ग्लोबल गुमटी

गुनाहों का देवता

काजोल और अजय देवगन- गुनाहों का देवता

गुनाहों का देवता की दूसरी किश्त –

रोज की तरह आज भी सुधा छज्जे पर कपडे सुखाने आई थी, और रोज की तरह आज भी चन्दर ठीक बगल वाले  पाड़े जी की छत पर लटका पड़ा था…… इधर सुधा का आना था और उधर चन्दर का लटकना, ये खेल तब से चल रहा था जबसे सुधा को चन्दर ने हर साल इलाहाबाद के दारागंज में निकलने वाले काली माई के जुलुस में देखा था….उस दौरान लगने वाले छोटे से मेले में जो रात भर चलता था सुधा जब अजय देवगन की फोटो खरीद रही थी, ठीक उसी समय चन्दर ने काजोल की फोटो खरीद कर सुधा के सामने मोहब्बत का ऐलान कर दिया था……

सुधा कपड़े फैला के जा चुकी थी, और इधर चन्दर भी पाड़े जी की छत से उतर ही रहा था कि तभी पाड़े जी छत पर लोटे में जल लिए आते सीढ़ी पर मिल गए….चन्दर को देखते ही बोले….ऐ सुनो, बेटा इ जौंन तुम कर रहे हो न, हम बहुत पहिले करके छोड़ दिए हैं, का सोचते हो सब बैल हैं हियाँ, आंय?….निकल लो बेटा, अब दुबारा दिखाई न पड़ना वरना जउन कंटाप मारेंगे न एकदम्मे से लटक जाओगे, सरऊ पागल, आशिक बने हैं

वहां से निकल चंदर जब सड़क पर खड़ी अपनी स्प्लेंडर के पास आया और पूरी तरह आश्वस्त हो लिया कि अब पाड़े जी की पहुँच से दूर है तो स्प्लेंडर पर बैठ स्टार्ट करते हुए पाड़े जी को बोला ” अबे ऐ पड़वा, रोज आएंगे बे, का कर लोगे, रोज लटकेंगे, रोज देखेंगे अपनी बुलबुल को, सालों मोहब्बत के दुश्मन अभी से आँख में गड़ने लगे हम, घर बसते नहीं देख सकते का बे, रुके रहो बेटा कुछ दिन की बात है, बीएड का फारम डाले हैं, निकल गया न गुरु तो यही, यही बे , यही बारात ले आएंगे और तुम्हरे इसी दुआरे दू घंटा नागिन की तरह छतिया पर लोटेंगे” पाड़े जी छत से लोटा फेंक के मारते हुए बोले, “रुको साले अबहिंन बीन बजाते है तुम्हरी” पाड़े जी का लोटा पहुँचता तब तक चन्दर की स्प्लेंडर 45 की स्पीड पर जा पहुंची थी।

शाम हो आई थी और मोहल्ले के बाजार में रौनक बढ़ रही थी, सुधा चन्दर के ही मोहल्ले में कुछ दूरी पर रहती थी, लेकिन बचपन से मामा के यहाँ बंबई में पढ़ी लिखी थी तो उसका मोहल्ले में रहना हो नहीं पाया था, अब आगे की पढाई के लिए अपने घर वापस आ चुकी थी, और इसी के साथ चन्दर की ज़िंदगी में एक नया उजाला भी हो चला था….

पान की गुमटी पर खड़े हो, चन्दर ने कमला पसंद का पाउच फाड़ा ही था कि सामने से सुधा आती दिख गई….चन्दर के साथ उसका एक दोस्त मंटू था, बोला…”अबे चन्दर ई कौन है बे, नवा आवा है का मोहल्ले में भाई, कभौ देखा नै बे” चंदर ने उसके गले में हाथ लपेटते हुए जोर से कसके सुधा की तरफ देखते हुये कहाँ ” भौजी है तुम्हरी, जरा अदब से, जरा झुक के.. का समझे” मंटू ने झट से गर्दन छुड़ाई और बोला…हाँ बेटा रित्तिक रौशन नई वाली भी तुम्हरी, पुरानी वाली भी तुम्हरी, हरी, लाल, पीली, सब तुम्हरी, तो हम का करें बे, घंटा.. केवल तुम्हरी शादी में नचनिया के लिए हैं का?? चन्दर ने करीब पुचकारते हुए मंटू से कहा…”ना रे मंटु इस बार मामला दिल का हो गया है” मंटू ने भुनभुनाते हुए कहा….और बार कहाँ से करते थे बे, अगर इस बार दिल से है तो

वहीँ सुधा करीब के ठेले वाले के पास जा कुछ मोलभाव करने लगी, चन्दर बेफिक्री से वहां पहुंचा और ठेले वाले से बोला, “चाचा जब मोहब्बत हो जाती है ना, तो मोलभाव नहीं करते, का चाचा सही बोले न” सुधा ने पैसा देते हुए ठेले वाले से कहा…”बिना मोल कोई सही सामान थोड़ी न बेचता है चाचा, का पता, पीतल के ऊपर सोने का पानी चढ़ा हो, देखना तो पड़ता है न चाचा” चन्दर जानता था ये बात सुधा ने उसे ही कही है, तब तक सुधा जाने लगी थी, चन्दर ने थोड़ा जोर से कहा…आग किस दिन काम आएगी, तपा ले कोई चाहे तो सोना ही निकलेगा, एकदम खरा…..ईमानवाले हैं कोई बंबइया यार नहीं”

रात हो आई थी, और चाँद आज पूरे शबाब पर था, चन्दर छत पर लेटा था …दूर फैले तारों सितारो को देख कभी कभी मुस्कुरा उठता था….कहीं दूर रेडियो पर गाना बज रहा था….

