ग्लोबल गुमटी

breast cancer

फिर एक गाँठ….

फिर एक गाँठ  

 

उस शाम इला का फ़ोन आया ‘शनिवार को क्या कर रही हो?’ मैं किसी भी दिन क्या कर रही होउंगी नहीं जान पाती. दिन ही यह तय करता है मानो कि मुझसे क्या करवाएगा. कुछ ना करने की भी अपनी व्यस्तताएं होती हैं. यूँ बता पाना कि तुम व्यस्त समझो वैसा व्यस्त नहीं हूँ लेकिन यूँ ही छत पर टंगा पंखा देखने में व्यस्त रहूंगी या खिड़की से बाहर झांकते हुए हर आते-जाते इंसान को देखने में व्यस्त रहूँगी ये कह पाना अभी मुश्किल ही है फिर आखिर मैंने कहा ‘कुछ ख़ास नहीं’. उसने बताया कि शनिवार को उसकी एक दोस्त की बेटी से मिलने उसका पिता आ रहा है. मुझे विटनेस माने गवाह बनना होगा. ये कैसा काम है? तीन वर्ष पहले कुमुद का अपने पति से तलाक हो गया और तब से उसकी बेटी जो अब छः साल की हो गई है से मिलने उसका पिता हर महीने आता है. इला ने बताया कि कुमुद उस आदमी पर ज़रा भी भरोसा नहीं करती चूंकि इला खुद शहर से बाहर है इसलिए चाहती थी कि मैं गवाह बनूँ. ऐसा अजीब-ओ-गरीब काम! लेकिन मैंने हाँ कह दिया.

कुमुद से मेरी पहली मुलाक़ात थी. वह मुझे अपनी गाडी में लेने आई थी. मैंने नमस्ते की उसने हेल्लो कहा. औपचारिक बातें करना मेरे लिए मुश्किल है खासकर जब पहली मुलाक़ात हो. फिर मुलाक़ात का कारण भी झिझक पैदा कर रहा था. चुप्पी को उसी ने तोडा – पढ़ाई कर रही हो? मैंने कहा नहीं नौकरी। मैं उसके अगले सवालों का अनुमान लगा रही थी कि उसने पूछा- बॉयफ्रेंड है? मैं हैरान सी मुस्कुरा दी. ऐसी थी मेरी कुमुद से पहली मुलाक़ात. फिर पूरे एक महीने तक हमारी कोई बात नहीं हुई. यह सोच पाना कि उसके बाद हमारे बीच कभी कोई रिश्ता होगा नामुमकिन था. लेकिन रिश्ता बना. अगले महीने उसका फ़ोन आया ‘अभी 3 बजे हैं 4.30 बजे मैं तुम्हें लेने आ रही हूँ. घर ही हो ना?’, ऐसा आदेश भरा स्वर सुनकर मुझे गुस्सा आया ‘हाँ घर पर हूँ’. मुझे इला पर भी गुस्सा आया क्या ज़रुरत थी मेरा नम्बर देने की. उसने मुस्कुराकर पूछा कुछ ज़रूरी काम तो नहीं था तुम्हें? मैंने मुँह हिला दिया। फिर उसने कुछ नहीं पूछा. मैंने ही पूछा आज फिर उसी दिन की तरह….? उसने खिलखिलाकर कहा अरे नहीं नहीं आज तो मैं खुद ही मिलने जाउंगी। फिर मुझे क्यों….मेरा मतलब है कि…. ‘अरे हाँ देखो दरअसल क्या है न कि आदमियों की जात ही ऐसी होती है… बेईमानी तो इनके खून में होती है… 3 साल से मैं अकेली औरत अपनी बेटी को पाल रही हूँ. मैंने ही बड़ी मुश्किल से इसकी कस्टडी हासिल की थी. लेकिन अब सोचती हूँ कितनी बेवक़ूफ़ होती हैं हम. लड़-मरकर उन्हीं को आज़ाद करती हैं…. उस आदमी के जीवन में क्या बदला. कुछ भी तो नहीं. और मेरे लिए तो कुछ बचा ही नहीं जैसे अब. सो अब सोचा है कि क्यूँ ना ये ज़िम्मेदारी उसी को दे दूँ और खुद चैन से जिऊँ.” अपनी बड़ी गाडी में बैठी वो मुझे खुदगर्ज़ लगी जबकि नहीं लगनी चाहिए थी.

कुछ दिन बाद उसने मुझे बताया कि उसका एक्स-पति बेटी की ज़िम्मेदारी के लिए तैयार है पर उसे कानूनी तौर पर बेटी की पूरी कस्टडी चाहिए. मुझे उस बच्ची के लिए भी बुरा लगा. घर लौटते ही मैंने इला को फ़ोन किया और बताया कि इतने दिनों में कुमुद से मेरी कब-कब और क्या बातें-मुलाकातें हुई. इला ने सब सुनकर बस इतना कहा ‘सुनो कुमुद को कैंसर है.’

अभी तक कुमुद को जब-जब देखा पूरा घटनाचक्र एक फ्लैशबैक की तरह चल पड़ा. कुमुद को ब्रैस्ट कैंसर है. मैंने कुमुद को फोन किया इधर-उधर की बातें की. मैं चाहकर भी उससे कुछ नहीं कह पा रही थी, तब उसने मुझसे कहा कि वह चाहती है कि मैं उससे मिलने रोज़ आऊं और उसके अनुभवों को एक डायरी में नोट करूँ। वो ये मान चुकी थी कि इस बीमारी का कोई इलाज नहीं. और अब उसे सबकुछ दर्ज कर देना चाहिए.

