ग्लोबल गुमटी

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पद्मिनी तो कल्पना है, असली तो वीर कुंवर-धरमन की प्रेमकहानी है…

पद्मिनी तो कल्पना है, असली तो वीर कुंवर-धरमन की प्रेमकहानी है…

भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के बारे में थोड़ी भी जानकारी रखने वाले ने वीर कुंवर सिंह का नाम जरुर सुन रखा होगा। वैसे तो कुंवर साहब की बहादुरी और योद्धा वृत्ति पर बहुत कुछ लिखा-पढ़ा गया है। इसलिए यह कोई
एक वैज्ञानिक जिस पर टैगोर ने लिख डाली कविता….

एक वैज्ञानिक जिस पर टैगोर ने लिख डाली कविता….

एक वैज्ञानिक जिसे न केवल साहित्य में रूचि थी बल्कि अच्छा ज्ञान भी रखता था.रवीन्द्र जैसे चिरबंधु बसु को मिले जिन्होंने उनके गौरव पर एक बांग्ला कविता भी लिखी…

अपने प्रयोग पर था इतना भरोसा कि चख लिया पोटेशियम साइनाइड

अपने प्रयोग पर था इतना भरोसा कि चख लिया पोटेशियम साइनाइड

उन्होने एक पौधे पर पोटेशियम साइनाइड का प्रयोग किया किन्तु पौधा मुरझाने की बजाय और अधिक खिल उठा. पर उन्हें अपने प्रयोग पर गहरा भरोसा था. इस भरोसे को साबित करने के लिए उन्होने उस पदार्थ को उठाकर चख लिया. ये देखकर वहां बैठे रॉयल सोसाइटी के वैज्ञानिकों की चीख निकल गयी…

फिदेल कास्त्रो की स्मृति में…

फिदेल कास्त्रो की स्मृति में…

कास्त्रो, इंदिरा गांधी को हमेशा से अपनी बहन मानते थे। मार्च 1983 में सातवें गुटनिरपेक्ष आंदोलन के समारोह के दौरान विज्ञान भवन दिल्ली में सरेआम इंदिरा जी को गले लगाया था और इंदिरा जी शर्मा गयी थी. कास्त्रो के बारे में जानिये कुछ और ऐसे तथ्य जो कम ही सुने गए है….

रौनक़ें जितनी यहाँ हैं कुछ औरतों के दम से हैं – इंदिरा गाँधी

रौनक़ें जितनी यहाँ हैं कुछ औरतों के दम से हैं – इंदिरा गाँधी

दरवाजे पर खड़े सब-इंस्पेक्टर बेअंत सिंह ने उनका अभिवादन किया और दरवाजा खोला. जैसे ही श्रीमती गाँधी आगे बढीं, उसने अपनी पिस्टल निकाली और एक मीटर से भी कम फासले से उन पर दनादन गोलियां बरसाने लगा . श्रीमती गाँधी “अरे यह क्या…???” कहती हुई जमीन पर गिर पड़ी

फ़राज़-ए-दार पे भी मैंने तेरे गीत गाए हैं, बता ऐ ज़िंदगी तू लेगी कब तक इम्तिहाँ मेरा

फ़राज़-ए-दार पे भी मैंने तेरे गीत गाए हैं, बता ऐ ज़िंदगी तू लेगी कब तक इम्तिहाँ मेरा

उत्तर प्रदेश के पूर्वी इलाके में बसा एक मामूली-सा शहर आजमगढ़. शहर की ऊबड़-खाबड़ सड़कों और बेतरतीब फैली गलियों से गुजरते हुए कतई ऐसा महसूस नहीं होता कि इस शहर में कुछ खास है. जंग खाई पान की गुमटियों, प्लास्टर
इतिहास में भगत सिंह न होते अगर भाभी न होतीं

इतिहास में भगत सिंह न होते अगर भाभी न होतीं

दुर्गा भाभी  दुर्गा भाभी – दस दिसंबर 1928, लाहौर, एक गुप्त ठिकाने पर बैठक चल रही थी| माहौल में गम और गुस्सा दोनों कमरे की मद्धिम  रोशनी में भी साफ़ दिख रहा था| उत्तेजना के मारे कई मुट्ठियाँ भींची हुई
आपकी भागीदारी