ग्लोबल गुमटी

बापू तेरे बड्डे पे

बापू तेरे बड्डे पे

बापू से बातचीत: “गाँधी जयंती”को आज पता था कि आज वीआईपी की भीड़ मेँ फिर दिन भर तो इस फकीर से आम आदमी का मिलना मुश्किल है सो मैँ एकदम भोरे भोर 4 बजे ही दिवाल फान कर राजघाट घुस गया। मैँ दबे कदमोँ से समाधी की ओर बढ़ा ही था कि देखा गाँधी जी समाधी के ठीक बायीँ ओर “चुकुमुकु(घुटने मोड़ के गरदन गिरा सर एकदम घुटने तक घुसा के बैठने की अवस्था)” माथा पकड़ के बैठे हैँ।एकदम वैसे नहा धोआ के साफ धोती पहन के तैयार हो के बैठे हैँ ठीक जैसे मजबुरी मेँ जबरन तैयार की गई बेमन से सज धज के कोई नाचने वाली नाच के पहले कोठे के किसी कोने मेँ मजबुर बैठी होती है।

खट खुट की आवाज सुन उन्होँने गर्दन उठाई तो सामने मुझे देख उनके मुँह से निकला”कौन हो भाई?पत्रकार, नेता या उद्योगपति?” बापू नहीँ मैँ हूँ एक आम आदमी।गाँधी हँसते हुए बोले”हा हा तब यहाँ क्या करने आये हो?भला आम आदमी के लिए क्या उपयोग है गाँधी का,अरे तुम क्या पाओगे यहाँ। इस समाधि के चिराग का तेल तो नेता,पत्रकार,व्यापारी सब पी ले गये,गाँधी तुम्हारे किस काम का।जाओ भई”।

बापू ऐसा ना कहेँ। मैँ विद्यार्थी हूँ ,आप मेरे लिए निबंध और इंटरव्यु दोनोँ मेँ उपयोगी हैँ”मैँने उनके उपयोग के बढ़ते दायरे का दिलासा देते हुए वैष्णव जन ते कहिये गा के अभिवादन किया।इतना सुनना था कि गाँधी जी ने हल्की मुस्कुराहट के साथ कहा”अरे नकलचियोँ जिँदगी भर जो गीत मैनेँ गाया,अब इतने दशक बाद हमरी ही समाधि पर तुम भी यही गाओगे,एक भी ऐसा भजन नहीँ रच पाये बेवकुफोँ जो गाँधी सुन पाये,यही है तुम्हारी नयी प्रतिभावान रचनात्मक पीढ़ी?”! मैँ लजा गया,एकदम चुप हो गया।

वो गाँधी जो 3 घंटे बाद वीआईपी की लगने वाली भीड़ के वक्त चुपचाप समाधि मेँ लेट जाने वाले थे उनके लिए यही मौका था जब वो खुल के अपनी दिल की भड़ास निकाल सकते थे।मैँने भी गाँधी जी को मौका देना तय कर लिया था,लिजिए दिल खोल बोल लिजिए आज मन की बात। वो लगातार बोले जा रहे थे”बताओ राजघाट को जिमखाना क्लब बना दिया है,कोई उपवास करने आ जाता है,कोई नाचने गाने आ जाता है, अरे एक दिन कहिये  सुषमा स्वराज आ के नाचने लगी।हम ये देख कंफ्युज पुरा,मैनेँ डाइरेक्ट कहा अरे बेटी ‘स्वराज’ के लिए लड़े थे कि ‘सुषमा स्वराज’ के लिए

बताओ भई वो लंबा कुरता छोटा पैँट वाला लड़का केजरीवाल,जब मन होगा थप्पड़ खा के यहाँ बैठने आ जायेगा।कहेगा गाँधी जी बोले थे कि कोई एक गाल पर मारे तो दुसरा आगे कर दो,ये गाँधीगिरी है, अबे मुर्खोँ मैनेँ अहिँसक होने कहा था ‘लतखोर’ होने थोड़े, रूटींग बना के रोज थप्पड़ खाते रहते तो अंग्रेज का कुकूर भी नय भागता समझे।

एक परिवार है,पुण्य तिथि हो या जन्मतिथि पर पुरा माँ बेटा, बेटी, दामाद, नाती ले के पुरा भर गुच्छा गुलदस्ता ले पहुँच जाता है, मानो इनके लिए राजघाट राजकीय पार्क हो, ऊ छुटका नतिया और ऊ नीला पगड़ी वाला सरदार जी ऐसे बेलुन लेके खेलते हैँ मानो दशहरा ग्राउंड आया है सब मेला देखने। अरे भाई और भी दिन तो याद करो,कभी व्यवहार मेँ भी लाते, कभी समाधि से बाहर तो लाते गाँधी को।

