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हिंदी की तेरहवीँ का वार्षिक उत्सव

हिंदी की तेरहवीँ का वार्षिक उत्सव

आज पुनः हिंदी की तेरहवीँ का वार्षिक उत्सव है,यानि चौदह सितंबर। हिंदी को श्रद्धा से याद करने का दिन,एकाध पोस्ट और अखबारोँ मेँ लेख-निबंध से तर्पण करने का दिन। हिंदी थी मेरे देश की बिँदी टाईप गरूड़ पुराण गाने का दिन। एक बात सब जानते हैँ कि हिंदी केवल हमारे भावना के कारण याद नही आती है बल्कि संविधान के अमिट पन्नोँ मेँ भी भाग-17, अनुच्छेद 343 A मेँ लिखा हुआ है कि हिंदी  देवनागरी लिपि मेँ संघ की राजभाषा होगी।

अब संविधान मेँ बहुते बात लिखल है; बातेँ हैँ बातोँ का क्या? ये अंग्रेजी का नाम सुना है न आपने। हिंदी खातिर अंग्रेजी मेँ मैसेज आ रहे हैँ”happy hindi day”। अंग्रेजी बोलने वाला हिंदी बोलने वालोँ के बीच वैसे ही है जैसे सियारोँ के बीच लकड़बग्घा। हिंदी वाला चाहे जितना तर्कपूर्ण बात कर रहा पर लकड़बग्घा को देखते अपनी पूँछ दबा लेता है। हिंदी को उतना खतरा अंग्रेज और फ्रांसीसी से नहीँ रहा जितना अपने बीच के इन सियारोँ से जिन्होँने अंग्रेजी मेँ पुँछ रँगाये अपने को लकड़बग्घा बनाये रखा है।

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ये वर्ग अपनी अंग्रेजी क्षमता को अपना वैशिष्टय मान हिंदी को चिढ़ाने-गिराने मेँ ही परमसंतोष और आनंद पाता है। पता नही एक अतिरिक्त योग्यता का स्थान रखने वाली अंग्रेजी कब हमारी एकमात्र अनिवार्य योग्यता बन गई और केवल हिंदी जानना एक निर्योग्यता बन गई। पर ऐसा नही है कि ये सब कोई लाठी के बल पर हुआ बल्कि इस मामले मेँ तो आजादी के पहले ही की गई मैकाले की भविष्यवाणी सारे ऋषि मुनियोँ से ज्यादा सटीक निकली जब उसने कहा था कि”आने वाली पीढ़ी बस रंग से भारतीय होगी पर विचार,भाषा,प्रज्ञा मेँ वे अंग्रेज होँगे”।हाँलांकि ये अलग बात है कि ग्लोबल वार्मिँग के कारण अब अंग्रेज भी रंग रूप मेँ हमारे जैसे दिखते हैँ पर जो हो मैकाले सही निकला। मैकाले के आत्मविश्वास का कारण हिंदी की कमजोरी नहीँ थी बल्कि जीविकोपार्जन के अर्थशास्त्र के साथ बँधी अंग्रेजी के डोर की मजबुती थी।

समय के साथ ये डोर मजबुत रस्सी बनती गई।अंग्रेजी वैश्वीकरण के जीभ पर सवार हो उद्योग और पेट की भाषा बनी।आलम ये कि जो ये डोर तोड़ेगा भुखे मरेगा।अंग्रेजी पेट के तंत्र से जुड़ गई और यहीँ हिंदी उससे पिछड़ गई।बचपन से एक नारा सुना हमने”अच्छा नौकरी,अच्छा जीवन चाहिए तो अंग्रेजी सिखो।दुसरी ओर, हिंदी रह गई कहानिगीरी और कविताई की भाषा बनके।आज सिविल सेवा से लेकर पिज्जा हट्र मेँ वेटर बनने तक मेँ नौकरी का आधार अंग्रेजी से जोड़ दिया गया है ऐसे मेँ भला हिँदी की पीठ पर बैठ बस ज्ञानपीठ के लिए लिखने का क्या मतलब?अंग्रेजी ने अर्थव्यवस्था मेँ वो रूतबा कायम किया कि 10 लाइन की गिट पिट ईंग्लिश बोल आप कॉल सेँटर मेँ 13 हजार की नौकरी पा सकते हैँ पर हिँदी के पास ऐसा कोई आर्थिक आधार नहीँ है।जो भाषा पेट से जुड़ेगी वो अनिवार्य हो जायेगी और अंग्रेजी ने व्याकरण और शुद्धता से परे वही किया।आप ज्ञान भले हिंदी  मेँ पा लिजिए पर सबको पता है कि पैसा तो अंग्रेजी देगी सो वही सबसे जरूरी लगेगी।

