ग्लोबल गुमटी

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प्रेम में भरोसा और ईर्ष्या

प्रेम में भरोसा और ईर्ष्या

किसी का भरोसा एक बार तोड़ने के बाद उसे फिर से बनाना कठिन होता है. जब भरोसा ही फिर से नहीं बन सकता तो प्रेम को पुनर्जागृत करने की कल्पना भी व्यर्थ है.

नयी किताब – क्षितिज रॉय की गंदी बात

नयी किताब – क्षितिज रॉय की गंदी बात

क्षितिज रॉय की गंदी बात   गंदी बात -ये उपन्यास नहीं, मगध एक्सप्रेस है जो एक दिन पटना से एक प्रेम कहानी लेकर दिल्ली आती है और फिर इसमें से प्रेम दिल्ली में कहीं खो जाता है और बस कहानी
बकरे की पूँछ

बकरे की पूँछ

बकरे की पूँछ बकरे की पूँछ ये कौन सी शीर्षक हुआ कहानी का? पूर्वांचल का हरेक बकरा अपनी पूँछ में एक कहानी लिए या कहानी बनने के लिए, ख़ाली खेतो में, खलिहानों में, नहरो के किनारे आपको चरता मिल जाएगा।
भादों महीने की पिया का ख़त…

भादों महीने की पिया का ख़त…

भादों महीने की पिया का ख़त ऐ पिंकिया के पापा गाँव के सारे बाहर रहने वाले लोग यह कहकर घर आ रहे है की भादो में बाहर कोई काम नहीं है। आप भी आ जाइये ना, घर इस बार। बरसात
काजोल और अजय देवगन- गुनाहों का देवता

काजोल और अजय देवगन- गुनाहों का देवता

गुनाहों का देवता की दूसरी किश्त – रोज की तरह आज भी सुधा छज्जे पर कपडे सुखाने आई थी, और रोज की तरह आज भी चन्दर ठीक बगल वाले  पाड़े जी की छत पर लटका पड़ा था…… इधर सुधा का
मिर्ज़ा-साहिबा.. वो कहानी जो प्रेम को अमर कर गयी

मिर्ज़ा-साहिबा.. वो कहानी जो प्रेम को अमर कर गयी

मिर्ज़ा-साहिबा .. वो कहानी जो प्रेम को अमर कर गयी     गहरे दर्द जुदाइयों के, शोले जैसी जान कोई लाल चिंगारी इश्क़ दी, फिर अग्ग लगे आसमान.. मिर्ज़ा ने कई दफ़े देखा था उसे, संग-साथ बचपन का जो बीता
रेशम का रुमाल

रेशम का रुमाल

रेशम का रुमाल आज चन्दर कुछ ज्यादा ही चहक रहा था, सबेरे से ही एकदम लटपटा गया था, बाल संवार तो रहा था पर न जाने आज क्या हो गया था कि उसे पसंद नहीं आ रहा था, खैर जल्दी
लाइफ इन अ मेट्रो..

लाइफ इन अ मेट्रो..

लाइफ इन अ मेट्रो.. भीड़ से भरी मेट्रो में महिला सीट पर अपना क़ब्ज़ा जमाये औरत सरीखी लड़की। कानों में इयरफोन घुसाये , दाएँ हाथ में मार्कर से कुछ अंडरलाइन करते अंग्रेज़ी शब्द और बाँए हाथ में सिल्वर पेपर में
आप क्यूँ चले गए निर्मल?

आप क्यूँ चले गए निर्मल?

डायरी में बंद इक सवाल  “मुझे तब लगा था – जैसे हम एक ऊंचाई को छू कर नीचे उतर रहे हैं…वह अब नहीं थी, लेकिन उसकी चकराहट बाकी थी… पगडंडी के अगले मोड़ पर पहुंचकर पहाड़ी खुल गई थी…और तब
फिर एक गाँठ….

फिर एक गाँठ….

फिर एक गाँठ     उस शाम इला का फ़ोन आया ‘शनिवार को क्या कर रही हो?’ मैं किसी भी दिन क्या कर रही होउंगी नहीं जान पाती. दिन ही यह तय करता है मानो कि मुझसे क्या करवाएगा. कुछ ना
भारत बनाम इंडिया..

भारत बनाम इंडिया..

भारत बनाम इंडिया.. इस धरती पर जब आदम हव्वा ने  सेब खाया तब से क्लास एंड कल्चर का जन्म हो गया। हम अक्सर सुना करते हैं फंला कितना सिविलाइजड है अपने क्लास को कितना मेंटेन कर रखा है, आज के
मेरी मिट्टी में पड़ी एक सूखी जड़ की कहानी

मेरी मिट्टी में पड़ी एक सूखी जड़ की कहानी

मेरी मिट्टी में पड़ी एक सूखी जड़ की कहानी   मेरा मोहल्ला अब बूढ़ा हो चला है. ये तब की बात है जब भिलाई, मध्य प्रदेश का हिस्सा हुआ करता था. औद्योगिक नगर भिलाई बहुत पहले ही समय की दौड़
मैं तुम्हारा साहिर होना चाहता हूँ

मैं तुम्हारा साहिर होना चाहता हूँ

मैं तुम्हारा साहिर होना चाहता हूँ.. वो दोनों मिले और सब कुछ सपने सा था. बेतकल्लुफी के रास्ते एक रिश्ता लिखा जा रहा था छंदमुक्त कविता की तरह. जब नींद किसी के एहसास में सिमटती थी और सुबह उसकी रौशनी
​और एक दिन लखनऊ से………..अवध की मुलाकात

​और एक दिन लखनऊ से………..अवध की मुलाकात

और एक दिन लखनऊ से…………अवध की मुलाकात   “आज तड़के सुबह ही नींद खुल गयी, सुबह हलकी ठण्ड रहती है तो जोड़ों में दर्द उठता है. उठकर सोचती हूँ कि चाय बना लूँ. चीनी ख़त्म होने को है, ये चीनी
पता है, आज यह चिट्ठी कहाँ आकर लिख रही हूँ??

पता है, आज यह चिट्ठी कहाँ आकर लिख रही हूँ??

पहाड़ को प्रेमपत्र पता है, आज यह चिट्ठी कहाँ आकर लिख रही हूँ?? अल्मोड़ा. वहीं जहाँ तुम मुझे छोड़कर आगे के लिए बढ़ गए थे। इस बीच वो सारे पहाड़ घूम चुकी हूँ जिनके नाम मेरी हथेली पकड़कर मेरी उंगलियों
गुनाहों का देवता

गुनाहों का देवता

गुनाहों का देवता-आँसुओं से भीगी एक प्रेम कहानी गुनाहों का देवता- बगीचे में नरम घास पर लेटकर बादलों को देखती हुई दो सहेलियाँ- सुधा और गेसू . सुधा जो ज़िन्दगी को यूँ ही बादलों को देखते हुए बिता देना चाहती है
आपकी भागीदारी