यार खादी तो कब का दागदार हो गया एक टोपी बचा छोड़ मरा था उसको भी ऊ झाड़ु वाला लड़का घिनवा के सब रिद छिद कर दिया और ऊ एक लड़का हुआ है अभी अभी हीरो, देश का मुखिया बना है और बात बात मेँ कहता है गुजरात से हूँ , अब भैया तुम चाहे जहाँ से हो, पर साथ मेँ मुझे भी लपेट के कहता है कि गाँधी जी गुजराती थे, हाय रे किस्मत, अरे गाँधी कब गुजराती हो गये बे, गाँधी इस देश के हैँ मुर्खोँ और अगर बनाना ही है तो गाँधी को पूरी दुनिया का बना दो, लेकिन लगे सब हमरा पोरबंदर और साबरमती से राशन कार्ड बनवाने,पहले तो ये सोच के परेशान हूँ कि मैँने जिँदगी एक धोती पहन के गुजार दी,क्युँ कंगाल था क्या? नहीँ न!ये सोच कि वस्त्रहीनोँ को वस्त्र देने की प्रेरणा मिले लोगो को पर ये लड़का गुजरात का सारा कपास और खादी अपने कुर्ता बंडी सिलवाने मेँ ना खर्च कर दे यार,रोको इसको

हाय भारत के पूतोँ, बोलो ये लड़का पिछले साल अमेरिका गया और वहाँ मेरा नाम भूल कर “मोहनलाल” कर आया,यही दिन दिखाना था हमेँ, बापू बोल के यहाँ गाड़ रखे हो और दुनिया के मंच पर बाप का नाम तक भूल गये

जानता हुँ के अरे ये अगर देश मेँ खादी भंडार के शोरूम ना होते न तो तुम सब कब के ही भूल जाते गाँधी को! और इ का रे ई का नया तमाशा,हमरे जन्म पर सफाई अभियान,जिधर देखिये आदमी नया झाड़ु लेके फोटो खिँचवा रहा है, अरे खुद के मन मेँ इतना कुड़ा है,हर ह्रदय एक कुड़ाघर बना पड़ा है पहले उसको तो साफ करते,दुनिया अहिँसा दिवस मनाती है सुना तीन दिन पहले पागल भीड़ ने एक आदमी को खाने के बात पर पीट मार डाला,अच्छा अहिँसा का संदेश दिये हो यार दुनिया को।

तुम सब आज झुठ ना बोलने ,रिश्वत ना लेने, शराब ना पीने या हिँसा ना करने या शाकाहार अपनाने की शपथ ना लेकर झाड़ु घुमाने का ‘फर्जी फैशनेबुल सफाई दिवस’ बनाये हो।सुनो झाड़ु छोड़ो।ऐसा करो आज झाड़ु और मेरी पूण्य तिथि को पोछा दिवस बना देना,भेज देना किसी गोडसे को मेरे मुँह मेँ फेनाईल डाल देने।”।ये कह वो क्षण भर रूके और फिर चालू”अच्छा ये बताओ हर हाथ को काम और हर पेट को भोजन मिल रहा है न? मैँने छट कहा”कहाँ अमेरिका मेँ?”। गाँधी चिल्लाये”अरे भारत मेँ,अपने देश मेँ”।

अबकी मैँ हँसा”आप क्या अल बल पुछ रहे हैँ बापू?ये राजघाट के सामने की सड़क पर सोये भुखे भिखमंगे नही दिखे क्या आपको?”।गाँधी तमतमा कर बोले”आखिर वो आजादी क्या की जो हमने जान पर खेल दिलाई,वो राम राज का क्या किया बेहुदे”। मैँ छट बोला”वो तो खो दिया कब का”।सुनते ही गाँधी चीखे”हाय तुमलोगोँ ने मुझे बस चूसा और इस्तेमाल किया”और एक जोरदार चाँटा मेरी गाल पर लगा।मैँ बेहोश!होश मेँ आया तो देखा लोग मुझे घेरे खड़े हैँ,एक आदमी मिर्गी का मरीज समझ जुता सुँघा रहा है। मैँ किसी तरह उठ पुठ के खड़ा हुआ और समाधि की तरफ देखता हुआ यही सोचता हुआ निकला जा रहा था”सच बापू हमने बस आपका नाम इस्तेमाल किया ।महात्मा से शुरू कर गाँधीगिरी पे ले आये हम गाँधी को।अपने साथ साथ कितना नीचे ले जायेँगेँ हम तुम्हे भी बापू,?पता नहीँ, माफ करना। जय हो

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