ग्लोबल गुमटी

धनोल्टी

शुक्रिया ड्रैकुला पौड़ी-गढ़वाल को बख्श देने के लिए

धनोल्टी-पार्ट -1

धनौल्टी -जिसने भी ब्रेम स्टोकर की ड्रैक्युला पढी होगी उसे कार्पेथिया की पहाड़ियों में बसे ड्रैक्युला के महल की ओर जाने के रास्ते का रीढ़ सिहरा देने वाला वर्णन जरूर याद होगा। जब बग्घी ड्रैक्युला के क्षेत्र की सीमा में प्रवेश कर जाती है तो धुंध से भरी सड़क पर दोनों ओर के जंगल रोशनी की कमी से ज्यादा परछाइयों से अँधेरे लगते हैं और झाड़ियों में से खूनी लाल आँखें दिखा दिखाकर भेड़िये अपनी मौजूदगी जताते रहते हैं।

 बग्घी के घोड़े अपनी इच्छा के पुरजोर विरुद्ध भी काउंट ड्रैक्युला के महल की ओर अवश खींचे जाते रहते है। रोशनी के नाम पर भेड़ियों की लाल आँखें और बग्घी के कोचवान के पैरों के पास लटका हुआ पीली रोशनी वाला एक सहमा हुआ लालटेन होता है। अगर आप ऐसा वर्णन पढ़कर रोओं में उठती झुरझुरी को भी एन्जॉय कर लेते हैं तो आपको धनोल्टी जरूर जाना चाहिए।

धनोल्टी से मेरा परिचय मसूरी शहर के अंतिम सिरे पर एक छोटी सी चाय दुकान पर बैठे दो बूढ़ों ने कराया था। दोस्तों के साथ पहाड़ों की लंबी यात्रा के दौरान मसूरी पहुंचकर और उससे घोर निराश होकर हम जब अपनी कारें वापस दिल्ली की दिशा में बैक कर रहे थे तो उन कुछ मिनटों के समय का फायदा उठाते हुए मैं उन दो बुजुर्गों से बात करने बैठ गया और उनसे आगे जाने लायक किसी ठिकाने के बारे में दरयाफ्त की।

ये पहाड़ों में नयी जगह तलाशने का सबसे अच्छा तरीका होता है। जिन्दगी से पूरी फुर्सत लेकर बैठे स्थानीय लोगों का कोई झुण्ड ढूंढिए और उनके साथ चाय सिगरेट मोमेंट शेयर करते हुए सारी जानकारी सुड़क लीजिये।

औरतें न हो तो बेहतर क्योंकि सामान्यतः पहाड़ी औरतें अजनबियों के सामने शर्मीली होती हैं। अगर दिमाग में राम तेरी गंगा मैली की मंदाकिनी टाइप कोई फैंटेंसी बसी है तो उसे एकदम निकाल फेंके पर कूड़ेदान तलाश के क्योंकि पहाड़ों में गंदगी फैलाना वर्जिन सुन्दरता के प्रति किये पाप की तरह है। तो मैंने भरसक सिम्प्लीफाई करके अपनी फैंटेसी के गाँव का एक चित्र खींचा और दोनों बुजुर्गों ने एक स्वर में मुझे पहाड़ियों के पार क्षितिज की तरफ उंगली दिखाकर धनोल्टी जाने को कहा। मैंने तब तक गाड़ी घुमा चुके अपने दोस्तों को जाकर बताया कि 35 किमी आगे एक छोटा सा गांव है जहाँ हम रात गुजार सकते हैं।

थोड़ी देर पहले ट्रैफिक जाम में फंसकर पहाड़ों की रानी से घोर निराश हो चुके मेरे दोस्त इस नयी जगह को लेकर बहुत आशान्वित नहीं थे पर दिल्ली से दिन भर की ड्रायविंग से थके होने के कारण और मसूरी से जल्द से जल्द निकल जाने की गहरी सामूहिक इच्छा के कारण उनके पास इससे कोई बहुत बेहतर विकल्प थे भी नहीं। सो यहाँ से उन वृद्ध द्वय की उंगली के सिरे पर क्षितिज के नीचे कहीं बसे एक अज्ञात पहाड़ी गाँव के लिए एक आशंकित यात्रा शुरू हुई।

