ग्लोबल गुमटी

​और एक दिन लखनऊ से………..अवध की मुलाकात

और एक दिन लखनऊ से…………अवध की मुलाकात

 

“आज तड़के सुबह ही नींद खुल गयी, सुबह हलकी ठण्ड रहती है तो जोड़ों में दर्द उठता है. उठकर सोचती हूँ कि चाय बना लूँ. चीनी ख़त्म होने को है, ये चीनी भी मुई कितनी महंगी है, अब तो सिर्फ रईसों के शौक रह गये हैं चीनी के.” यह सोचते सोचते कब सवेरा हो गया पता ही नहीं चला. 
और आप सब सोच रहे होंगे कि मैं कौन हूँ? पर अब जल्दी क्या हैं नाम जानने की? अगर जानने की इतनी ही उत्सुकता है कि तो ये जान लो कि मैं एक गुजर चुका वक़्त, बीत गया समय, लम्बा अरसा हूँ पर मैं अब बूढ़ी हो चली हूँ , आज मौसम ठीक है तो सोचती हूँ इमामबाडा हो ही आऊँ. 

“ बद्री………….ओ! बद्री , ज़रा रिक्शा कर दे.”

पर बद्री को कुछ सुनाई नहीं दिया हमेशा की तरह, मैंने बद्री को मन भर कोसा और थोड़े खुले रुपये हाथ में लेकर हिजाब डाले इमामबाड़ा के लिये निकल पड़ी. इमामबाडा, नवाब साहेब का बनवाया इमामबाड़ा, घोर अकाल पड़ा था उस बरस लोग बताते हैं, नवाब साहेब खुद खुदा की तरह आये और इमामबाड़ा बना. कहते हैं दिन में बनता और रात में टूटता था,  अकाल में भी लोगों की खुद्दारी ऐसी थी जैसे नवाब साहेब की जुबान. एक वो अवध हुआ करता था.

रिक्शा से उतरती हुई मैं रिक्शा वाले को 20 रूपये पकड़ाती हूँ कि वो जोर से कहता है “ 50 रूपये से कम न लेंगे माताजी”, 
“50 रूपये, अल्लाह खैर करे मियाँ तुम्हारा, इतनी सी दूरी का 50 रूपये, हराम की कमाई न खाओ मियाँ.”

“ माताजी आपकी उम्र का लिहाज कर रहे हैं तो ज्ञान न दो हमें, 50 रूपये निकालो चुप चाप से.”

मैं उसे 50 रूपये देकर आगे बढती हूँ और पहली झलक दिखती है इमामबाडा की.

इमामबाड़ा पहुँचती हूँ और फिर उस अवध को याद करती हूँ, अन्दर जा रही होती हूँ कि पीछे से आवाज़ आती है

“ अरे माताजी टिकेट कहाँ है “

“टिकेट, कैसा टिकेट?”

“ इमामबाड़ा जाने का टिकट”

“ अल्लाह के घर में कैसी टिकट मियाँ”

“ अल्लाह का घर नहीं, अब ये ASI का घर है माताजी, जाइये टिकेट लेकर आइये”

इस बदमिजाज़ शख्स से जिरह करने का कोई फायदा नहीं, इसीलिए टिकट लेती हूँ. तभी एक गाइड आ कर पूछता है “माताजी पूरा इमामबाडा घुमाएंगे आपको”

“घुमा दो बेटा, अल्लाह बरकत दे तुम्हें”

“ग्रुप में जाओगे तो 150 रूपये और अकेले जाओगे तो ३०० रूपये लगेंगे माताजी”

अपनी कमरबंध में लगी पोटली टटोलती हूँ, कुल जमा 100 रूपये हैं उसमें. वैसे भी अब इन बूढ़ी हड्डियों के साथ सीढियां नहीं चढ़ पाऊँगी . गाइड करने का ख्याल मन से निकाल देती हूँ और वहीँ बैठ जाती हूँ.

चलिये माताजी आप 100 रूपये में चले जाइये.

अन्दर घुस के ये गाइड मुझे बताता है कि 40 सीढ़ियों बाद भूल भुलैया शुरू हो जायेगा और हम धीरे धीरे चलकर ऊपर पहुँचते हैं. एक कुआँ है जिसे अंग्रेजों ने बंद कर दिया था पर कहते हैं उसमे से एक सुरंग होते हुये सीधे गोमती नदी तक जाती थी, वो थे नवाबी के दिन, देश उथल पुथल से गुजर रहा था और भाई भाई पे विश्वास नहीं कर रहा था .

“अरे माताजी कहाँ खो गयी आप”, मैं देखती हूँ कि गाइड मेरी तरफ ही देख रहा एकटक, इंतज़ार करते मेरे विचारों की श्रंखला के टूटने का.

