ग्लोबल गुमटी

बुनियाद के बहाने

धारावाहिक का एक पात्र

धारावाहिक का एक पात्र जब जब कैंसर से मरने की कगार पर होता है तब टाटा मेमोरियल कैंसर अस्पताल के एक डॉक्टर ने धारावाहिक के लेखक मनोहर श्याम जोशी को सन्देश भिजवाया और कहा कि वे कहानी में बदलाव करें और जे बी को मरने न दें वरना इससे देश में लोगों में ल्यूकेमिया यानी रक्त और अस्थि कैंसर की शिकायतें बहुत बढ़ जायेगी| इसलिए डॉक्टर ने जेबी का बोन मैरो ट्रांसप्लांट करवाने की सलाह दी| अब ये एक डॉक्टर की प्रोफेसनल चिंता थी या इस धारावाहिक से जुड़ी करोड़ों भावुकता का एक हिस्सा , उन दर्शकों की तरह जिन्होंने नकारात्मक पात्र निभा रहे अभिनेता के बम्बई में अंधेरी बीच पर टहलने पर उसपर रोड़ेबाजी कर दी थी, पता नहीं|

आज जब हर चैनल डेली सोप की टीआरपी की गलाकाट प्रतियोगिता में भूत-प्रेत, पुनर्जन्म-पूर्वजन्म, चुड़ैल जैसी सास-बहुए, पिशाचों जैसे ससुर-दामाद , इच्छाधारी मक्खी, फैशनेबल नागिन कुछ भी बेच और परोस रहा है तब याद आती है बुनियाद की| मनोहर श्याम जोशी के लेखन में कब कला और जीवन अपने बीच की धुंधली लकीर मिटाकर एक हो जाते है पता ही नहीं चलता| बंटवारे की पृष्ठभूमि पर अगर अमृता प्रीतम, भीष्म साहनी, खुशवंत सिंह जैसे सरहदी अगर बेहतरीन लिखते हैं तो समझ आता है, पर एक कुमाउंनी? कितना गजब का रिसर्च किया होगा इस पहाड़ी ने और किस कमाल से इस रिसर्च को कहानी में ढाला होगा जो एकदम खालिस लाहौरी लहजे वाले पंजाबी ने बुनियाद को एक खिड़की बना दिया| उनके लिए जो बंटवारे में पीछे अपना सबकुछ छोड़ आये थे|

एक खिड़की थी जिसके चौखट से लगकर वो अब एक गैर मुल्क में रह गयी यादों की जागीर देखते थे जिसे न जाने कितने सौ सालों और कितनी दर्जन पीढ़ियों ने खड़ा किया था| बुनियाद में हर बार लाहौर सुनने पर जरूर उनका मन उछल कर रेडक्लिफ लाइन के उस पार चला जाता होगा अपने खेतों, अपनी गलियों अपने नुक्कड़ों, अपनी हवेलियों और अपने बुनियादों में; जहाँ अब उनका शरीर नहीं जा सकता| पर वह अभी भी उनका अपना पंजाब, अपना लाहौर है और अपनी बुनियाद है; मन और यादों में ही सही| ताज्जुब की बात है जहाँ इनका सबकुछ रह गया वहां भी लाखों लोग बुनियाद क्यों देखते थे? उनका आखिर क्या छूटकर इस तरफ आ पड़ा?

इस धारावाहिक ने हिन्दुस्तानी सिनेमा और टीवी जगत को तीन नए जवाहर  सौंपे -आलोक नाथ, कंवलजीत और कृतिका देसाई| गौरतलब बात ये है कि आलोक नाथ को अपना बाबूजी वाला अवतार मास्टर हवेलीराम के अपने इसी पहले स्क्रीन किरदार से मिल गया जिससे आज 30 सालों बाद भी वो नहीं निकल नहीं पाए| तो सबके जाने पहचाने संस्कारी बाबूजी की बुनियाद भी यही बुनियाद थी|

जून 1987 में यह धारावाहिक जब अपने अंतिम एपीसोड की तरफ बढ़ रहा था तब इण्डिया टुडे के उस अंक में मधु जैन अंगरेजी में लिखती हैं – ” यह बुनियाद बहुत टिकाऊ निकली| मंगलवार और शनिवार की शामें अब कभी पहले जैसी नहीं रह जायेंगी|”

5 Comments on “बुनियाद के बहाने

  • यादें ताज़ा कर दीं आपने, हालाँकि उम्र बहुत कम थी उस समय पर पूरा देखा था बुनियाद, और शायद अच्छे-बुरे कार्यक्रमों की शुरूआती समझ इन्हीं बुनियाद , हम लोग जैसे धारावाहिकों ने पैदा कर दी थी कि उस 8-9 साल की उम्र में भी वही पसंद करते थे जो वाकई अच्छा होता था।
    आलोक नाथ बाबूजी ही बने रहे पर बने रहे, कंवलजीत टीवी की दुनिया में शीर्ष पर जाकर न जाने क्यों गुमनाम हो गए।

    • धन्यवाद अनिरुद्ध| लेखन सफल रहा अगर आपको यह पोस्ट पढके बुनियाद के साथ का एक धुंधला सा जुडाव भी फिर से महसूस हुआ तो| और कंवलजीत ने कोई बहुत यादगार भूमिका तो नहीं निभाई पर कई फिल्मों और धारावाहिकों में वो आते रहे| पर फिर भी बुनियाद के बाद उनसे जिस उंचाई को छू लेने की उम्मीद जगी वो प्रसिद्धी वो हासिल न कर सके|

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