ढलती दोपहर की पीली धूप में चमकते शिखरों वाले Middle Himalaya की कई बेनाम पहाड़ियों के बीच घुमावदार रास्तों से गाड़ी बढ़ती जा रही थी।   मसूरी से बढ़ती दूरी के साथ पतली सड़क के एक ओर खाई की गहराई और दूसरी ओर चीड़ के जंगलों का घनापन बढ़ता जा रहा था| इसी के साथ आबादी तथा घर भी कम होते जा रहे थे। बीच में एक जगह जहाँ सड़क की दायीं ओर ‘धनोल्टी 19 किमी’ का माइलस्टोन लगा था वहां बायीं ओर एक ऊँचा टीला था जो ऊपर चढ़ने के बाद झाड़ियों से भरी एक पतली पगडण्डी से होकर एक पहाड़ी से जुड़ता था।

उस पहाड़ी पे कतार में उग आये चीड़ के पेड़ों का एक बहुत सुंदर जंगल था जिसे देख ऐसा लगता था कि पहाड़ी के ऊपर चढ़कर किसी ने करीने से क्यारी बनाकर चीड़ की खेती की हो। चीड़ की ये कतारें पहाड़ी की ढलान के साथ ही साथ नीचे की तरफ उतरती हुई खाई में जाकर गायब हो जा रही थीं| पहाड़ों, घाटियों, जंगलों से बने प्रकृति के अनगढ़ लैंडस्केप के बीच अनायास सुगढ़ता के इस अप्रत्याशित उदाहरण ने हमें वहां आधे घंटे के लिए रोक लिया और हम उस जंगल में थोड़ी देर बैठकर फिर वापस टीले से नीचे सड़क पर उतरकर अपने रस्ते चल पड़े।

सुआखोली तक पहुँचते पहुँचते अँधेरा घिर आया था। सुआखोली धनोल्टी से आठ किमी पहले एक तिराहा है जिसका एक रास्ता बायीं तरफ उत्तरकाशी  होते हुए गंगोत्री की ओर चला जाता है और दूसरा सीधी तरफ धनोल्टी होते हुए टिहरी की ओर। चूँकि शाम ढलने के पहले तक यहाँ तीनों रास्तों से आतीं ज्यादातर गाँव से गाँव और एकाध मसूरी तक सवारी ढोने वाली छोटी गाड़ियों का तांता लगा रहता है तो यहाँ एक छोटा मोटा पहाड़ी मापदंड का बाजार बन गया है।

इस बाजार में हैं चाय नाश्ते के दो तीन होटल जिनके काउंटर किराने और कुछ और जरूरतों की दुकान के रूप में भी इस्तेमाल किये जाते हैं। इन्ही होटलों के पीछे घर बने हुए हैं| रहने के लिए यहाँ  एक लॉज है जो है तो बहुत साधारण सा पर इसकी लोकेशन बेहद ख़ास है। सड़क की ऊंचाई की ही एक पतली सी पहाड़ी घाटी में कुछ दूर तक चली गयी है और उसी पहाड़ी के नुकीले तिकोने सिरे को घुटने तक की ऊंचाई की रेलिंग से चारों तरफ से घेरकर उसके भीतर तीन-चार छोटे-छोटे कमरे बना दिए गए हैं।

उस जगह से सुबह का नजारा गजब का सुंदर होता होगा यह अनुमान हम अँधेरे में भी बहुत साफ़ साफ़ कर पा रहे थे। ऐसी किसी सुबह वहां बैठकर कॉफी पीने के लिए कभी कोई रात गुजारूँगा उस होटल के सीलन भरे कमरे में भी, वहां से गुजरते हुए हर बार ये सोचा है। सुआखोली से आगे बढ़ने पे अँधेरा गहरा गया और धुंध और ठण्ड अचानक से बहुत बढ़ गयी| धीरे धीरे चीड़ के जंगल लंबे लंबे देवदार के जंगलों में बदल गए, जिनकी विशालता वातावरण को और डरावना बना रही थी। बस अकेली चारकोल की सड़क उसे आदमी के जद के अन्दर की कोई जगह होने का भरोसा दिला रही थी|

पहाड़ियों में रात में  गाड़ियों की हेडलाईट की रोशनी के धब्बे बहुत दूर तक दिखाई पड़ते हैं और अगर कई किलोमीटर दूर भी कोई दूसरी गाड़ी चल रही हो तो ये धब्बे मोड़-दर-मोड़ आँख मिचौली खेलते हुए आपके साथ साथ चलते रहते हैं| पर किनारों से सड़क पर इतनी ज्यादा धुंध बही आ रही थी जैसे घाटी बड़े-बड़े कश भर-भर के धुंध सड़क पर उगल रही हो| ऐसे में मीलों दूर की किसी गाड़ी की रोशनी क्या दिखती हमारी अपनी ही अगली कार की बैक्लाईट ड्रैकुला के भेड़ियों की लाल आँखों की तरह टिमटिमाती दिख रही थी। ऐसे में हमारी गाड़ियाँ एक दूसरे के पीछे पहाड़ियों के अँधेरे मोड़ काटतीं हुईं बढ़ी जा रही थीं।