हिंदी ने दिमाग मेँ कविता उपजाई,गले ने गजल मेँ ढाल गाया और गरदन से नीचे उतर दिल तक तो समाई पर उससे नीचे ये पेट तक कभी पहुँच ही नहीँ पाई।हमने इसे सर चढ़ाये रखा,इसकी शुद्धता,व्याकरणीयता को संजोये इसे कवियोँ और साहित्यकारोँ के झोले मेँ नजरबंद किये रखा,खुद बाजार से गुजरे,बाजारू हुए पर हिँदी को बाजार ना दिखाया,दुनिया मेँ आजाद घुलने मिलने ना दिया।अपनी कलम का गुलाम बना के रखा बेचारी को। हिंदी की गरीबी रेखा का अंदाजा लगाईये। ज्ञानपीठ विजेता अमरकांत का अभावग्रस्त जीवन,अदम गोँडवी की इलाज के अभाव मेँ मौत और दुसरी तरफ लँगड़ईँग्लिश राईटर चेतन भगत की समृद्धि ये बताने के लिए काफी हैँ कि भाषा को टिकने के लिए केवल प्रतिभा नहीँ बल्कि एक व्यवसायिक आधार भी चाहिए।

एक समय अपने स्वाभिमान के लिए अपने सुनहरे दौर मेँ बॉलीवुड छोड़ आये कवि नीरज को आज कुछ वर्ष पूर्व हजार हजार रूपये मेँ अपनी रचना बेचनी पड़ी, हिंदी की प्रतिभा और उसका स्वाभिमान कभी पेट की मजबुरी के आगे ऐसे भी हारा है। कुल मिलाकर अगर आप हिंदी को बचाने बढ़ाने की बात करना चाहते हैँ तो इसे एक आर्थिक आधार देने की बात करिये।UNO मेँ भाषण देने से या हिंदी मेँ कागज पत्तर से हिँदी रोटी नहीँ पैदा कर सकती साहब।अगर हम अपनी भाषा मेँ एक काम भर की नौकरी और सम्मानपूर्वक जिँदगी नहीँ दे सकते तो फिर सब प्रयास बेमानी है।

दुनिया के कई बड़े देशोँ ने अपने अर्थव्यवस्था के आधार मेँ अपनी भाषा को रखा है। पुरातन काल मेँ भी राजाओँ ने अपनी जरूरत के हिसाब से ज्ञान विज्ञान की किताबेँ अपनी भाषा मेँ अनुवाद करायीँ। क्या हम अपनी भाषा मेँ आधुनिक तकनीक और ज्ञान नहीँ पा सकते? टिकना है तो पाना ही होगा। सो आईए आज माना अंग्रेजी हमारी जरूरत है सो आप अंग्रेजी भी सीखीये, इसे उपयोग मेँ लाइए क्योँकि तत्काल यही रोटी देगा। पर बाजार पर कब्जा करिये, हिंदी की जड़ मेँ पैसा डालिए,पैसा उगाईए। हिंदी को एक ताकतवर कमाऊ आधार दीजिए और एक हिंदी  आधारित आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था खड़ा करिये तभी हम आने वाली पीढ़ी के लिए हिंदी को बचा के रख पायेँगे।तब ही ये 14 सितंबर का पिंड दान बंद हो पायेगा और तब हम हिंदी  का नहीँ बल्कि हिंदी का कमाया अपना उत्सव मनायेँगे।

खैर ये सब जब होगा तब होगा,फिलहाल इस हिंदी दिवस पर हे हिँदी मेरा तर्पण स्वीकार करो ।

जय हो।

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6 Comments on “हिंदी की तेरहवीँ का वार्षिक उत्सव

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