ग्लोबल गुमटी

भोजपुरी स्वाभिमान सम्मलेन

ताकि स्वच्छ, सलामत, और स्वाभिमानी रहे भोजपुरी…

चंपारण, छपरा, बक्सर, भोजपुर, रोहतास, भभुआ, औरंगाबाद समेत बिहार-झारखण्ड के बड़े हिस्से और सटे हुए पूर्वी उत्तरप्रदेश के कई जिलों के लोगों से भोजपुरी के बारे में पूछिये तो वो आवाज में भोजपुरिया गर्व के साथ भिखारी ठाकुर, शारदा सिन्हा, का नाम लेंगे. साथ ही आपको तर्क देंगे कि चूँकि भोजपुरी की अपनी एक लिपि “कैथी” है और इसमें गद्य-पद्य दोनों विधाओं की समृद्ध परंपरा रही है इसलिए इसे हिन्दी की सिर्फ एक बोली कहकर नकार नहीं सकते, इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज भाषा का दर्जा मिलना ही चाहिए.

[ggwebadd]

लेकिन जब आप वर्तमान में सिंगल स्क्रीन सिनेमा हॉलों और ऑटो-बसों के स्पीकरों या ऊँचे बांसों पर बंधे लाउडस्पीकरों के रास्ते परोसी जा रही भोजपुरी की चर्चा करते हैं तो अभी तक आवाज में चमक रहा भोजपुरिया गर्व कुछ बुझता सा महसूस होने लगता है. ” का करल जा सकेला?” एक कंधे उचकाता लाचार सा अफ़सोस आवाज जवाब में उठती है. पर तभी कुछ भोजपुरिया नौजवान “जय भोजपुरी”, “आखर”, “अम्बा”, “पंजवार” “भोजपुरी स्वाभिमान सम्मलेन” जैसे शब्द बुदबुदाते हैं और लोगों की आखों और आवाजों में गर्वीली भोजपुरिया चमक लौट आती है, पहले से भी ज्यादा.

बात 6 साल पुरानी है…दिसंबर 2010 की…रंगीला, रसिया, छलिया और कलुआ जैसे कई स्वनामधन्य सुपरस्टारों और डायमंड स्टारों के द्वारा भोजपुरी संगीत और फिल्मों में किये गए अथक भागीरथ प्रयास से गैर भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में फूहड़ता, अश्लीलता और मसखरेपन का पर्याय बन गयी अपनी माइभाषा भोजपुरी की दुर्दशा से आकुल और इसके खोये सांस्कृतिक गौरव और अस्मिता को वापस लाने के लिए व्याकुल कुछ नौजवानों ने इंटरनेट के माध्यम से ‘जय भोजपुरी’ नामक संस्था खड़ा की और 3 दिसंबर 2010 को प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद की जन्मतिथि पर उन्ही के जन्मस्थान जीरादेई गाँव में पहला भोजपुरी स्वाभिमान सम्मलेन आयोजित किया गया. अगले साल से  सीवान जिले के पंजवार गाँव में ये सम्मलेन होने लगा. फिर जैसा कि अक्सर बड़े, चुनातीपूर्ण और दूरगामी लक्ष्य वाले सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलनों में होता है, ‘जय भोजपुरी’ बिखर गया किन्तु पुनः जैसा बदलाव की अदम्य चाहत और अडिग नीयत वाले आन्दोलनों में होता है वैसे ही चौथे सम्मलेन से ठीक पहले ‘जय भोजपुरी’ के गर्भ से ही ‘आखर’ का जन्म हुआ. इसके बाद ‘आखर’ धीरे धीरे एक कुनबे के रूप में बढ़ता गया और भोजपुरी की गंगा को साफ़ करने का संकल्प लिए हुए कई सोते इससे जुड़ते गए. इस ‘आखर’ परिवार में आज किसान से लेकर नौकरीपेशा तक, बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक वे सब शामिल हैं जो अपनी माइभाषा भोजपुरी में फैलाई गयी  फूहड़ता को ख़त्म करने और उसकी अस्मिता और स्वाभिमान को लौटाने को लेकर दृढसंकल्प हैं. इसमें सबकी भूमिका निश्चित है, जिसे सब पूरी लगन से निभाते हैं. लोकसंगीत, लोकसाहित्य और लोकसंस्कृति की भोजपुरीया थाती को सहेजने के प्रयास में ‘आखर’ एक मासिक ई-पत्रिका www.aakhar.com का प्रकाशन भी करता है जिसमें भोजपुरी में लिखने वाले युवाओं की तरफ से हजारों प्रविष्टियाँ आती हैं. इसके अलावा प्रत्येक वर्ष 3 दिसंबर को ‘भोजपुरिया स्वाभिमान सम्मलेन’ के उत्सव का आयोजन कर आखर एक तरफ भोजपुरी की रक्षा के संघर्ष में जान फूंकता है वहीं स्वयं भी पूरे साल अपनी माइभाषा के लिए संघर्ष करने की उर्जा और प्रेरणा इस उत्सव से पाता है.

सम्मलेन का कार्यक्रम 

भोजपुरिया स्वाभिमान सम्मलेन की शुरुआत होती है भोजपुरी गौरव यात्रा से, जिसमें आसपास के विद्यालयों के बच्चे, शिक्षक, आस-पड़ोस के गाँवों तथा दूरदराज से सम्मलेन में हिस्सा लेने आये लोग यानी पूरा ‘आखर’ परिवार शामिल होता है. इस परिवार का आकार और उत्साह दोनों भोजपुरी के पुनरोत्थान और भविष्य को लेकर आश्वस्त कर देते हैं.