कभी किसी मोड़ से मुड़ने पर दूर किसी पहाड़ी पर बसे किसी घर की कमजोर सी रोशनी पल भर के लिए जरा सा झिलमिला कर अगले मोड़ से पहले गायब हो जातीं|  सारा पहाड़ और जंगल डरावने रूप से बेआवाज था। सच  बताऊँ तो ड्रैक्युला के महल के रास्ते से इसकी तुलना उसी समय कार की पिछली सीट पर जंगल की तरफ के विंडो के पास बैठकर मैंने की थी। पहाड़ियों में मैं गाड़ी का शीशा खोलकर ही यात्रा करना पसंद करता हूँ, खासकर रात में।

शाम के बाद ओस गिरने पर देवदार के जंगल भींग जाते हैं और उनसे एक खुसबू उठती है जो सारे जंगल और सारी घाटी में अगली धूप के साथ उड़ जाने  तक फ़ैली रहती है। इस खुसबू का लालच चेहरे और पुतलियों को बर्फ करती ठंडी हवाओं में भी मुझसे खिड़की खुलवा ही लेता है। देवदार और चीड़ के तने से एक बहुत बहुत खुश्बुदार गोंद निकलती है। पुराने समय में यूरोप में इस गोंद का प्रयोग चर्चों में अगरबत्ती की तरह किया जाता था।

इस रास्ते के लक्षण देखकर एक और आशंका हमें सता रही थी कि अपने अपरिचित मंजिल पर कोई होटल होगा या नहीं| रास्ते का वातावरण तो लगातार हमारी आशावादिता पर हमले पर हमले कर उसे मटियामेट कर चुका था| पूरे माहौल ने ऐसा असर किया था कि गाड़ियों में बैठा हर एक शख्स अपनी अपनी आशंकाओं के खोल में लिपट कर बाकी सबसे कट गया था| ये चुप्पी सब पर और भी मनहूस गुजर रही थी पर कोई इस चुप्पी के खोल से बाहर निकलने की पहल नहीं कर पा रहा था| पर हमारी ढीठ आशाएं आशंकाओं के सारे हमले झाड़ फटकारकर फिर से तब उठ खड़ी हुईं जब एक मोड़ मुड़ते हीं एक जगमगाता बढ़िया सा होटल हमें हमारे सामने खड़ा मिला|

गाड़ियाँ रुक गयी और सब लपक कर भागते हुए होटल की सीढियां चढ़ गए| वहां कमरे नहीं मिले पर अब तो हमारे अन्दर का ये विश्वास सर उठा चुका था कि कई घंटों से अज्ञात रही हमारी मंजिल अब ज्यादा देर अपरिचित नहीं रहने वाली| मसूरी में चाय की दुकान पर बैठे उन बूढों की अज्ञात की तरफ इशारे में उठी उंगली के सिरे तक हम आखिर आ पहुंचे हैं| वहां से निकलकर थोड़ी थोड़ी दूरी पर स्थित कई होटलों पर रुकते, मोलभाव करते हम आगे बढ़ते गए|

अंत में हम आकर ठहरे उस जगह पर जो आने वाले सालों में दिल्ली की ऊब से कुछ दिनों के लिए निकल भागने का हमारा सबसे फ्रीक्वेंट शेल्टर बना- पाइन गेस्ट हाउस। आज भी हम शुक्रिया मानते हैं उस रोज मसूरी में हुए ट्रैफिक जाम का जिससे भागकर हम इस गाँव में आकर थमे। और आभार है काउंट ड्रैक्युला का जिसने कार्पेथिया की पहाड़ियों में ही जन्म लिया, पौड़ी-गढ़वाल को बख्श दिया वरना जगह तो ये वाली भी उसे ट्रांस-सिल्वानिया जैसी हीं होमली लगती।

क्रमशः ……….

5 Comments on “शुक्रिया ड्रैकुला पौड़ी-गढ़वाल को बख्श देने के लिए

  • ऐसा लगा जैसे मैं भी हमसफ़र हो गया इस रूमानी यात्रा का. उत्सुकता बढ़ गयी है. कृपया जल्द इसकी अगली कड़ी प्रस्तुत करे.. धन्यवाद्.

    • बहुत बहुत आभार अभिषेक। इसकी अगली कड़ी जल्द ही प्रस्तुत होगी और हम उसपे आपकी प्रतिक्रिया का भी बेहद उत्सुकता से प्रतीक्षा करेंगे

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