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कैंटीन का उधार न चुकाने से निकला किशोर का ये क्लासिक अंदाज़

कैंटीन का उधार न चुकाने से निकला किशोर का ये क्लासिक अंदाज़..

 

हम गैंगटोक से पेल्लिंग के रास्ते पर हैं, पहाड़ी रास्तों से होता हुआ यह टूटा फूटा रास्ता अँधेरे में हमें डरा रहा है, मारे डर के हमारे ड्राईवर ने माता के गाने लगा दिए हैं जिसमें से भोजपुरी में आवाज़ निकलती है ” माता को लाल पसंद है ” और हमारी खीझ बढ़ जाती है.r

हम गाना बदलते हैं और एक ऐसा गाना आता है जो हम सब गुनगुनाने लगते हैं. हम पांच दोस्त, जिनके गाने के टेस्ट, संगीत की समझ, खाने में पसंद सब कुछ अलग है, वे एक साथ गाने लगते हैं “मेरे सपनो की रानी कब आएगी तू “ ये है किशोर की आवाज़ का जादू. किशोर कुमार आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी मधुर आवाज के लोग आज भी दीवाने हैं. उनकी पुण्यतिथि (13 अक्टूबर) के अवसर हम आपको बताते हैं कि किशोर कुमार का ये दिलचस्प अंदाज़ आया कहाँ से.

किशोर कुमार इन्दौर के क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़े थे और उनकी आदत थी कॉलेज की कैंटीन से उधार लेकर खुद भी खाना और दोस्तों को भी खिलाना. किशोर कुमार पर जब कैंटीन वाले के पांच रुपया बारह आना उधार हो गए और कैंटीन का मालिक जब उनको अपने पाँच रुपया बारह आना चुकाने को कहता तो वे कैंटीन में बैठकर ही टेबल पर गिलास, और चम्मच बजा बजाकर पाँच रुपया बारह आना गा-गाकर कई धुन निकालते थे और कैंटीन वाले की बात अनसुनी कर देते थे. कैंटीन वाला जब भी उधार मांगता किशोर कुमार गाने लगते “ पाँच रुपैया, बारह आना, मारेगा काका, मारेगा  भैया ……….ना ना ना ना “बाद में फिल्म “चलती का नाम गाड़ी” में किशोर ने बड़ी खूबसूरती से इस पर गीत बनाया.

सोचती हूँ कि एक ऐसे गायक और एक्टर के बारे में क्या लिखूं जो अब तक लिखा नहीं गया, एक ऐसा गायक जिसने अपना पहला गाना बॉम्बे टॉकीस के कोरस के लिये 1946 में गाया था वो आज भी युवाओं का चहेता बना हुआ है. एक तरफ मस्ती से गाना गाता हुआ किशोर है जिसके नाम सबसे ज्यादा फिल्म्फेयर नॉमिनेशन हैं और एक तरफ बाकी सभी. किशोर कुमार ने संगीत की कभी भी कोई विधिवत शिक्षा नहीं ली फिर भी इतने दशकों बाद भी उनके गाने अपने रेंज और विविधता के लिये जाने जाते हैं, वो “आके सीढ़ी लगी” में हमें हंसाते हैं, “एक लड़की भीगी भागी” में गुदगुदाते हैं, “आ चल के तुझे “ में लोरी सुनाते हैं, “इन मीना डीका “ में नचाते हैं ,” कोई होता जिसको अपना” में रोमांस के चरम को छूते हुए “पड़ोसन” में खुद को गॉड गिफ्टेड मनवा लेते हैं.

1970 का वो दौर बॉलीवुड संगीत का गोल्डन दौर था जब आर डी बर्मन, आनंद बक्षी और किशोर कुमार की तिकड़ी एक से बढ़कर एक खूबसूरत गाना लेकर आ रही थी. आराधना फिल्म में इस तिकड़ी ने ऐसा टाइमलेस संगीत तैयार किया जो आज भी हर एफएम, हर फ़ोन और हर पार्टी में बजता है.

किशोर कुमार ने जब-जब स्टेज-शो किए, हमेशा हाथ जोड़कर सबसे पहले संबोधन करते थे-‘मेरे दादा-दादियों.’ मेरे नाना-नानियों. मेरे भाई-बहनों, तुम सबको खंडवे वाले किशोर कुमार का राम-राम. नमस्कार.

किशोर कुमार जिंदगीभर कस्बाई चरित्र के भोले मानस बने रहे. मुंबई की भीड़-भाड़, पार्टियाँ और ग्लैमर के चेहरों में वे कभी शामिल नहीं हो पाए. इसलिए उनकी आखिरी इच्छा थी कि खंडवा में ही उनका अंतिम संस्कार किया जाए. इस इच्छा को पूरा किया गया, वे कहा करते थे-‘फिल्मों से संन्यास लेने के बाद वे खंडवा में ही बस जाएँगे और रोजाना दूध-जलेबी खाएँगे.

13 अक्टूबर साल 1987 को दिल का दौरा पड़ने के कारण उनकी मौत हो गई और उन्होंने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया. और किशोर कुमार अपने पीछे छोड़ गये संगीत की ऐसी महान विरासत जो आज भी उतनी ही पसंदीदा है जितनी 30 साल पहले.

 

डॉ. पूजा त्रिपाठी 

 

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