ग्लोबल गुमटी

boycott pak actor

देशभक्ति का धुंधला चश्मा..

देशभक्ति का धुंधला चश्मा..

हाल ही में पाकिस्तानी कलाकारों को लेकर अच्छा ख़ास बखेड़ा खड़ा हुआ। जिस फ़िल्म में वो हैं या जिस फ़िल्म के कलाकार देश-विरोधी लगते हैं, उनका बहिष्कार करने की माँग हुई है। चलो, इसी बारे में कुछ बात कर लेते हैं फिर।

  • पहली बात ये कि हमारी लड़ाई पाकिस्तान की हिंसावादी सेना से है या शांतिप्रिय जनता से। उरी या कहीं और कैसा भी हमला किया, तो हम भी मुँहतोड़ जवाब देना जानते हैं और समय-समय पर दिया भी है। लेकिन वो जनता, जो सरहद होने के पहले एक ही फ़सल को बाँटती थे, एक साथ लोहरी-ईद मनाती थी, कब से हमारी दुश्मन हो गयी। हमारा प्रेम तो इतना गहरा है कि यही एक ऐसा देश है जो हमारी दी हुई गालियाँ समझ सकता है। और जब दुश्मन नहीं है तो फिर उस जनता में से निखर कर, मेहनत करके आए कलाकारों के साथ दुश्मनी क्यों?
  • प्रश्न हो सकता है कि उस नाकारा देश को सबक़ सिखाने का ये एक तरीक़ा है। लेकिन ये तरीक़ा कुछ भी नहीं। थप्पड़ उसे मारो ना जो बदमाशी कर रहा है। क्या पाकिस्तानी सेना इन हरकतों से डर जाएगी? क्या ऐसा होगा की राहेल शरीफ़ ISI की मीटिंग में बोलेगा- “यार फ़वाद खान अपना लौंडा है, उसकी पिक्चर में इन लोगों ने चुल्ल कर दी है, चलो सुधर जाते हैं।”  बल्कि जनता में, जो कि ख़ुद कई मामलों में सेना और सरकार से परेशान है, भारत की गंदी छवि बनेगी।
  • एक बात हम और समझ लें कि भारत विकास की और बढ़ रहा है और पाकिस्तान घोषित चमन चंपू देश है। सड़क पर दुर्जनों के मुँह लगने के पहले सज्जन सोचते हैं। हम क्यों ना इन ओछी बातों को छोड़ दें। वो लोग भी दिल ही दिल सोचेंगे कि क्या दिलेर लोग हैं, हमारे कलाकारों को कुछ नहीं कहा। हाँ, मुठभेड़ में हमारी बत्ती लगा दी (हमेशा की तरह)।
  • ऐसी फ़िल्मों का बहिष्कार करने से पहले सोचा है कि उसमें कितने भारतीयों ने अपनी मेहनत लगायी होगी। 500  में से  2 पाकिस्तानी होने से कोई भी कला पाकिस्तानी हो जाती है क्या? रिलीज़ यहाँ होनी है, पैसा यहाँ का लगा है, दिमाग़ यहाँ का लगा है (यदि पिक्चर अरिजिनल है तो भी, चुराई हुई है तो भी), फिर काहे का बहिष्कार?
  • एक दिक़्क़त ये “जन-गण-मन” को UNESCO का ख़िताब दिलाने वाली झूठी-मक्कार मीडिया से भी है। कोई भी चड्डी पहना हुआ लड़का कुछ भी पेल देता है और लोगों की देशभक्ति खड़ी हो जाती है। कहीं से झंडा लाए, कहीं से सैनिक लाए और करने लगे बकर- “इसको इतना लाइक करो कि पड़ोसी मुल्क भी इस ठलुआई के मामले में हम से पीछे रह जाए।”  ऐसे क्रांतिकारी देख के तो परसाई जी याद आते हैं जो कहते थे- “जब तक आदमी बेरोज़गार हो या शादी नहीं हुई हो, तब तक ही वो क्रांतिकारी रहता है।”
  • बुरा मानो या नहीं, लेकिन ये बात भी सही है कि हम भी उसी का बहिष्कार करते हैं जिसमें हमें सहूलियत हो। ‘दिलवाले’ इसलिए पिटी थी क्योंकि अच्छी नहीं थी, अच्छी होती तो सब झक मारके देखने जाते। आमिर खान की snapdeal को uninstall करके लोग अपने को तीसमार खाँ समझ रहे थे लेकिन फ़्री की चीज़ uninstall करना क्या बहादुरी है? औक़ात है तो आमिर का ही प्रचार किया हुआ टाटा स्काई घर से बाहर फेंको। इतनी ही देश भक्ति है तो पढ़ाओ बच्चों को सरकारी स्कूल में। ले जाओ गाँव घुमाने। बताओ ‘जय जवान, जय किसान’ का मतलब। और हाँ, ‘दंगल’ अच्छी लगे तो थियेटर में ही देखना, pirated मत ख़रीदना।
  • ख़ैर, बात ये है कि  यदि पाकिस्तान को सबक़ सिखाना है तो ऐसे सिखाना पड़ेगा कि साँप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे। कैसे? 19वीं शताब्दी के इटली के एकीकरण के पीछे ये कारण था कि एक राज्य ने अपने लिए इतना समय दिया, ख़ुद को इतना विकसित किया कि बाक़ी राज्य के लोग उसको आदर्श मानकर उसके साथ/जैसा होने की ठान बैठे। हम भी ऐसा ही कुछ करें।सबको साथ लेकर इतना आगे बढ़ जाएँ कि पाकिस्तान के लोग भी हमारे जैसा बनने की सोचें, हमसे जलें, हमारा नाम आते ही सनक जाएँ। ऐसा तभी होगा जब महावीर का ‘जीयो और जीने दो’, अकबर का ‘सुलह-ए-कुल’ और गांधी द्वारा अपनाया हुआ ‘वसुधैव क़ुटुम्बकम’ हम आगे बढ़ा पाएँगे।

तब तक के लिए सारे कलाकारों कि फ़िल्में देखिए और मजाल कि देश पर कोई ऊँगली उठा दे, जान देने को भी तैयार रहिए।

जय हिंद।

 

लेखक स्वयं को ‘इण्डियास्तानी’ कहलाना पसंद करते हैं और व्यवस्था के सम्बन्ध में बहुत प्रमाणिक ज्ञान व् दृष्टी रखते हैं.

One Comment on “देशभक्ति का धुंधला चश्मा..

Leave a reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

आपकी भागीदारी