ग्लोबल गुमटी

दुर्गा भाभी

इतिहास में भगत सिंह न होते अगर भाभी न होतीं

दुर्गा भाभी 

दुर्गा भाभी – दस दिसंबर 1928, लाहौर, एक गुप्त ठिकाने पर बैठक चल रही थी| माहौल में गम और गुस्सा दोनों कमरे की मद्धिम  रोशनी में भी साफ़ दिख रहा था| उत्तेजना के मारे कई मुट्ठियाँ भींची हुई थीं| पर बाहर छाये खतरे और बैठक की गोपनीयता के बंधन ने उत्तेजना को भींची मुट्ठियों, लाल आँखों और माथे की शिकनों तक ही सीमित कर रखा था, किसी की आवाज में नहीं उतरने  दिया था|

लाला जी की हत्या का बदला पुलिस कप्तान स्कॉट की मौत से लेने का फैसला तय हो चुका था| अंजाम का ख़तरा बहुत ज्यादा था, पर इस खतरे को वहां मौजूद हर कोई उठाना चाहता था,सबका खून उबल रहा था| पर इसका अंतिम फैसला पार्टी को ही करना था| ऐसे में सोच में झुके चेहरों के बीच से एक तमतमाया लाल कोमल चेहरा उठा और अपने को इस ग्लोरियस खतरे के लिए पेश किया|

अब आवाजें और ज्यादा न रुक सकीं और पहले फुसफुसाहटों और फिर बहसों में बदल गयी| काफी बहस के बाद पार्टी ने ये काम भगत सिंह नाम के दुबले पतले गंभीर सिक्ख नौजवान को सौंप दिया|  सभा समाप्त हो गयी और उस सभा में मौजूद हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसिएशन का हर मेंबर सभा की अध्यक्षता कर रही उस तमतमाए चेहरे वाली दुर्गा भाभी के लिए दिल में पहले से और ज्यादा श्रद्धा लेकर वहां से निकला|

बापू बोलने पे गांधी और चाचा से नेहरु याद आते हैं तो भाभी बोलने से सविता हीं क्यूँ याद आती है? आजादी की लड़ाई में बम बंदूकों के बड़े खिलाड़ी, क्रान्ति के सितारे भगत सिंह, आजाद, सुखदेव, बटुकेश्वर की भाभी को देश भाभी के रूप में क्यूँ नहीं याद करता? खैर भूला दिए गए लोगों की फेहरिश्त बहुत लम्बी है, पर जिसने भगत सिंह की जान बचाई उसकी याद दिलाना तो बनता है न|

दुर्गा भाभी का असली नाम दुर्गावती देवी था और वो भगवती चरण बोहरा की धर्मपत्नी थीं| वही बोहरा जिन्होंने बम का दर्शन नाम की किताब लिखी थी, और भगत सिंह और अन्य साथियों को जेल से छुडाने के लिए बनाए गए बम का परीक्षण करने के दौरान जिनकी शहादत हुई थी| पर भगवती चरण बोहरा की धर्मपत्नी दुर्गावती देवी ने क्रांतिकारियों की सम्मानित दुर्गा भाभी का दर्जा अपने कारनामों से पाया था|

स्कॉट की गफलत में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने एक दुसरे अंग्रेज अफसर सौन्डर्स की हत्या कर दी| एच एस आर ए ने पूरे लाहौर में पोस्टर चिपकाकर इस हत्याकांड को लाला जी की हत्या का बदला बताते हुए शान से इसकी जिम्मेवारी ली| पूरा लाहौर शहर अफवाहों और पुलिस की सक्रियता से गर्म था और सरकार अपने अफसर की हत्या के दोषियों को पकड़ने के लिए उतावली होकर शहर को बूटों की धमक से गुंजाए दे रही थी| ऐसे में भगत और उनके साथियों को शहर से बाहर निकालना बेहद जरूरी भी था और बेहद मुश्किल भी| इसका भी समाधान बनीं दुर्गा भाभी|

