ग्लोबल गुमटी

जिंदगी@नॉर्थ कैम्पस

फिर उसी बेवफा पे मरते हैं फिर वही जिंदगी हमारी है.........

North Campus, दिल्ली का जन्नत, श्री राम कॉलेज, मिरांडा हॉउस, दौलतराम, हिन्दू हंसराज, किरोड़ीमल, आर्ट्स फैकल्टी, डी स्कूल, रामजस, सेंट स्टीफेंस……हर जगह का यहाँ एक शानदार, यादगार इतिहास है। यहाँ के हर एक कोने में हजारों किस्से कहानियां तैरती हैं, यादे जुड़ी हुई हैं इनसे जो भुलाये नहीं भूलती, सच में इस जगह से मुझे मुहब्बत है जैसे मुझसे पहले यहाँ पढ़ने वालों को रही होगी और आने वाले नए परिंदों को होगी….अब ऐसा लग रहा है कि यह मुझसे छूटा जा रहा है चाह के भी नहीं पकड़ पा रहा हूँ, मन तो कर रहा है, सारे क्लासमेट को बुलाऊँ और दोबारा एडमिशन ले लूँ लेकिन क्या कहिए क्या रखे हम तुझसे यार ख़्वाहिश, यक जान ओ सद तमन्ना यक दिल हजार ख्वाहिश…. अब यह मुमकिन नही….।

                                                                                Image credit – dubeat.com

यहाँ की फिजाओं में कुछ ऐसा है कि इससे मुहब्बत हो जाती है इसकी मिटटी से, डी स्कूल की कैंटीन से, मिश्रा जी के बकवास ढाबे से और उस घण्टों इंतजार कराने वाले सुदामा चाय वाले से भी और हाँ लड़के को लड़की से भी, लड़की को लड़के से भी…..। कहा तो यहां तक जाता है कि तुम्हे डीयू में पढ़ते वक्त प्यार नहीं हुआ तो तुम डीयू के रेगुलर स्टूडेंट ही नहीं हो….। यहाँ दिल्ली का लौंडा भी आता है और आँखे फाड़े गाँव का छोरा भी…..।

मैं दूसरी कैटगरी में था…। लगता था जैसे जन्नत मेरे नसीब में लिख दी गयी हो….। खूब ढ़ेर सारे दोस्त मिले और जल्द ही घर की याद भी जाती रही…5 साल कैसे हवा में फुर्र हो गए पता तक न चला। हम फर्स्ट ईयर में एक दूसरे को जानने पहचानने लगे…खासकर हर लड़का लड़की को। मुझे ये सारी चीजे बकवास लगती थी लगता था कि जैसे ये अपने माँ बाप के पैसे फूंकने आ गए हैं राक्षस….गैर जिम्मेदार,माँ बाप के आंखों मे धूल झोंक रहें हैं और क्या….?  पढ़ने के बजाय कैंटीन में रहते हैं,पढ़ने से मतलब ही नहीं हो जैसे…। साल बीतते बीतते ग्रुप बनने शुरू हो जाते थे,हर लड़का लड़की अपने मिजाज का साथी ढूंढ ही लेता था जो नहीं ढूंढ पाता था वह कहीं चिपक लेता था। पहले साल के वेलेंटाइन तक आते आते अधिकतर लड़के किसी के प्यार में गिरफ़्त हो ही जाते हैं कुछ गर्लफ्रेंड बॉय फ्रेंड बन जाते हैं कुछ इस प्रक्रिया में लगे रहते हैं सही मौके की तलाश में और वह कभी मिल जाता है कभी चिड़िया हो जाती है फुर्र……। हमारे तरह के गांव से आये छोरे मुआयना ही करते रह जाते हैं या  पढ़ाई में मुहब्बत ढूंढने लगते हैं। खैर आँखे चौंधियाती तो सबकी ही हैं….। ग्रेजुएट होते होते ब्रेकअप का भारी दौर चलता है लगभग हर लौंडा दिल के टूटने का रोना रोता है। बड़ा गमगीन दिन होता है सारी दुनिया ही उजड़ी उजड़ी लगती है, दिल बैठा जाता है, उसी बेवफा की याद आती है जिसने तुम्हारे मुहब्बत की कद्र नहीं की खैर मुहब्बत में नहीं है फर्क जीने मरने का उसी को देखकर जीते हैं जिस काफ़िर पर दम निकले…..।

sac-ac-in                                                                                      Image credit – Sac.ac.in

