ग्लोबल गुमटी

बिहार सरकार एक साल

एक साल-केतना बहार, पूछे बिहार

बिहार चुनाव का परिणाम आए ठीक एक  साल हो चला है , पिछले 9 नवंबर को ही जेडीयू-आरजेडी-कांग्रेस महागठबंधन ने भारी बहुमत हासिल की थी।आइये चर्चा करते हैं सालभर के उन मुद्दों; खासकर सरकार की उपलब्धियों और खामियों की जो लगातार सुर्खियों में बने रहे।

  • Image credit - Indiatoday
    Image credit – Indiatoday

    नई सरकार की साल भर की उपलब्धियों में सर्वप्रमुख उप्लब्धि के तौर पर शराबबंदी सामने आई। काफी कड़े प्रावधानों के साथ बिहार में नीतीश कुमार ने शराब बंदी को लागू किया; बड़े राजस्व घाटे के बावजूद व्यापक सामाजिक लाभ के आलोक में यह एक क्रांतिकारी निर्णय के तौर पर उभर कर आया है और इसने  राष्ट्रीय स्तर पर नीतीश कुमार की छवि को सुदृढ़ करने का कार्य किया है। निश्चित तौर पर उन्होंने महिलाओं का दिल जीत लिया है। हालाँकि पुलिस द्वारा इस कानून के दुरुपयोग व जहरीली शराब से मौतों ने इस संदर्भ में  चुनौतियों का प्रदर्शन किया है। नशा मुक्ति केंद्र खोलने के फैसले तो लिए गए हैं किंतु इस विषय में अब तक कोई ठोस प्रयास नहीं दिख रहे हैं।

  • Bihar womens reservationसरकार की दूसरी सबसे बड़ी उपलब्धि रही महिला आरक्षण। बिहार जैसे राज्य जहाँ महिलाओं की स्थिति काफी दयनीय है और चौखट लांघने में भी जहाँ उन्हें समस्याओं का सामना करना पड़ता है वहां  इस तरह के फैसले से निश्चित तौर पर दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे। सरकार ने सभी नौकरियों के सभी पदों पर महिलाओं को 35% आरक्षण देने का निर्णय लिया है।
    चुनावी घोषणा पत्र के  मुख्य वादों में से उपरोक्त दोनों वादे लगभग पूरे हुए;  इस हेतु सरकार बधाई की पात्र है।
  • एक अन्य महत्वपूर्ण निर्णय में राज्य के सैनिक या सेना के पदाधिकारी की शहादत पर राज्य सरकार द्वारा 11 लाख रुपए का अनुग्रह अनुदान देने की बात की गई जो कि बेहद स्वागत योग्य निर्णय है।

पर सूक्ष्म मूल्यांकन करके देखे तो साल भर के कार्यकाल में कई नकारात्मक प्रवृतियां देखने को मिली।

  • Image credit - Hindustan Times
    Image credit – Hindustan Times

    भारत के सबसे बड़े क्रिमिनल टर्न्ड पॉलिटिशियन शहाबुद्दीन महागठबन्धन की सबसे बड़ी पार्टी राजद से आते हैं। हाल ही में  शहाबुद्दीन को आरजेडी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जगह देना एक विवादास्पद कदम रहा है। शहाबुद्दीन दर्जनों आपराधिक मामले  में आरोपी रहे हैं। पटना हाई कोर्ट ने उनको हाल ही में जमानत दी थी। ‘साहेब’ के जेल से निकलने पर स्वागत के लिए गाड़ियों की लंबी श्रृंखला और राजद  के राजनेताओं की कतार ने एक गम्भीर प्रश्न खड़ा किया।जेल से निकलते ही शहाबुद्दीन ने नीतीश कुमार की आलोचना की। व्यापक राष्ट्रीय दवाब के आलोक में उनके जमानत के खिलाफ नीतीश कुमार ने कदम उठाए। इस मुद्दे में महागठबंधन के अंतर्विरोध खुलकर सामने आए। अंततः सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से वापस शहाबुद्दीन की जमानत रद्द हो गई और वो पुनः जेल चले गए।