” बड़े होने के क्रम में 13 वर्ष की उम्र में मैं घबरा गयी कि ये कैसी गाँठ हो आयी हैं मेरे और फिर माँ के समझाने पर ही समझ पायी थी. आज फिर 13 साल की वही बच्ची 38 की हो गयी है आज फिर एक गाँठ है. आज फिर वही उलझन है पर सुलझाने को माँ नहीं है. मेरे सपनों में यह गाँठ पहाड़ बन जाती है जिसके बोझ से मैं झुक गयी हूँ.”
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“अभी चार बाल टूटने से डर कर शैम्पू बदलती थी, जतन करती थी रोज़ सुबह तकिये पर बाल देखकर जान सूख जाती है, अभी अगले हफ़्ते ही तो कीमो शुरू होगी। क्या मैं तैयार हूँ इसके लिए? खुद को आईने में देखने के लिए? कैंसर तैयारी देखकर नहीं हुआ है। हममें से कोई तैयार नहीं होता इसके लिए। जागरुकता? वह मृत की तस्वीर के सामने जलती हुई मोमबत्ती है। महत्त्व तो है पर विकल्प नहीं। हर साल सोशल मीडिया पर जागरूकता के नाम पर अपनी ब्रा का रंग, विज़िटिंग सिटी सब बताया। पर जिस फन गेम से ये जागरूकता मैं फैलाती थी उस बीमारी को ही नहीं जानती थी। कैंसर के चेहरे से अनजान थी बिलकुल। अब सोचती हूँ ब्रैस्ट कैंसर अवेयरनेस में महिलाएँ सीक्रेट गेम क्यों खेलती हैं? इसका हिस्सा पुरुष क्यों नहीं? हिस्सा ना सही पर जानें तो कम से कम। जानने वाले पूछते हैं कि ऐसा रोग तुम्हें कैसे हो गया? और खुद ही कारण गिनाते हैं। ज़िंदगी जब सबसे बोझिल मालूम हुई तब भी इसे धुँए की क़ैद में नहीं छोड़ा। ये होना था सो हुआ। अब अगर कुछ है मेरे हाथ में तो वह है साहस।“
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“कीमो के बाद दर्द और अपने बदले रूप दोनों ने अंदर तक तोड़ दिया। थकान और ऊब दोनों है। बहुत कमज़ोरी है, चार कदम चलने से ही सांस फूलने लगती है। तक़लीफ़ होती है, रात-रात भर दर्द और बेचैनी।

मर जाना लड़ने से आसान लगता है। पर आसान नहीं चुनूँगी। जब राकेश से शादी के लिए पापा से ज़िद्द की थी तो पापा ने कहा था आसान रास्ता चुन रही हो। एक अमीर आदमी ऐश-ओ-आराम दे सकता है पर तुम्हें समझेगा ये ज़रुरी नहीं। आज पापा नहीं हैं पर मैं उन्हें बताना चाहती हूँ कि मैंने वो आसान रास्ता छोड़ दिया है। मैंने एक झूठे रिश्ते के बजाय अकेलेपन को चुना है। कैंसर की इस लड़ाई में भी आपकी बेटी आसान नहीं सही रास्ता चुनेगी।

आईने में खुद को देखती हूँ तो ख़ुद को पहले से भी ज़्यादा ख़ूबसूरत महसूस करती हूँ। अब सर को ढककर छिपाती नहीं हूँ। बिंदी, काजल झुमकी सब है। बस बाल नहीं हैं। मेरा अस्तित्व कोई एक चीज़ या अंग तो नहीं है। कभी-कभी हँसकर खुद को तसल्ली देती हूँ कि बाल तो विकलांगता की श्रेणी में भी नहीं आते फिर कमज़ोर क्यों पड़ रही हूँ।“

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“आज डॉक्टर ने कीमो की आख़िरी सिटींग के बाद कहा कि बस स्तन को निकाल देना होगा। स्तनों से पीला पदार्थ बहता है और ये गाँठ भी घुलती नहीं। शरीर दुर्बल हो रहा है और अंदर कुछ है जो फिर भी हार नहीं रहा।

मैं हारूँगी नहीं, हारना ही होता तो ये सफ़र शुरू ही नहीं करती। एक अकेली कहीं भी मर सकती थी, पर मैंने जीवन चुना है। अभी इसका जश्न मनाना बाक़ी है।

डॉक्टर ने कहा कि एक स्तन निकाल देना काफी होगा पर मैंने दोनों का फ़ैसला लिया है। सपाट छाती के साथ भी मैं कुमुद उतनी ही आकर्षक रहूँगी। अब वो कॉलेज वाली दोस्त स्वाति मिलेगी तो बताऊँगी कि लड़कियाँ बड़े स्तनों से नहीं बड़े सपनों से खूबसूरत लगती हैं।“

यह कुमुद का सफ़र था. जो अब उतनी ही सामान्य ज़िन्दगी जी रही है जितना कि वह जीना चाहती थी। जब मौत को चुनने का दिल करे तो क्यों ना एक नया जीवन चुन लें।

 

 

अदिति शर्मा 

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