ग्लोबल गुमटी

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गर्ल्स मोलेस्टेशन और विचारो की अभिव्यक्ति

गर्ल्स मोलेस्टेशन पर अक्षय कुमार अपना गुस्सा नहीं दिखा सकते? कुछ बोल नहीं सकते? क्यों…?

…क्योंकि वो सार्वजनिक मंच पर अपनी पत्नी ट्विंकल खन्ना से अपनी जीन्स का बटन खुलवाते हैं? सिर्फ़ इसलिए… या इस गलती का एहसास होने के बाद इसके लिए वो सार्वजनिक रूप से माफ़ी भी माँगते हैं? या फिर इसलिए कि उनके पास कनाडा की नागरिकता है? या फिर इसलिए कि अक्षय कुमार ने “लड़की देखी मुहं से सीटी बजे हाथ से ताली” जैसे गानों में अभिनय किया है?

गर्ल्स मोलेस्टेशन पर विराट कोहली भी कुछ नहीं बोल सकते? क्यों…?

क्योंकि वो खेल के मैदान पर अग्रेशन में गालियां बक देते हैं? या इसलिए कि वे अपने खेल के साथ गर्लफ्रेंड के साथ घूमते भी हैं?

तो आप न्यायविद लोग ही बताएं, कि आख़िर गर्ल्स मोलेस्टेशन पर किसे बोलना चाहिए? या किसी विशेष मुद्दे पर बोलने को हक़ किन विशेष लोगों को होना चाहिए या नहीं होना चाहिए? या ये तय करने का हक़ आप सोशल मीडिया के झण्डाबदरों के अधीन है?

हर मुद्दे पर सोशल मीडिया के वो शूरवीर तय करेंगे की किसे बोलना है किसे नहीं बोलना है, जो वैचारिक असमानता होने पर दिन भर लोगों की पोस्टों और इनबॉक्स में मइया-बहन किया करते है? या फिर वो लोग बोलेंगे जो दिन भर नेट पर सनी लियोन को सबसे हॉट वीडियो ढूंढते रहते हैं?

पहले खुद को सेल्फ अटटेस्टेड चारित्रिक प्रमाण-पत्र दीजिये कि आपने कभी किसी लड़की को देखकर, खुद से या अपने दोस्तों से न बुदबुदाया हो, भाई देख..! क्या माल है, ब्ला ब्ला ब्ला, या गुस्से में कभी किसी के लिए मुहं से गाली न निकली हो या मन में कभी किसी को गाली न दी हो। कभी किसी जानने वाली महिला या अभिनेत्री के बारे में फंतासी न पाली हो? दे पाएंगे आप अपनी आत्मिक सुचिता का प्रमाण-पत्र? व्यक्तिगत चरित्र कैसा है, ईमानदारी से खुद का बता पाएंगे आप? उत्तर इसी में है कि गर्ल्स मोलेस्टेशन पर किसे बोलना चाहिए? कुछ बुरा लगे, मन को झकझोरे तो किसे आवाज़ उठानी चाहिए? आख़िर ये तय कहाँ होगा?

किसी फ़िल्म में अभिनेता, कथानक और लेखक के लेखन की मांग और स्थिति के अनुसार, अभिनय करता है, वह अपना कर्म करता है, एक दफ़े आपकी ये बात सही और जायज़ हो सकती है कि फ़िल्म में समाजिकता और नैतिकता का हवाला देकर अभिनेता को ऐसी सीन करने से मना कर देना चाहिए, जहाँ आपको लगता है कि वो लड़की को छेड़ रहा है या गर्ल्स मोलेस्टेशन हो रहा है, पर एक बात का ज़वाब आप भी दे दीजिए, कि आपकी नज़र में मोलेस्टेशन है क्या? और कहानी की मांग पर अग़र अभिनेता ने लड़की को छेड़ दिया या हेरी ने गा दिया..

“तू चीज़ बड़ी है मस्त-मस्त, चोली के नीचे क्या है-चुनरी के नीचे क्या है, भाग डी के बॉस-बॉस डी” के आदि-आदि तो अभिनेत्री सॉरी आपके अनुसार वास्तविक किरदार वाली लड़की क्या करती है? हँस कर चली जाती है या हीरो की बाहों में दौड़कर चिपक जाती है या नजदीकी पुलिस स्टेशन में जाकर रपट कराती है या सोशल मीडिया पर लिखती है, फलां फ़िल्म की फलां सीन पर फलां अभिनेता ने मुझे जी भरकर छेड़ा, आप आवाज़ उठाइये और फ़िल्म बन्द कराइये। दूसरे पहलू मैं खलनायक, अभिनेत्री या किसी अन्य महिला फ़िल्मी किरदार को छेड़ता है/रेप करता है तो? वो महिलाएं क्या करती हैं? जाकर रपट कराती हैं, मिथुन या अजय देवगन जैसा किरदारी भाई होता है तो साइकिल-खटिया के पीछे छिपकर गोलियां चलाता है और 3 घण्टे के अंदर खलनायकों और गुंडों को मौत के घाट उतार देता है।

