ग्लोबल गुमटी

Bands and protest

रॉक बैंड्स और प्रतिरोध की संस्कृति…

↼प्रतिरोध की संस्कृति और बैंड्स ↼

वैश्विक स्तर पर प्रतिरोध विभिन्न स्वरूपों में देखने को मिलते हैं . जुलूस , नारे , गीत , संगीत, कविता , प्रगीत , कथा , उपन्यास और न जाने कितनी ढेर सारी विधाओं के माध्यम से प्रतिरोध उभर के सामने आते रहते हैं . दरससल इन कृतियों का राष्ट्रीयता, उपराष्ट्रीयता के विकास के साथ साथ अलगाववाद, दमन के प्रति प्रतिक्रिया इत्यादि में बेहद अहम योगदान रहता है. इसी तरह प्रतिरोध की संस्कृति में बैंड्स की भूमिका भी अति महत्वपूर्ण है.

अफ्रीका, एशिया से लेकर लातीन अमेरिका तक न जाने कितने स्थानीय या लोक संस्कृति को संजोये बैंड्स औपनिवेशिक काल में प्रतिरोध के हस्ताक्षर रहे ही, तब से लेकर वर्तमान समय तक आधुनिक स्वरूपों में भी बैंड्स ने वैश्विक से लेकर स्थानीय समस्याओं को चुनौती देने में अति प्रभावी भूमिका निभाई है चाहे ‘अल्मानाक बैंड्स ‘ हो या इज़रायल का ‘डैम बैंड्स’ या ऐसे ही ढेर सारे बैंड्स. पीट सिगार अमेरिका के मज़दूरों के लिए समर्पित लोक गीतों के लिए पूरे अमेरिका में चर्चित रहते थे. 1940 के दशक से लेकर 2014 तक पीट के बैंड की धुन अमेरिकन प्रगतिशील संगीत को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती रही. उल्लेखनीय है की अमेरिकन ख़ुफ़िया संस्था एफबीआई पीट के पीछे हाथ धोके पड़ी रहती थी. पिछले वर्ष पीट ने दुनिया को अलविदा कह दिया.

इसी तरह लॉड, इज़रायल स्थित फिलिस्तीनी बैंड ‘ डैम ‘ न सिर्फ इज़रायली कब्जे, प्रजातीयता, नशा व्यापार का विरोध करता है बल्कि महिला अधिकारों का भी पूरा समर्थन करता है. ‘पंक‘ रॉक बैंड्स ने तो समूचे यूके, ऑस्ट्रेलिया, यूएसए में प्रतिरोध की संस्कृति को बढ़ावा दिया है. ‘सेक्स पिस्टल ‘नामक बैंड यूके में बढ़ते उपभोक्तावाद, एबोर्सन, होलोकॉस्ट के साथ साथ यूके के समाज की तमाम बुराइयों पर हमेशा प्रहार करता रहता है. पाकिस्तान का ‘लाल बैंड ‘ भी समाजवादी और प्रगतिशील विचारों को बढ़ावा देते हुए तालिबानी संस्कृति आदि का प्रतिरोध करता रहता है.

बात भारत की करें तो सामाजिक जागरण से लेकर तमाम प्रकार के प्रतिरोधों में बैंड्स ने महत्ती भूमिका अदा की है. कश्मीर का ‘प्रगाश‘ बैंड कुछ इसी तरह का प्रयोग था. कश्मीर के इस पहले रॉक बैंड ने ‘बैटल ऑफ़ बैंड्स’ प्रतियोगिता जिसका आयोजन श्रीनगर में हुआ था , में धूम मचा दी थी. पर नोमा नाज़िर बट्ट, फरह और अनीका को उस फतवे के कारण झुकना पड़ा जिसमे इसे सर्वोच्च मुफ्ती बहिरुद्दीन अहमद द्वारा गैर इस्लामिक करार दिया गया था. वस्तुतः ये बैंड पुरुषवादी वर्चस्व के प्रतिरोध का सशक्त हस्ताक्षर था.

उत्तर पूर्वी भारत में भी प्रतिरोध की संस्कृति के एक हिस्से के रूप में बैंड्स गाहे बगाहे बनते रहे हैं. हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले मणिपुरवासी रोनिड चिंगगबम अपने बैंड ‘इम्फाल टॉकीज़’ के कारण चर्चे में रहे हैं. इरोम शर्मीला के समर्थन और अफस्पा के विरोध में ये बैंड उत्तरपूर्व में काफी लोकप्रिय हो गया है खासकर डीयू और जेएनयू में पढ़ने वाले उत्तर पूर्व के विद्यार्थियों के बीच.