  • सीवान के वरिष्ठ पत्रकार राजदेव रंजन की सरेआम हत्या कांड ने बिहार में स्वतंत्र पत्रकारिता के खतरे को उजागर किया। घटना के आरोपी शार्प शूटर मोहम्मद कैफ को न सिर्फ बाहुबली शहाबुद्दीन के स्वागत में देखा गया बल्कि बिहार के स्वास्थ्य मंत्री तेजप्रताप यादव के साथ भी उनकी एक तस्वीर सुर्खियों में रही। दरभंगा में हुए इंजीनियर्स हत्याकांड आदि ने भी अपराध की भयावहता को दर्शाया।

     


    जेडीयू से निलंबित एमएलसी मनोरमा देवी और आरजेडी के बाहुबली नेता बिंदी यादव के पुत्र रॉकी यादव पर गया में आदित्य सचदेवा की गोली मारकर हत्या के आरोप हैं। ज्ञात हो यह हत्या महज इस बात पर कर दी गई कि उसने उनकी गाड़ी ओवरटेक की थी। इस मुद्दे ने देश भर में बिहार की छवि धूमिल की। सोशल मीडिया पर भी जोक्स की भरमार हो गई। जैसे

    ‘बेटा ओवरटेक मत करियो बिहार में
    वरना गोली मार देंगे कपार में’ जैसे जोक्स !

     

    Image Credit - Hindustan Times
    Image Credit – Hindustan Times

    महिला उत्पीड़न को लेकर जारी रिपोर्ट ने भी बिहार सरकार  इस संदर्भ में नकारात्मक छवि प्रस्तुत किया है। स्वयं आरजेडी विधायक राजवल्लभ यादव पर 10 वर्षीय नाबालिग लड़की से रेप का आरोप है। हाँलाकि राजबल्लभ यादव को पार्टी ने फिलहाल निलंबित कर रखा है। पटना हाईकोर्ट ने 30 सितंबर को इस मामले में राजबल्लभ यादव को जमानत दे दी थी और बिहार सरकार ने पटना हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी और सुप्रीम कोर्ट ने गत मंगलवार को राजबल्लभ यादव को सरेंडर करने का आदेश दिया है।

  • हाल ही में मोतिहारी, गोपालगंज मुजफ्फरपुर से लेकर पटना आदि में रेप के कई मामले दर्ज किए गए।
  • रामनवमी व मुहर्रम एक साथ होने पर सरकार द्वारा प्रबंधन में कमी साफ़  दिखी। आरा से गोपालगंज तक छोटे-छोटे सांप्रदायिक तनाव का बिहार साक्षी रहा। हालाँकि महागठबन्धन ने इस हेतु विपक्ष को जिम्मेदार ठहराया, पर इतने से ही इस तरह के गंभीर मुद्दों को टाला नहीं जा सकता।
  • दलितों के संदर्भ में महागठबन्धन के एक साल का कार्यकाल चिंताजनक दिखा। कैमूर, नरकटियागंज से लेकर जहानाबाद तक दलित उत्पीड़न के मामले प्रकाश में आए। और साथ ही करीब एक साल की अपनी नई पारी में नीतीश सरकार ने कुछ ऐसे फैसले लिए हैं जिससे दलित समुदाय आक्रोश में दिख रहा है।
    हाई कोर्ट के विधि पदाधिकारियों की नियुक्ति में सरकार ने 20 जुलाई को 82 लोगों की सूची जारी की जिसमें एक भी दलित को जगह नहीं मिली। राजेंद्र नाथ जोगी जो कि एससी-एसटी अधिवक्ता जनकल्याण समिति के प्रधान महासचिव है ; ने बीबीसी को दिए अपने एक साक्षात्कार में बताया की सामाजिक न्याय की वकालत का दावा करने वाली सरकार ने इस संदर्भ में दलितों के साथ अन्याय किया है।जून में राज्यसभा की पांच और विधानसभा की 7 सीटों के लिए हुए चुनावों में भी किसी दलित को उम्मीदवार नहीं बनाया गया, हालाँकि विपक्ष ने भी ऐसा ही किया था।साथ ही सरकार ने उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में पढ़ाई के लिए एससी/ एसटी वर्ग के छात्रों के वजीफा को घटाकर अधिकतम ₹15000 कर दिया है जिसपर दलित समुदाय का दर्द साफ़ सामने आता दिखा।
  • प्रोन्नति में आरक्षण पर रोक ने भी बिहार सरकार की किरकिरी कराई।
Image Credit - Abplive.in
Image Credit – Abplive.in