सब कुछ आपके देखने के नज़रिये पर निर्भर करता है, इस पर निर्भर करता है कि आपने क्या एक्सम्पल्स सेट किये हैं। फ़िल्में समाज का आइना होती हैं और समाज ही फ़िल्मों के कथानक-लेखन का प्रभावित और प्रेरित करती हैं, ये परस्पर एक-दूसरे को हिट करती हैं। आज फ़िल्मों के साथ-साथ गानों में द्विअर्थी भावों और गालियों की प्रचुरता बढ़ी है? आज फ़िल्मों में एक्सपोज़र बढ़ा है? वज़ह ये नहीं कि हमने फ़िल्मों से सीखा है, बड़ी वज़ह यह है कि आज समाज की मांग बढ़ी है, फ़िल्मों ने वो वह सत्य स्वीकार कर लिया है, जो समाज की अधिकतर वास्तविकता है। AIB रोस्ट में अश्लील कंटेंट पर हँसने वाली अभिनेत्रियां भी महिला सशक्तिकरण पर आधरित फ़िल्में बना रही हैं।

बाकि रही बात नागरिकता की तो सच और सही बात कहने के लिए नागरिकता की नहीं स्पष्ट और साफ मानसिक विचारों की आवश्यकता होती है, वरना आतंकी बुरहान वानी की नागरिकता भी भारतीय ही थी, AK-56 रखने के जुर्म में जेल काट आने वाले अभिनेता की नागरिकता भी भारतीय ही है। वो आपको समझना है, आपके लिए बदनीयत होना बुरा है या किसी अन्य देश की नागरिकता रखना बुरा है, क्योंकि गर्ल्स मोलेस्टेशन, क्षेत्रों की सीमा से नहीं बंधता, वरना अपने देश के पूर्वी भारत की लड़कियों को दिल्ली से बंगलूर तक लोग “चिंकी” न बुलाते।

ये भारत है और यहाँ की संस्कारी हवा में सभ्यता के तमाम उदाहरण तैर रहे हैं, बशर्ते देखना ये है की आप किसे चुनते हैं, इस देश में महिलाओं को लेकर, “नारी नरकस्य द्वारं” या “नारी की झाँई परत, अंधा होत भुजंग, कबीरा तिन की कौन गति, जो निति नारी सग” या “ढोल गंवार—————“ से “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।”

तक के उदाहरण आपके समक्ष हैं। अब तय आपको करना है कि आप किसे चुनें या न चुनें, पर अपनी बनावटी नैतिकता का हवाला देकर आप, आवाज़ उठाने वालों की आवाज़ रोक नहीं सकते, दबा नहीं सकते। वरना रंगीन स्क्रीन पर तू चीज़ बड़ी है मस्त-मस्त पर नाचने वाले महिलाओं को जागरूक करने वाले कार्यक्रमों को प्रोत्साहित न करें और फ़िल्मी संस्कारी रोल निभाने वाले शाइनी आहूजा जैसे अभिनेता वास्तविक जीवन में किसी महिला की अस्मिता पर हाथ फेरें। रियल और रील के बीच खिंची महीन रेखा को छद्म नैतिकता की नंगी आँखों से देखने की कोशिश भी न करें।

पुरातन से कहते आए हैं, “किसी भी राष्ट्र की शक्ति आप उस राष्ट्र के पुरुषों के पीछे होने वाली महिलाओं से लगा सकते हैं।” पर विडम्बना देखिए वर्तमान परिस्थितियों में जब महिला सशक्तिकरण, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का दौर चल रहा है, ऐसे में महिलाओं को पुरुषों साथ चाहिए आप उलूलजुलूल कुतर्कों से उन्हें भी खड़े नहीं होने दे रहे हैं। आप कतई साथ न आइये, पर उनके पग भी न पकड़िए जो सच में महिला हित में अपनी आवाज़ के साथ राष्ट्र-निर्माण करने को प्रतिबद्ध हैं।

 

नोट बैन~सौरभ मिश्रा, लखनऊ

 

(लेखक लखनऊ में रहते हैं और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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