ग्लोबल गुमटी

काशी बनारस

राड़, सांड़, सोढ़ी, संन्यासी, इनसे बचे सो सेवै काशी..बनारस डायरीज 1

मदिरों, गलियों, भांग, गंगा और भोले का शहर है काशी. इसे काशी कहें या बनारस, दोनों का अर्थ एक ही है। काशी से धर्म और आध्यात्म का बोध होता है और बनारस से यहां की संस्कृति जनजीवन और मौज मस्ती का।

कुछ है बनारस में कि अब बड़े बड़े चमचमाते मॉल आ गए हैं, जगह जगह इडली के स्टाल लग गए हैं पर बनारस है कि कशी की लंगोट को छोड़ता ही नहीं। यह बनारस ही है, जहां गंगा की धारा उलट गई, आम लंगड़ा हो गया, बातें बतरस में बदलकर किस्से और कहावत में बदल गयीं|

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धर्म, ज्ञान और मोक्ष की इस नगरी में विचित्र-िविचित्र किस्म के लोग मिलते हैं। यहां कहने वाला और सुनने वाला दोनों एक दूसरे को गुरू का संबोधन करता है तो फिर यह फैसला करना बड़ा मुश्किल है कि इसमें गुरू कौन है और चेला कौन है। जिस तरह से बनारस का पान, मान, भांग, मिठाई, साड़ी, आम जगत विख्यात है, उसी तरह यहां की बतकही भी जगत प्रसिद्ध है।

बनारस अपने आप में एक दुनिया है जहाँ जब जाओ तब वो नयी लगती है। इस शहर में हर देश, हर कौम और हर मजहब के लोग रहते हैं और कसम भांग की मिल जुल के रहते हैं । हर कदम पर एक गली मुड़ती है, हर गली में पान बंधता है और पूड़ी छनती है । गलियों के इस शहर में हर गली को लगता है कि बस काशी वही है। पंडे-दलालों की अगर अलग भाषा है तो व्यापारियों की अलग, यहाँ  तो पान वाला आपको ऐसे झिड़केगा जैसे बाप हो। तभी तो कहा गया ‘ठग जाने ठगी की भाषा|’ परन्तु मौजमस्ती की समूचे बनारस वालों की एक भाषा है, एक संस्कृति है, एक चाल-ढाल है। गप्प लड़ाना यहां के लोगों की संस्कृति है, यह सच है। ‘जियS राजा’ के संबोधन को यहां तब इस्तेमाल किया जाता है जब किसी को शाबासी देनी हो या फिर किसी का मजाक उड़ाना हो. बतकही और महादेव का आलम ये है कि फिरंगी भी आपको “हर हर महादेव” कहते मिल जायेंगे और offend न होइएगा “भोसड़ी के’  काशी में गाली नहीं है, यह तो एक बनारसी को दूसरे बनारसी से जोड़ता है.

बनारस

घाट होती हुई गली पर एक जलेबी बेचने वाला चिल्लाता है कि- ‘ले लो बैजू साव की  जलेबी, तो दूसरा कहता है कि “यह बैजू साव के बाप की जलेबी छोड़ो, इनके त देसी घी कनस्तर में से निकाले में कलछुल टेढ़ा हो जात रहल, जो ई पूड़ी -कचौरी खाये ओकर शरीर में बल और चेहरे पर तेज रहत रहल एहि घटवा पर जब ऊ लोग कपड़ा कछार के आसमान के तरफ फेकत रहलन तब सूखत-सूखत नीचे गिरत रहल।“ ऐसे सेल्समेन न देखे होंगे आपने, क्यूंकि बनारस अपने हर रंग में, हर रूप में निराला है इसीलिए हम बनारस के गप्प को, यहाँ के साधुओं के किस्से आपको बनारस डायरीज में बताते रहेंगे, चलते चलते सुनिए कशी की एक और कहावत…

                   चना चबैना, गंगाजल जो पुरवै कर तार 
                   काशी कबहूं न छोडि़ये विश्वनाथ दरबार।

 
डॉ पूजा त्रिपाठी

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2 Comments on “राड़, सांड़, सोढ़ी, संन्यासी, इनसे बचे सो सेवै काशी..बनारस डायरीज 1

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