ग्लोबल गुमटी

dushera 4g wala

दशहरा.. 4g वाला..

दशहरा.. 4g वाला..

 

आज दशहरा है।

फेसबुक जय माता दी के नारों और माता की तस्वीरोँ से पटा पड़ा है। मैं घनघोर उलझाऊ आस्थावान आदमी हूँ, देवी देवता से डरने वाला आदमी। हर तस्वीर को देख भयंकर श्रद्धा से प्रणाम करता हूँ। पर हर तीस सेकेँड पर माँ जगदम्बा की दो फोटो अपडेट होने के कारण हालत ये है कि हर तस्वीर के दिखते स्क्रीन पर सर झुका के रगड़ते रगड़ते मेरे माथा के बीचों बीच गड़हा टाईप हो गया है. स्क्रीन पर जो खरोँचे पड़ गई हैँ वो तो हईये है।

मतलब जान लिजिए कि फेसबुक पर इतना भक्तिमय माहौल है कि आप बस अपने मोबाईल के ईयर फोन लगने वाले छेद मेँ एक मुट्ठा अगरबत्ती खोँस देँ और एक छोटा टेबुल ला उसपे लाल कपड़ा बिछा उसके ऊपर बीचोँ बीच मोबाईल रख देँ तो एकदम लगेगा किसी ने किसी शक्तिपीठ मंदिर का फ्रेंचाइजी ले के नया मठ खोला है। बड़ा आध्यात्मिक टाईप फील देगा।

मैँ गाँव से दूर दिल्ली जैसे महानगर बैठा हूँ, 9 दिन नींबू पानी पी व्रत कर के उठा हूँ, शरीर एतना ऐँठ रहा है कि, लगता है जैसे आजादी की लड़ाई के समय अंग्रेजोँ द्वारा भुखे अंडमान मेँ कैद कर दिया गया था, अब छुट के आया हूँ। ऐसे मेँ कमरे पर बैठे फेसबुक पर दशहरा देखना नियती है।

शहरोँ के भक्त का भी अपना फ्लेवर है। 9 दिन मेँ व्रत के दौरान जितनी रंग बिरंगी खाने की थाली की फोटो देखी, वैसी अपने इलाके के सांसद की शादी मेँ नही देखी थी। लड़के भोला सा चहकता मुँह बनाये, हाथ मेँ चम्मच लिये उसे साबुदाना के पकोड़े मेँ भोँके तस्वीर अपडेट कर रहे हैँ “इंजॉईँग व्रत विद हल्दीराम”। महिलाएँ और युवतियाँ माँ दुर्गा के टक्कर की बिँदी लगाये, देवी दुर्गा से कई गुणा ज्यादा काजल उजल, अलता, नेलपॉलिश लगाये साड़ी का अपना आँचल लहराये सखियोँ संग उन्मुक्त हँसी के साथ अपडेट कर रही हैँ “वाउ,व्हाट्र ए ऑशम नवरात्रा स्पेशल थाली विद लवली सखियाँ। वी आर इँजॉईँग शुभ अष्टमी, नवमी एण्ड दशमी”।

मने व्रत के समय भी लोग इतने फीलिँग फेस्टिव हैँ कि भोजन ओजन के प्रति उनका भयंकर उत्साह देख थाली मेँ पड़ा भयभीत पुड़ी उछल के हाथ रोकना चाहता है “मैम कम खाओ प्लीज व्रत है, अपना नही बट हमारी तो श्रद्धा का ख्याल कर लो प्लीज, दुनिया हमेँ कोसेगी कि अबे गाँव के बिहा शादी मेँ ठंडा हो के फेँका जाने वालोँ पुड़ियोँ, अरे 9 दिन तो संयम रखते, न छनते बे तो क्या मिट जाते थालियोँ से”। घी से घीहुघुहान हलुवा लजा के सरक जाना चाहता है “प्लीज,उफ्फ मुझे मत छुओ न, व्रत है न, प्लीज प्लीज प्लीज। उफ्फ दशमी से खाना न”।

कौन किसकी सुनता है इस जमाने मेँ। ऐसे मेँ गाँव की व्रत करती बुढ़िया अम्मा याद आती है। पर्व जैसे सेना का अनुशासन हो। 9 दिन पूजा पाठ के उन पाक पवित्र भोज्य विहिन नियमोँ से गुजरता कि जैसे NSG स्पेशल ट्रेनिँग से गुजरी हो। क्या दिनचर्या”भोरे से पूजा घर धोआन पोछान के बाद दिन के 12 बजे तक पूजा पाठ का क्रम, फेर दुपहरिया मेँ एगो केला और शर्बत। फिर बुढ़ा बाबा की धोती धोना, उनको खिलाना पिलाना। ये होते शाम हुई कि फेर सांझ के माई के संझा बत्ती और रात के फेर एगो केला, आधा गो सेव और तनी गो दुध पी सूत जाना”। सात दिन मेँ मुँह सुखौता टाईप सूख के ऐसा हो जाता कि,सप्तमी को पट खुलते जैसे माँ दुर्गा की नजर इन पर पड़ती वो खुद प्रकट हो बोल पड़ती “हे संतोष की अम्मा। जा खा ल, काहे जान देले बाड़ु। हम इहेँ बानी तोहरे घरे, ना जाईब अबकी महिषासुर के मारे। जा खा ल कुछु। परब के सजा जैसन काहे काटत बाड़ुँ। जा के फेसबुक देखा, केतना फेस्टिव बा माहौल”।