सरदार भगत सिंह ने अपने बाल कटवा लिए और सूट बूट हैट पहनकर बन गए देशी साहब| अपने बचपन में स्कूल की दीवारों पर लगे पोस्टरों में नुकीली मूंछो, सर पे हैट वाला भगत सिंह का यही हुलिया हम सब ने देखा है| दुर्गा भाभी ने घर से सारे पैसे समेटे, नन्हे से बेटे शचीन्द्र को गोद में उठाया और भगत की पत्नी बनकर साथ में चढ़ गयीं लखनऊ जाने वाली ट्रेन के फर्स्ट क्लास डिब्बे में, साथ में थे राजगुरु, परिवार के नौकर के हुलिए में|

स्टेशन तक चप्पे चप्पे नुक्कड़ नुक्कड़ पर अपने शिकार की ताक में भूखे बाज की तरह मुस्तैद पुलिस ने इस टोली को एक आम भारतीय परिवार समझकर जरा भी शुबहा नहीं किया और हर जगह से गुजरने देते हुए लखनऊ और फिर कलकत्ता तक निकल जाने दिया| विश्व के सबसे बड़े साम्राज्य की पुलिस शहर से बाहर जाने वाले हर रास्ते की चौकीदारी में खड़ी रह गयी और दुर्गा भाभी के साहस ने इसे विश्व इतिहास की सबसे चालाक फरारी में से एक बना दिया|

जब भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी गयी तो उनकी भाभी ने एक दिन गुस्से में काली साड़ी पहनी, एक पिस्तौल ली और पहुँच गयी बम्बई के गवर्नर हैली के बंगले पे| शोक से डबडबाई आँखें धुंधला गयीं थीं| आवेश में उंगलिया साड़ी में छिपाए पिस्तौल के ट्रिगर पर थरथरा रही थीं| सामने से तीन अंग्रेज अफसर आते दिखे, आँखों में बेटे शचीन्द्र के प्यारे ‘लंबा चाचा’ यानी भगत सिंह का मुस्कराकर फांसी पर चढ़ गया चेहरा कौंधा और पिस्तौल चल गयी|

उन अंग्रेजों में हैली नहीं था, एक दूसरा अंग्रेज अफसर टेलर घायल हो गया| ये हमला भारत में किसी महिला द्वारा अंजाम दी गयी पहली क्रांतिकारी हिंसा के रूप में दर्ज है| तीन साल भाभी फरार और भूमिगत रहीं| सारी संपत्ति जब्त कर ली गयी पर पति और सारे क्रांतिकारी देवरों के चले जाने के बाद संपत्ति जाने का क्यों दुःख होता उन्हें| फिर गिरफ्तार हुईं और छूट गयीं| पति जा चुके थे, आजाद, भगत सिंह, सुखदेव समेत सभी क्रांतिकारी देवर भी चले गए थे| क्रांति के एक दौर का समापन हो चुका था| एकदम अकेली रह गयी थीं दुर्गा भाभी| पर अकेलेपन का शोक नहीं, अभी करने को बहुत कुछ था|

1940 में लखनऊ चली आयीं और वहां मौन्टेसरी शिक्षा की नींव रखी| आज भी लखनऊ में कैंट रोड (नजीराबाद) में उनका शुरू किया स्कूल मांटेसरी इंटर कॉलेज के नाम से चल रहा है|  14 अक्टूबर 1999 को अपना सारा काम निपटाकर सबकी नजरों से बचकर वैसे ही दुनिया से निकल गयीं जैसे इकहत्तर साल पहले भगत सिंह को लेकर लाहौर से निकली थीं| शवयात्रा में कोई राष्ट्रीय स्तर का तो क्या क्षेत्रीय नेता भी नहीं पहुंचा था| पर भाभी को इसकी फिकर करने का समय कहाँ होगा| वो तो चल दीं थीं लम्बे समय के इंतजार के बाद अपने देवरों से मिलने| और देवर खड़े होंगे इन्तजार में, बसन्ती चोला पहने, नुकीली मूंछो पर ताव देते “बहुत इन्तजार करवाया भाभी” का मीठा ताना देने के लिए|

आज दुर्गा भाभी का जन्मदिन है| भाभी के ऋणी बेटे-बेटियों का शत-शत कृतज्ञ नमन

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