भोजपुरी

सम्मलेन का पहला सत्र साहित्यिक होता है जिसमें भोजपुरी भाषा-साहित्य और लोक संस्कृति पर चर्चा-परिचर्चा होती है. इसी में भोजपुरिया स्वाभिमान कैलेण्डर का अनावरण होता है जिसमें भोजपुरी की विभूतियों के बारे में संक्षेप में जानकारी दी जाती है.

2a637d70-1466-4cd2-80a3-92a3b80a23b2

सम्मलेन का दूसरा सत्र सांस्कृतिक सत्र होता है जिसमें भोजपुरी लोकगीत और लोकनृत्य की प्रस्तुति होती है. इस सत्र में खांटी माटी से जुड़े लोककलाकार अपनी कलाओं के प्रदर्शन से समां बाँध देते हैं. चन्दन तिवारी, शैलेन्द्र मिश्र जैसे विख्यात भोजपुरी कलाकार इस सत्र में उत्साह से शरीक होने के लिए अपनी व्यस्तता में से समय जरूर निकालते हैं.

भोजपुरी स्वाभिमान सम्मलेन, 2016   भोजपुरी स्वाभिमान सम्मलेन, 2016    भोजपुरी स्वाभिमान सम्मलेन, 2016

इस वर्ष का सम्मलेन

इस वर्ष के आयोजन में बिहार कोकिला पद्मश्री शारदा सिन्हा ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की और दशकों से बिहार और पूरब की लोकचेतना में गहरे बैठी अपनी खालिस आवाज से वही जादु पूरे वातावरण में गढ़ दिया जो उनके गीत दशकों से गढ़ते आ रहे हैं.

गायिका चन्दन तिवारी और शैलेन्द्र मिश्र ने अपने गीतों से लोगों को झूमा-झूमा दिया. वहीं गिटार पे काविश सेठ और मोहनवीणा पर राघवेन्द्र की उँगलियों की जुम्बिश ने भोजपुरी लोकसंगीत में फ्यूजन का एक अनूठा और सशक्त प्रयोग लोगों के सामने रखा. कत्थक नर्तक विपुल नायक इस सम्मलेन के लिए अपनी विशिष्ट थीम वाला नृत्य लेकर आये थे जिसे खूब सराहना मिली. गौरतलब है कि दर्शकों में अनुपात और जोश दोनों मामलों में महिलायें पुरुषों पर भारी थीं.

सम्मलेन का विशेष आकर्षण रहा अभिनेता सत्यकाम आनंद का मूक अभिनय एक्ट जिसके अंगरेजी नाम माइम से आम जन को टीवी पत्रकार रविश कुमार ने परिचित करा दिया है. सत्यकाम गैंग्स ऑफ वासेपुर में रामाधीर सिंह के बेटे विधायक जेपी सिंह का चर्चित किरदार निभा चुके हैं. उनको संबोधित कर बोला गया डायलोग “तुमसे न हो पायेगा बेटा!” आज की पीढी के लिए सबसे ज्यादा मुंहचढ़ा फ़िल्मी डायलोग अब तक बना हुआ है और ऐसा लगता है कि ये लम्बे समय तक युवाओं की आम बोलचाल की भाषा में शामिल रहेगा. पंजवार में सत्यकाम ने अपने लम्बे थियेटर अनुभव और वहां सीखे हुए अभिनय के बारीक कौशल का एक नमूना रोजमर्रा के जीवन की आपाधापी में फंसे एक आम आदमी के जीवन की एक आम सुबह के मूक अभिनय से बखूबी दिखाया. गौरतलब है कि स्वयं सत्यकाम भी भोजपुरी की अस्मिता की लड़ाई बहुत गंभीरता से लड़ रहे हैं. अपने गृहनगर आरा में अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर वो अश्लीलता मुक्त भोजपुरी असोसिएशन (AMBA) चला रहे हैं. अम्बा के माध्यम से सत्यकाम भोजपुरी में गंभीर और सार्थक सिनेमा बनाने का उद्देश्य लेकर चले हैं जिससे भोजपुरी फिल्मों से विमुख हो चुके गंभीर दर्शकों को 70 और 80 के दशक की तरह पुनः थियेटरों की ओर रूख करने को प्रेरित किया जा सके.

 

अपनी मातृभाषा की अस्मिता की तलाश असल में अपनी जड़ों के साथ कहीं गहरे लगी हुई अपनी मिट्टी, अपनी परंपरा और इस अर्थ में स्वयं अपनी तलाश का प्रयास होता है. अपनी माईभाषा से लगाव भले व्यक्ति का निजी भावनात्मक मामला लगे पर वास्तव में यह इससे कहीं ऊपर सारे समाज के हित से जुड़ता है. ऐसे में आखर और अम्बा जैसे संघर्षों और आन्दोलनों की लड़ाई सिर्फ एक भाषा के उत्थान की नहीं रह जाती यह उस भाषा से जुड़े समूचे समाज में स्वाभिमान के दबे अलाव को सुलगाने की कोशिश बन जाती है. ये चिंगारियां अभी छोटी भले नजर आ रही हों पर भविष्य के भाग्य में नियत इन भोजपुरिया मशालों को ग्लोबल गुमटी का सलाम.

          प्रियांशु सिंह
12373335_731781636952353_6529679863238195163_n प्रियांशु मूलतः बिहार के पंजवार गाँव से हैं, आखर के बहुत महत्वपूर्ण सदस्य हैं. वर्तमान में बंगलौर से कानून की पढाई कर रहे हैं और साहित्यिक सांस्कृतिक मंचो पर बहुत सक्रियता के साथ कार्यशील हैं.

फेसबुक प्रोफाइल के लिए क्लिक करें.

[ggwebadd1]

3 Comments on “ताकि स्वच्छ, सलामत, और स्वाभिमानी रहे भोजपुरी…

Leave a reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

आपकी भागीदारी