी में भी देश का ध्यान रखे … सारा तेंदुलकर तब कोई एक-डेढ़ साल की रही होंगी और अर्जुन को अभी इस दुनिया में आना था …

अगर मैं सचिन को याद रखूँ तो ये कैसे भूल जाऊँ कि आप उनके साथ टेनिस एल्बो के समय खड़ी थीं? कैसे भूल जाऊँ कि जब उनपर असमय करियर खत्म होने का खतरा मँडराने लगा था तब आपने कैसे उनका साथ दिया था … ? कैसे भूल जाऊँ कि अपने दोनों बच्चों की कई पेरेंट्स डे मीटिंग आपने अकेले अटेंड की थी… सचिन तो शायद सारा के स्कूल का पहला स्टेज परफॉर्मेंस देख भी नहीं पाये होंगे …अर्जुन ने खुद पहली बार बल्ला कब पकड़ा , उन्हें पता भी नहीं होगा … बच्चे कब बड़े हो गये उन्हें पता ही नहीं चला … पता चलता भी कैसे ? आपने उन्हें पता चलने दिया होता तब ना … पूरे परिवार की धुरी बन सबको तो सम्हाल लिया आपने, बिना कुछ कहे – बिना किसी हाइप के …

Sachin

Image credit- Firstpost.com

अपने जीवन के 24 साल आपने भी दिये हैं इस देश को इसलिये ये पाती लिखनी पड़ी, सचिन को द ग्रेट सचिन तेंदुलकर बनने दिया इसलिये ये पाती लिखनी पड़ी … हर परेशानी का डटकर सामना किया है आपने इसलिये ये ख़त आपके नाम … आपके त्याग, तपस्या और समर्पण को सलाम करती एक छोटी सी कोशिश आपके नाम … श्रीमती अंजलि तेंदुलकर के नाम … सचिन के रिटायरमेंट पर आपने कहा था कि आप सचिन के बिना क्रिकेट की कल्पना कर सकती हैं पर क्रिकेट के बिना सचिन की नहीं … मैं कहता हूँ कि मैं आपके बिना सचिन की कल्पना नहीं कर सकता …

                                                                                                                                                                                                                        … आपका – एक प्रशंसक

 

Manu Aashishमनु रीता आशीष 

लेखक मूलतः बिहार के सासाराम से हैं और पेशे से इंजीनियर हैं| फिलहाल दिल्ली में कार्यरत हैं|

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