ग्लोबल गुमटी

मसान

बनारस, मसान और मैं

बनारस, मसान और मैं

एक दिन मसान देखी और किसी को समझा नहीं पाऊँगी इसे देखने का आफ्टर इफ़ेक्ट.जो मुझे करीब से जानते हैं, वो बनारस से मेरे spiritual attachment से वाकिफ हैं। कोई कहानी लिखती हूँ तो वह किसी भी तरीके से बनारस पहुँच जाती है। पर मेरे लिए बनारस गंगा घाट पर दूर से आरती देखना, भोर में वहां जाकर घंटियों और मन्त्रों के स्वर के बीच सिर्फ बैठना और हर गली के इतिहास को ढूंढना ही था। आप मुझे रिग्रेसिव कह सकते हैं, मैं चाहती हूँ कि वहाँ सुविधाएं बेहतर हो पर मैं काशी को क्योटो नहीं बनने देखना चाहती।

जिन लोगों ने काशीनाथ सिंह को पढ़ा है और खासकर ‘काशी का अस्सी’ के किरदारों को करीब से महसूस किया है वो इस हकीकत को समझ सकते हैं। डॉ चंद्रप्रकाश तो बहुत बाद में आते हैं, ‘मोहल्ला अस्सी’ बहुत बाद में बनता है लेकिन अस्सी की सीढ़ियों पर मजमा बरसों से जमता आया है…। बनारस अपने तमाम रसों से सराबोर यहां हर सुबह सूरज की पहली किरण के साथ जागता है और हर शाम जवान होता है…साहित्य के लिए अस्सी से अच्छी जगह नहीं…। शायद इसलिए कि वहां तुलसी का अक्स दिखता है… संस्कृति के लिए अस्सी से बेहतर घाट नहीं.. शायद इसलिए कि वहां संगीत अपनी गहराइयों के साथ मन में उतर जाता है।

पर डोम को कहानी के बीच में लाकर खड़े कर देना, दुष्यंत सिंह कि सबसे खूबसूरत रचना को केंद्र बिंदु बनाना, इस सड़े – गले समाज में एक स्वतंत्र लड़की किस किस लेवल पर लड़ती है, जाति की पैंठ किस तरह हमारे काम्पलेक्स के स्तर तक है, इसके लिए मैं यह पोस्ट अन्दर तक विचलित कर देने वाली कहानी के लिए लिख रही हूँ. आज जब हर तीसरी लड़की इज्ज़त बचाने के नाम पर हेरस्स्मेंट का शिकार हो रही है तो ऋचा चड्ढा का पात्र उन मजबूरियों का चेहरा बनकर सामने आता है। उन मजबूरियों के उपर एक पिता की घुटन और उसमें भी उसका एक पिता रह जाना।

बहुत कम फिल्में आपको दुखी करती हैं, इस इंस्टेंट कल्चर में अगर मसान हमें दुखी करती है, एक भारी मन से आप क्रेडिट रोल होती हुई स्क्रीन को देखते हैं तो मसान उस ओपेरा की तरह है जिसकी खूबसूरती उसके दर्द में है।

और दुष्यंत कुमार की कविता, काले बादल की तरह जिन्हें बरसना ही है

 

मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ

एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ

तू किसी रेल-सी गुज़रती है
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ

हर तरफ़ ऐतराज़ होता है
मैं अगर रौशनी में आता हूँ

एक बाज़ू उखड़ गया जबसे
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ

मैं तुझे भूलने की कोशिश में
आज कितने क़रीब पाता हूँ

कौन ये फ़ासला निभाएगा
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ

4 Comments on “बनारस, मसान और मैं

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