जहां बिहार बोर्ड की 10 वीं परीक्षा में कड़े प्रशासनिक प्रबंधन के कारण 53 प्रतिशत छात्र अनुत्तीर्ण हो गए वहीं महज एक महीने बाद बिहार इंटरमीडिएट टॉपर्स घोटाले का साक्षी रहा। रूबी राय बिहार के शैक्षणिक व्यवस्था की राष्ट्रीय स्तर पर छवि धूमिल करने का एक प्रतीक बन गई। शिक्षा माफियाओं के बड़े नेक्सस का खुलासा हुआ और इस घोटाले में बिहार बोर्ड के कई बड़े अफसरों, दलालों और एक पूर्व एमएलसी की धरपकड़ हुई पर तब तक इस प्रकरण ने एक बार फिर सोशल मीडिया पर  बिहार को व्यंग्य और जोक्स का विषय बना दिया|

 

एक साल में किसी सरकार का मूल्यांकन हम नहीं कर सकते वो भी बिहार जैसे राज्य में जहां अवसंरचनात्मक कमियां,आर्थिक संकट, गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी के साथ प्राकृतिक आपदाओं की लंबी विरासत रही है ।

बहरहाल; कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियों को छोड़कर गत एक वर्ष चुनौतियों से भरा रहा है। राजनीति के अपराधीकरण को रोकने और कई महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय में सरकार का आंतरिक विरोधाभास सामने आता रहा। साफ-सुथरी छवि के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सामने ढेर सारी गंभीर चुनौतियां है। गठबंधन की मजबूरियां नीतीश जी के ठोस नीतिगत निर्णयों को बाधित ना करें तो संभवतया आने वाले वर्ष में महत्वपूर्ण उपलब्धियों की अपेक्षा की जा सकती है।

  अभिनव मिश्रा

14713787_1186749611400303_3930436399892075501_nराजनीतिक सामजिक मुद्दों पर इनके लेख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं. मूलतः बिहार के गोपालगंज से आते हैं. बीएचयू से पढाई की है और अभी जेएनयू में शोधार्थी हैं.

फेसबुक प्रोफाइल के लिए क्लिक करे.

10 Comments on “एक साल-केतना बहार, पूछे बिहार

  • हालाँकि एक साल में किसी भी सरकार का मूल्यांकन तो नही किया जा सकता फिर भी जो भी आंशिक मूल्यांकन आप ने किया है वो पूर्वाग्रह रहित संतुलित और निष्पक्ष विश्लेषण है, इस विश्लेषण में उच्च शिक्षा सम्बंधित सरकार के नीति और रवैये पर भी चर्चा नही किया गया है,कुल मिला के आप की लेखन शैली अतिउत्तम है, आशा करूँगा की आप और भी इसी तरह के सम सामायिक मुद्दे को लिखते रहे, …..शुभकामना के साथ …डॉ नीलेश झा, असिस्टेंट प्रोफेसर ,

    • बहुत बहुत धन्यवाद नीलेश जी। हमारा प्रयास रहेगा आप जैसे सुधी पाठकों की अपेक्षा पर खरा उतरने का।

Leave a reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

आपकी भागीदारी