सीनियर बताते थे की मिरांडा हॉउस की लड़कियों से नौ हाथ दूर रहकर बात करना, लेडी श्रीराम, गार्गी, आई पी की लड़कियों से दोस्ती कर सकते हो, गर्लफ्रेंड बन जाये तो और भी अच्छा; ब्रेन विथ ब्यूटी, पर बेटा शादी करनी हो तो दौलतराम इज द बेस्ट…..हम मुँह बाये आँखे फाडे सुनते रहते थे। पर कहाँ प्रेम नियम कानून देखता है लग गयी अच्छी तो बस लग गयी अच्छी….साल दर साल उसके पीछे कैसे काट लिए पता तक न चला….ढेर सारे वादे, ढेरों सपने सजोते सजोते ग्रेजुएट हो लिए फिर अचानक एक दिन ब्रेकअप…..कुछ दिन गजल सुनने का शौक़ चढ़ता है ग़ालिब की शायरी से मुहब्बत होती है। एक से बढ़ कर एक दर्द वाले गाने सुनते हैं और इसके लिए कोई भारी मशक्कत नहीं करनी होती हर दूसरा तीसरा सीनियर दे देता है एक लम्बा स्पीच सुनाने के बाद और उस वक्त यह स्पीच बड़े काम की भी लगती है,फिर जोर जोर से गाने का दौर……

-मुहब्बत की झूठी कहानी पर रोये…..

-हर जुल्म तेरे याद हैं, भुला तो नही हूँ

अए वादा फरामोश मैं तुझसा तो नहीं हूँ..

नूश्तर क्यों मुझे देखता रहता है जमाना

दीवाना सही उनका तमाशा तो नहीं हूँ….

-पत्थर के सनम तुझे हमने मुहब्बत का खुदा जाना….

-हर किसी को मुकम्मल जहाँ नही मिलता

-ऐसा नही की इस जहाँ  में प्यार नहीं

मगर जहाँ ढूंढो वहाँ नही मिलता

-हमको किस के ग़म ने मारा ये कहानी फिर सही …

खैर यह सिलसिला बड़ा लम्बा चलता है यह उस पर निर्भर करता है कि लौण्डे में दर्द कितना है, उसने कितना जबर प्रेम किया…..। कई लड़कों से तो रास्ते भी गुफ्तगू करने लगते हैं और उनसे पूछने लगते हैं बोल तेरा हमसफ़र कहाँ है….कितनों को कितनी बार सफाई दे बेचारा। कई नफरत का दिखावा भी करते हैं पर मुहब्बत का एक कोना उसी के प्रेम में गिरफ़्त होता है…….। कुछ भुलाना भी चाहे तो भुलाने नहीं देते ये  दोस्त कमीने…..ऊपर से सीनियरों का भाषण,पहला प्यार भूलता है भला,बहुत टाईम लगेगा बेटा, लो बियर पीओ और चिल्ल मारो…..। इश्क का बुखार तब टूटता है जब शुरू होता है नौकरी का टेंशन ,कई तो तब भी नहीं जग पाते…..लेकिन भागम दौड करते करते,धक्का मुक्की खाते खाते कहीं न कही लाईफ सेट  हो ही जाती है,जिंदगी किसी के लिए रूकती है भला….।

                                                                             Image credit – The Hindu

पर डीयू  का स्टूडेंट अपने इस जन्नत को,इस जवानी को याद जरूर करता है, इस जिंदगी को जीना दोबारा चाहता है। कौन जाए यहाँ की गलियाँ छोड़कर….पर जिंदगी है की आपको घसीट ले जायेगी; इन तारों के आगे जहाँ और भी है और ठीक ही है ‘फिर दिल में क्या रहेगा जो हसरत निकल गयी……पर क्या करें –अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजै/लौट जाती है उधर को भी नजर मग़र क्या कीजै…….. 

Deepak jaiswalदीपक जायसवाल

लेखक मूलतः कुशीनगर, उत्तरप्रदेश से हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य की पढाई की है। लिखने-पढ़ने का शौक रखते हैं। इनके लेख और रिपोर्ट्स कई पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहते हैं। संप्रति उत्तरप्रदेश सरकार की सेवा में कार्यरत हैं|

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