Acoustics का आर्किटेक्चर में इस्तेमाल सबसे बेहतरीन ढंग से इमामबाडा में हुआ, यहाँ एक मील दूर से ही माचिस के जलने की आवाज़ आती है. सोचती हूँ कि पूरे शहर में हल्ला था कि कोई राज मिस्त्री इरान से आया था. हम भी अपनी हवेलियों के झरोखों पर बैठकर इरानी कामगार को आते देखा था.

“ माताजी, देखिये ये अन्दर बिना AC के भी कितना ठंडा है और आवाज़ मीलों दूर पहुँच जाती है जैसे सच में दीवारो. के कान होते हैं , इसको पूरा बनाया इतनी चालाकी से एक इरानी आर्किटेक्ट ने “

मैं हंसती हूँ, इरानी मिस्त्री आज भी इमामबाड़ा में जस के तस हैं, हमारे किस्सों में और गाइड के काम में.

इसी इमामबाड़ा के बेरंग पत्थरों में मैं ढूंढती हूँ मैं अपने पुराने अवध को, वो अवध जो नवाबों से रोशन था, वो अवध जिसके शामें मशहूर थी, वो अवध जो अपनी तहज़ीब और तमीज के लिये जाना जाता है.

 हम भूल भुलैया के दरवाज़े के सामने खड़े हैं ,  गाइड कह रहा है कि आप ढूँढना चाहेंगे रास्ता?

मैं भी ढूँढने निकली थी अवध को और उस पुराने दौर को पर ये तो भूल भुलैया में नहीं है , वह दफ़न हो गया है समय की रेत के नीचे बहुत नीचे.

“माताजी! माताजी…………आप जाएँगी भूल भुलैया में?”

“ नहीं बेटा, वापस चलो.”

“ चलिये माताजी, नीचे रानी की बावड़ी भी है, वहां चलते हैं आप थोड़ा सुस्ता लें”

“ नहीं बेटा वहां हम पैर नहीं धर सकते “

“अरे माताजी, चिंता मत करिये वहां के लिये अलग से टिकेट नहीं लगेगा “

“अवध से हैं बेटा, उसूल की बात हो जाती है.”

“ हैं!!” (मन में सोचते हुये कि बुढ़िया का दिमाग फिर गया है )………ठीक है माताजी,जैसा आपको ठीक लगे “ 

और मैं वापस आ जाती हूँ लखनऊ में, अवध वहीँ इमामबाड़ा की छत पर रह जाता है. बाहर चबूतरे पर बैठ कर सोचती हूँ कि उस दौर में भी हमारे कोठे की क्या शान थी, गौहरबाई का कोठा अवध की शान थी और हमारा नाच अवध की पहचान.पर अब रंगीनियों का दौर बदल चुका है | संगीत की आवाज़ कम पड़ गयी है और घुंघरूओं की झंकार भी नहीं सुनाई देती है |अब न वे मुजरेवालियां रहीं और न वे मुजरे.

वह दुनिया अब लखनऊ में कहीं नहीं दिखती,सिवाय कुछ भूलती बिसरती जा रही यादों के .वे गलियां जिन के पास  दिलकश मुजरों की यादें अब सूनी पडी हैं , हमारी महफ़िल जहाँ हुआ करती थी, उस आलीशान हवेली में जहाँ पायलों की झंकार और मुजरों की सुरीली आवाजें गूंजा करती थीं| उस जमाने में वो इस जहां की सबसे खूबसूरत, सबसे रोशन गली होती थी. अब लोग जानते हैं उस चावल वाली गली को, जिसे लोग पता नहीं क्या, हाँ रेड लाइट एरिया कहते हैं.

उन बदनाम रास्तों पर आज भी सुरीली आवाजें, ठुमरी के ताल और कत्थक के घुँघरू मिलते हैं.

वही गली जहाँ कभी सारे नवाब अपनी शामें बिताते थे, हम सब कलाकार थे, मजाल की कोई बदतमीजी कर ले,तहजीब इतनी कि बड़े से बड़े राजा को भी आने से पहले इत्तिला करनी पड़ती थी.सच भी है अवध में मुजरा व मुजरेवालियों की जिंदगी का इतिहास बहुत पुराना है . नवाबी दौर में इसे वही सम्मान व स्थान प्राप्त था जो मुर्गबाजी, कबूरतरबाजी, बटेरबाजी व पतंगबाजी को था .गौहरबाई की महफ़िल  में सिर्फ़ तारीफ की खैरात  व आवाज का सौदा होता था |

लेकिन यह सब यकायक नही हुआ.जमाना बदला तो तहजीब बदली, लोग बदले और रूचियां बदलीं .

“माताजी ! माताजी !”

मैं अचानक ऊपर देखती हूँ, कोई मुझे ही बुला रहा है.

“इमामबाड़ा बंद होने का टाइम हो आया, आप भी लौट जाइये अब”

हाँ बेटा, अब लौट ही जाना चाहिए .“

 

 

डॉ. पूजा त्रिपाठी

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