ग्लोबल गुमटी

छठ और बिहारी

छठ-जब नास्तिकता भी दंडवत हो जाए…

ये बिहारी जो कहीं गाली तो कहीं होशियार, मेहनती आदि की कैटेगरी के जाने जाते हैं आजकल भारतीय रेल को जबरदस्त फायदा पहुंचा रहे हैं। उनकी संख्या जिसे जनसंख्या भी कहते हैं के हवाले से भारत के हर शहर का बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन का हॉल बेचैनी से ठूंसा हुआ हो गया है। 4 महीने पहले होने वाले आरक्षण का टिकट अपने पहले मिनट में लिए जाने के बावजूद ‘वेटिंग’ का स्टेटस बनाये रखता है तो तत्काल में 10-10 गुना ज्यादा पैसे देकर कन्फर्म टिकट पाने वालों के साथ 20 घंटे के सफ़र को ‘एडजस्ट’ करके ख़ुशी-ख़ुशी काटता है। ट्रेनों की हालत किसी अनाज की बोरी से कम नहीं होती जहाँ घनत्व सर्वाधिक होता है। कार्तिक माह के इस पलायन की तुलना हम सारे ऐतिहासिक पलायनों से परिमाण के आधार पर तो जरूर ही कर सकते हैं। दीवाली में राम भी घर आये थे, या यूँ कहे कि दीवाली तभी मनी जब राम उधार लिए पुष्पक विमान से अयोध्या को लौटे। आजकल हज़ारों रुपये देकर भी, एम पी, एम एल ए कोटा लगाकर भी आप राम की तरह घर नहीं लौट सकते। 

फिर भी सब लौट रहे हैं। उन्हें उनका घर, गांव, घाट, पटाखों के अलावा बिहार टूरिज्म वाला विडियो भी बुलाता है। नॉन रेजिडेंट बिहारियों से ‘ठेकुआ’ की फरमाइश लिए बिहारी लौट रहे हैं जैसे तैसे! जैसे बिहारी फैले हैं हर ओर, उनके रीति रिवाज, त्योहारों का जाना भी लाजमी है। गंगा, गंडक, बागमती का घाट हो तो उत्तम वरना नहर, पोखर से भी आगे लोग समंदर और छत पर ‘बाथ टब’ को नदी का रूप देकर छठ मनाते ही हैं।

बिहारियों के लिए दीवाली महज छठ के लिए किये गए साफ़-सफाई का डेमो होता है या यूँ कहे कि रिहर्सल है दीवाली छठ की| सारी तैयारियां छठ के लिए होती हैं| चाहे नए कपड़े पहनना हो या ज्यादा से ज्यादा पकवान और मिठाइयाँ खाना। 4 दिन चलने वाले इस महापर्व में व्रती निर्जला रहकर शुद्ध अनाजों से प्रसाद स्वरुप पकवान बनाती हैं जिसे उगते और डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। छठ इकलौता ऐसा पर्व है जहाँ डूबते सूर्य की पूजा होती है।


आप नीयत से नास्तिक हो सकते हैं; मैं भी हूँ, पर छठ पर्व के सारे विधि विधान से होकर गुजरिये आस्तिकता आपकी उंगली थाम लेगी। माँ दादी कहती हैं ‘छठ परमेश्वरी में बहुत सत है’ और इसका एहसास भी होता है । कार्तिक महीने की ठण्ड में छाती तक ठंडे पानी में घंटों खड़े रहकर सूर्य देवता को ध्यानस्थ करना, 4 दिन बिना जल पूजा की सारे अनुष्ठानों में सक्रियता से सरीक होना और फिर भी परायण करने की जल्दी के बिना सबको प्रसाद वितरण करते रहना..इन सबसे गुजरता हूँ तो माँ दादी के उस ‘सत’ का एहसास होता है।

उगते सूर्य को सब दंडवत होकर नमन करते हैं मानो हम जैसों की नास्तिकता दंडवत हो जाती है। आखिर कुछ तो है जब इस एक पर्व के पवित्रता की ताकत देश-विदेश से सबको खींच लाती है। मैं उस कुछ के ज्ञान से बेखबर हूँ| जिन्हें उस एहसास को अपने भीतर भरना हो या इस शक्ति को सैद्धान्तिक रूप में शब्दबद्ध करना हो वो एक बार छठ में बिहार जरूर पधारें।

chhath and bihariरोहित कुमार

लेखक मूलतः मोतिहारी, बिहार से हैं| दिल्ली विश्वविद्यालय से शिक्षा हुई है|  लिखना पढना प्रिय शगल है और फिलहाल डीयू में शोधार्थी हैं|

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2 Comments on “छठ-जब नास्तिकता भी दंडवत हो जाए…

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