ठीक ही बोलती है माँ दुर्गा। हाँ जमाना बदला है, और हर युग ने धर्म के गाँठोँ को अपनी सुविधानुसार खोला है। इस युग की यही जरूरत है, बिना थाली व्रत खाली है तो खाने देना चाहिए। ये धर्म मुझ जैसे कुछ भूखे व्रत करने और दो चार धार्मिक बूढी अम्मा के कारण थोड़े बचा हुआ है साब। ये बचा है उन्ही हंसती खाती घूमती पर्व को पर्व मान के जश्न मनाती थाली खाती बहुल लोगो की संख्या से,उनके मानने से। और असल में, हर युग की मान्यताओँ को बड़े सलीके से, बिना किसी रगड़ के स्वीकार कर लेना ही तो इस धर्म को यहाँ तक ले आया है. वो भी बिना तीर और तलवार के।

तभी तो आम्रपाली के नृत्य से शुरू हो हौज खास की लेट नाईट डिस्को तक के बदलाव के बीच भी रामलीला का मंच अमर और अक्षुण्ण है। रूप बदले, रंग बदला, मंच बदले पर लीला वही रही। आज गाँव घर मिस कर रहा हूँ, ये जानते हुए भी कि, गाँव का दशहरा भी अब उतना मनसाईन न रहा। जाता भी तो क्या मिलना था। नये ब्याहे दोस्त ससुराल चले गये होँगे क्योँकि सामान्यतः बाप की नजर मेँ घोषित रावण रूपी नौजवानोँ को ससुराल का ही आसरा होता है जहाँ उसे नये दामाद के रूप मेँ श्री राम टाईप ट्रीटमेँट मिलता है। बचे हुए युवाओँ की अलगे व्यवस्था होगी। उनका एक ही टारगेट होगा “रावण को लजवा लजवा के डिमोरलाईज कर मार देना”। ये रावण का वध अपने तरीके से करते हैँ,उसे डिमोरलाईज करके, और वो इस तरह करते हैँ कि एक एक सर वाले लौंडे दस दस बोतल बियर पी के रावण को लजवा देँगे। चिल्ला चिल्ला बोलेँगे “देखले रे रावण, हमनी के ऐभरेज। एक ठो मुंडी है मात्र लेकिन दस ठो पी गये। तुम्हरा दस ठो मुंडी है. एक ठो किँगफिशर पी के दिखाओ”। रावण लज्जित हाथ जोड़ लेता है “नही सकेँगे भैया।

माने कि हम रावण हैँ पर इतने भी रावण नही हैँ। अरे जिसके वध को साक्षात भगवन् आ रहे हैँ, जिस रावण को सीधे कृपानिधान गति प्राप्त करायेँगे वो रावण कम से कम आज तो बियर, दारू नहिये न पियेगा”। लौँडे हँस देते हैँ “हा हा जाओ बेटा, रावणे रह जाओगे। आदमी न हो पाओगे इस फिलोसपी के चक्कर मेँ”। इधर कुछ देर मेँ राम आते हैँ,पाँच मिनट मेँ वापस घर लौट जाते हैँ। अयोध्या मेँ जिँदाबाद हो रहा है “राम जी रावण को मार लौट आये”। राम जी सबको शांत कर माईक ले अनाउंस करते हैँ “भाईयोँ बहनोँ, मैँने अबकी नही मारा रावण! मैँ जब तक पहुँचा, रावण मर चुका था। कुछ सपूतोँ ने इतना खोँचा, इतना लुलुआया दारू बियर ले के कि लाज से मर गया बेचारा रावण”। अयोध्या की जनता सन्न। प्रभु तब अब क्या? राम जी बोले “ये कलयुग है, अब कभी किसी न राम का जन्म न होना न उनके हाथ किसी रावण का उद्धार। दुनिया ने अपने नियति का खुद निर्धारण कर लिया है, उसे छोड़ दो अब अपने हाल पर। वहाँ का पाप रावण से बड़ा है। बुराई के अंत के लिए राम लखन की जरूरत नहीँ। लोग राम से नहीँ, शर्म से मरेंगे। खुद मारेंगे, खुद मर जायेगें”।

अयोध्या जय श्री राम के नारे से गुँज रहा है। पर इन सब के बावजूद, परब है न। साल भर पर तो आता है। सच परब पर मुझे मेरा गाँव याद आ रहा है, घर तो घर है न। पर चलिये आपको हैप्पी दशहरा। मनाईये जोर से, विदा हुईं दुर्गा, फेर से कटी मुर्गा। छोड़िएगा थोड़े। जय हो।

 

 

नीलोत्पल मृणाल 

4 Comments on “दशहरा.. 4g वाला..

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