ग्लोबल गुमटी

एक चिट्ठी की चिट्ठी

मैं चिट्ठी हूँ|

नमस्कार साहब,

मैं चिट्ठी हूँ । वही जिससे रामअवतार बाबू ने अपने प्रेम प्रसंग की शुरूआत की थी । कभी उन्होंने मुझे लिफ़ाफ़े का पीला जाम़ा पहनाया , कभी अंतर्देशीय पत्र का गहरा नीला कोट । पर जो भी हो दोनों में उन्होंने प्रेम के इत्र जी खोलकर छिड़के ।

कुछ लोग कहते हैं मैं मृतप्राय हूँ । पर मैं इंसानी संवेदना नहीं साहब जो मर जाये, मुझे तकनीक का ज़हर पिला के मारा गया है।

नहीं यक़ीन तो थोड़ी देर के लिए दहेज में मिली गोदरेज की अलमारी भूल जाइये । जिसमें प्यार से आपने अपना और अपनी धर्मपत्नी का नाम लिखके बीच में एक नक़ली दिल का नक़्शा लगा के जोड़ने की कोशिश की है। याद रहे साहब मैं आज भी दादी के जंग खाए संदूक के कोने में आँखें मूँदे लेटी हूँ । और ये नींद सबूत है दादी के प्रेम का जिसने सालों पहले मुझे सीने से लगाकर प्यार से सहेजकर,संभालकर लिटाया था ।
हाँ इस संदूक का एक ही दिल है जो भी आए सब साथ रहेंगे साथ मिलेंगे । इस अलमीरा की तरह ढोंगी नहीं के सबको हैसियत के हिसाब से अलग-अलग रखे । जो माँ की पुरानी साड़ी रखने में परेशान होता है पर बहू के गहनों को सहेजने में गर्व महसूस करता है । संदूक को पीछे छोड़कर अलमीरा ख़ुद के ज्ञानी होने का ढोंग करता है।

और तकनीक से सजा ये मोबाइल कितना भी दंभ भरे पर इसे नहीं पता लोग मेरा इंतज़ार इस बात के लिए करते थे कि कब उनके हाथ से खुलूँ और बिखेर दूँ प्रेम की संजीवनी । इस मोबाइल की दुनिया में एेसे भी लोग हैं जो कहते हैं के उठा के बोल दो घर पर नहीं है, अभी चार्ज हो रहा है। पर याद रहे एेसी झूठी चार्जिंग से कई रिश्तों की बैटरी डेड हो रही है ।

मेरी ईमानदारी पे भी शक न रहे साहब मैं घर के आँगन में बीचोबीच दिन के उजाले में सबके सामने खुलता था । रात के सन्नाटे में कमरे के कोने में तकनीकी चोरों के संदेश खुलते हैं । अब इंतज़ार तो है लोगों को पर मेरा नही , इंतज़ार है सबको अपने चोरी के स्टेटस पे लाइक और कमेन्ट का ।अब दिन भर घंटी बजती है कोई नहीं पूछता । कुछ को तो घंटी से भी गुरेज़ है उसका भी गला घोंट के रखते हैं ।

मेरी प्रजाति ख़त्म होने को है पर मेरी एक विनम्र विनती है साहब मुझे एक बार ढूँढ के पढ़िए । नयी ऊर्जा मिलेगी जो शायद ये खोखले स्माइलि और लाइक नही दे पाते । क्या कहा-“कहाँ ढूँढूँ “। अरे मिल जाऊँगा साहब आपके पुराने मकान के किसी हिस्से में,अम्माँ या दादी के संदूक में या शायद आपने जब अपना लेखन शुरू किया होगा तब के पुराने सूटकेस में दोस्त की विचित्र पर विश्वसनीय लिखावट के साथ । मुझे इस बात का दुख नहीं के मैं अंतिम दौर में हूँ ;मरने को हूँ । दुख इस बात का है के मेरे साथ आपकी ईमानदारी और संवेदना न मर जाए । और अब तो बस दुःख ही जता सकती हूँ, क्यूंकि याद तो होगा न कि मैं चिट्ठी हूँ|

 

13466203_1212306315468721_3820147561969008418_nलेखक राहुल सिंह ‘शेष दिल्ली और आसपास होने वाले कवि सम्मेलनों में नियमित रूप से जाने  वालों के लिए एक जाना हुआ नाम और पहचाना हुआ चेहरा हैं| मूलत उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ से आते हैं और फिलहाल दिल्ली में एक प्राइवेट कंपनी में कार्यरत हैं|

7 Comments on “एक चिट्ठी की चिट्ठी

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