पटना के पास दानापुर में सुधा वर्गीज़ के सहयोग से महादलित महिलाओं ने हाल ही में एक बैंड बनाया जो काफी चर्चे में था. भारतीय समाज की विद्रूपताओं को परत दर परत खोलने में इन महिलाओं का बैंड काफी चर्चे में रहा है. लिंग और जाति के स्तर से ऊपर उठ कर मुसहर समुदाय की महिलाओं ने ‘नारी गुंजन सरगम म्यूज़िकल बैंड ‘ बनाया है. छठिया देवी, बदामी देवी और सावित्री देवी आदि का मानना है की मजदूरी करने पर उन्हें १०० रूपये दैनिक मिलते हैं और बैंड से ५०० रूपये. साथ ही इस बैंड के माध्यम से ये पुरुषवादी या किसी भी तरह के उत्पीड़न का बदला भी लेती हैं.

शादी में बजने वालें बैंड्स के सामाजिक यथार्थ को ध्यान दें तो कई बार ऐसी सच्चाई का सामना करने को मिलता है जो काफी शोचनीय है, जैसे की ऐसे कई मामले आये हैं जिसमे दलित वर्ग के लोगों को सवर्ण बस्तियों से बैंड्स ले जाने की अनुमति तो नहीं ही है बल्कि कई ऐसे गाने भी हैं जिन्हे वो नहीं बजा सकते. एक नया वाकया मुजफ्फरनगर में सुनने को मिला जिसमे सर्वखाप पंचायत ने तुगलकी फरमान सुनाया की शादी में बैंड बजने पर खाप के लोग उस शादी में भोजन नहीं करेंगे.

बैंड न सिर्फ प्रतिरोध की संस्कृति में सहयोग देते हैं, बल्कि राष्ट्रीयता और क्षेत्रीयता की अभिवृद्धि में भी उतनी ही भूमिका निभाते हैं. पिछले साल नवम्बर में राष्ट्रपति भवन में पाकिस्तान से जेबुनिशा बंगश, बांग्लादेश से शरमीन सुल्ताना व् भारत की सुकृति सेन ने अपने-अपने बैंड्स के साथ सांस्कृतिक प्रस्तुतीकरण कर भारतीय उपमहाद्वीपीय क्षेत्र में एकता और अखंडता को मजबूत किया.

बैंड्स का राष्ट्रवाद से भी गहरा सम्बन्ध है. दुनिया के कई देशों में अपने बैंड का लोहा मनवा चुके भारतीय सेना की एएमसी बैंड जो की 1952 में स्थापित हुई थी पहले ग्वालियर नरेश की ख़ास बैंड हुआ करती थी पर आज़ादी के बाद इसे भारतीय सेना को सौंप दिया गया. इस बैंड के सदस्य गुजरात से लेकर बिहार तक के छोटे गाँव से हैं और ‘ मेरे देश की धरती..’ के धुनों की थाप पर अपनी मिटटी की महक को पाते हैं. पिछले गणतंत्र दिवस पर ओबामा महोदय को ‘गार्ड ऑफ़ ऑनर ‘ देकर इन्हे काफी गर्व का एहसास भी हुआ.

वास्तव में सामाजिक-राजनीतिक प्रतिरोध की संस्कृति के साथ साथ राष्ट्रीयता, उपराष्ट्रीयता और और इस तरह के ढेर सारे मुहावरों को बैंड्स ने सिंचित किया है. पर क्या हमारा और आपका ध्यान इस पर जाता है ? दरअसल मुख्य धारा की मीडिया ने बहुत अनछुए पहलुओं को प्रकाशित करने में कोताही बरती है जिन पर ध्यान देने की जरुरत है. हममे से कितने लोग बदामी देवी, छठिया देवी इत्यादि के बारे में जानते हैं जिन्होंने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में रहकर भी बैंड्स के माध्यम से जाति और लिंग को ठेंगा दिखाया है ? ऐसे और भी मुद्दें हैं जिन्हे प्रकाश में लाने की जरुरत है.

 

14713787_1186749611400303_3930436399892075501_nअभिनव मिश्रा

राजनीतिक सामजिक मुद्दों पर इनके लेख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं. मूलतः बिहार के गोपालगंज से आते हैं. बीएचयू से पढाई की है और अभी जेएनयू में शोधार्थी हैं.

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3 Comments on “रॉक बैंड्स और प्रतिरोध की संस्कृति…

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