ग्लोबल गुमटी

#DearZindagi …….एक बात कहें तुमसे

Dear Zindagi का ट्रेलर देखा, एक ज़िन्दगी से कन्फ्यूज्ड लड़की के रोल में अलिया जिसे उसकी भाषा में कहूँ तो “रिलेशनशिप इश्यूज “ हैं उसके life कोच के करैक्टर में शाहरुख़ की कहानी सन्डे की अलसाई दोपहर जैसी लगती है-बिना किसी ज़ल्दबाजी के. गौरी शिंदे पहले भी हमें इंग्लिश विन्ग्लिश जैसे एक हटकर टॉपिक पर फिल्म बनाकर सरप्राइज कर चुकी हैं.

तो ये चिट्ठी ज़िन्दगी के नाम लिख रही हूँ, Dear Zindagi का ट्रेलर देख कर.

डिअर ज़िन्दगी

पिछले साल इसी वक़्त, मैंने एक अपने को खो दिया.

सुबह 4 बजे अचानक से फ़ोन बजा, ये बेवक्त के कॉल से डर लगता है मुझे, मन भी कितना बावरा होता है सबसे पहले गलत ही सोचता है. पर सोचना क्या, गलत हो चुका था. मैंने फ़ोन को बजने दिया, लगा कि जैसे ही इन्कमिंग  कॉल, मिस्ड कॉल में बदलेगी वो खबर भी लौट जाएगी.

पर ऐसा हुआ नहीं. वो जा चुका था.

उसके जाने की उम्र नहीं थी, पर वो जा चुका था.

और दूसरी ओर पर कोई रो रहा था पर मुझे कहना क्या था – रोना नहीं (क्या ये संभव है?) सब कुछ ठीक हो जायेगा ( क्या कभी कुछ ठीक हो पायेगा उसके बिना ?) हम सब साथ हैं ( अपने हिस्सों की यादों में हर इंसान अकेला होता है).

मैंने कुछ नहीं कहा.

मैं कुछ कह नहीं पायी.

मेरे कहने से कुछ रुकना नहीं था- न उसका जाना, न किसी का रोना.

हम सब जानते हैं कि एक दिन सबको जाना है पर हम उसके लिये तैयार नहीं होते कभी भी.हम प्लान्स बनाते हैं – करियर के प्लान्स, घर, गाड़ी,शादी, बच्चों के नाम, बच्चों के करियर, बीच बीच में हॉलिडे, एक रिटायरमेंट होम, पेंशन और न जाने कितना कुछ.बल्कि हमें ये भी नहीं पता होता कि बस अगले पल क्या होने वाला है.

मैंने अपने चारों ओर देखा, मुझे लगा सब कुछ रुक जायेगा, उस दिन हवा नहीं चलेगी, सूरज नहीं निकलेगा. पर ऐसा हुआ नहीं.

हम सब भाग रहे हैं, सेटल होने के लिये, एक होड़ लगी हुई है दूसरों से बेहतर बनने के लिये, पिछले साल के खुद से बेहतर होने के लिये, जब हम छोटे होते हैं तभी हमें यह सीखा दिया जाता है कि डार्विन बाबा कह के गये हैं “सर्वाइवल ऑफ़ फिटेस्ट”.

पर ये फिटेस्ट क्या होता है, क्या कभी कोई फिटेस्ट हो सकता है? हम किसी न किसी कम्पार्टमेंट में तो कम पड़ ही जायेंगे न. कोई कमी तो हम सभी में होगी? क्या अपनी अपनी कमियों के साथ हम सर्वाइव नहीं कर सकते?

डिअर ज़िन्दगी, तुम हमें टुकड़ों में मिलती हो, हम फासलों के बीच तैरते हैं, फैसलों पर रुकते हैं ,एक ख़ुशी का दौर तो एक तकलीफ की लहर और इन्हीं सब के बीच हम ज़िन्दगी नाम की किताब के क्लाइमेक्स में पहुँच जाते हैं. और मौत, वो हमें कभी वक़्त नहीं देती, कुछ ऐसा कहने को जो रह गया हो कहना, किसी असफलता पर आँसू बहाने के लिये, किसी रिश्ते को टूटने से रोकने के लिये या फिर सिर्फ एक अलविदा कहने के लिये.

इसीलिए डिअर ज़िन्दगी, आज किसी दोस्त को खोने के पूरे एक साल बाद एक बात कहें तुमसे: मैंने जाना है कि:

 चलो हम अपनी गलतियों को जाने, सुधारना न भी हो तो एक सॉरी तो बोल दें अगर किसी को तकलीफ पहुँचाया हो हमने.            

जो कहा नहीं वह कह देते हैं, इंतज़ार के रास्ते पर फैली चुप्पी भी तो मौत की तरह है – रहस्यमय और डरावनी.                          

अपनी असफलताओं पर भी जश्न मानते हैं, वो भी ज़िन्दगी की तरह टेम्पररी हैं.                                                                            

तकलीफ देने वाले रिश्तों से आगे बढ़ते हैं. कहीं पर अटक जाने के लिये ज़िन्दगी बहुत छोटी है.                                                

 जिनसे हम प्यार करते हैं, उन्हें आज वक़्त निकाल कर बताते हैं कि वो मायने रखते हैं हमारी ज़िन्दगी में .                                    

इस ईमेल, व्हाट्सएप्प, फेसबुक के ज़माने में किसी को चिट्ठी लिखते हैं अपने हाथ से.

ट्रेवल करते हैं बिना किसी प्लानिंग के क्यूंकि यात्राएँ यादें बनाती हैं तस्वीरों की शक्ल में  और हमारे जाने के बाद ये तस्वीरें हमें मुस्कुराते हुये जिंदा रखती हैं.

पैसों को उतना ही महत्त्व देते हैं जितने के वो काबिल है, एक सुकून भरी ज़िन्दगी के लिये. ये ज़िन्दगी के सपनों से, रिश्तों से, परिवार से, दोस्तों से और किसी काश की कीमत के ऊपर नही .

Dear Zindagi आओ तुमसे एक लम्बा इश्क करते हैं इससे पहले कि जाने का न्यौता आ जाये.

डॉ. पूजा त्रिपाठी 

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