आँखों में नींदें न दिल में करार…मोहब्बत भी क्या चीज होती है यार….दिल चीर के देख तेरा ही नाम होगा

आज चन्दर को सुधा के बारे में सोचना तक अच्छा लग रहा था, वो सिर्फ सुधा के बारे में सोचना चाहता था…तुझे देखा तो ये जाना सनम, चन्दर अब हलकी हलकी नींद में था…कहीं दूर सरसो के खेतों में सुधा दौड़ी हुई चली आ रही है और ……………

सबेरे सबेरे ही चन्दर उठ गया था, आज महाशिवरात्रि थी, बगल वाले मंदिर पर मोहल्ले भर की लड़कियां शंकर जी पर जल चढाने आती थीं, सुधा के आने की उम्मीद ने चन्दर की स्प्लेंडर को शंकर भगवान् के मंदिर के दरवाजे ला खड़ा किया था….जल्द ही दुआ कबूल हो गई और सुधा आती दिख गई….सुधा के मंदिर में पहुँचने से पहले ही चन्दर मंदिर के पुजारी के पास जा बैठ गया और कुछ इस भाव से ध्यान लगाया जैसे अगर आज चन्दर ने पूजा न की तो शंकर जी की तीसरी आँख का खुलना तय और धरती नष्ट……सुधा आई, चन्दर को देख पुजारी को चढ़ावा देते हुए उसने कहा ” पूजा में कपट नहीं चलता पुजारी जी, दिल साफ़ हो तभी पूजा भी मंजूर होती है….आँखे बंद किया बैठा चन्दर उठ खड़ा हुआ और बोला

…अमे ऐ पुजारी सुनो, ज्यादा लंतरानी न हम नै समझ पाइत, माने कि कोई ये तो देखबै नै किया कि हाँ भाई लौंडा आया है, ध्यान लगाया है, भाव से बैठा है, अरे जब हमरा भगवान ही हमको मिल गया तो हम काहे किसी और दर जाएँ, हम जेकरे दर्शन खातिर आय रहें उ दिख गवा बात ख़तम, होये गई हमार शिवरात्रि

सुधा ने अपने बारे में इतने मीठे बोल पहली बार सुने थे, शर्मा कर रह गई और पुजारी के हाथों से प्रसाद ले जाने लगी, तो चन्दर बोला…”भक्त को परसाद भी न मिलेगा का” सुधा ने चलते चलते एक लड्डू निकाल बिना चन्दर की तरफ देखे बढ़ा दिया था और चंदर ने हाथो में लेते हुए कहा…”खाये कि सहेजे, बता दो बुलबुल” सुधा बोली….खाया तब जाय, जब स्वाद ज़िन्दगी भर याद रखा जाए, वरना लड्डू ही तो हैं… कहीं भी मिल जाएंगे….

आज दोपहर में चंदर फिर पाड़े जी की छत पर चढ़ा था….पर सुधा थी कि आज आ ही नहीं रही थी, ज्यादा समय हो गया तो चन्दर चुपके से नीचे उतरा…बाहर आया ही था कि सुधा एक रिक्शे पर बैठते दिख गई…शायद कहीं जा रही थी….चन्दर ने गाडी पीछे लगा ली…..रिक्शा वाला चला ही जा रहा था और साथ में चन्दर भी….अब सामने गंगा का किनारा था, सुधा रिक्शे से उतर सीधे गंगा की तरफ बढ़ गई….घाट पे बनी सीढ़ियों पर बैठ बनती बिगड़ती लहरों को देखने लगी, वो जानती थी कि चन्दर उसके पीछे ही है…उसने पीछे मुड़ के देखा तब तक चन्दर बगल में आ बैठ रहा था

गुनाहों का देवता

…सुधा बोली…”काहे जी, काहे हमरा पीछा करते हैं, हम का किये हैं आपका” चन्दर ने गंगा में कंकड़ मारते कहा…जान ले ली हो हमरा, जबसे देखें हैं न पगला गए हैं, साला एकदम ब्लाइंड हो गए हैं,…सुधा ने कहा ” हमरी एक सहेली कहती है न कि लड़के कुत्ते होते हैं, भौरा नीयन रस लेके उड़ जाते हैं, फिर कुछ न होता है उनका” चन्दर ने कहा” अमे कुत्ता से वफादार कौन है बे इस धरती पर सुधा…अरे हमार बुलबुल हम कुत्ता नहीं है, कुत्ता हमरा दिल है, और उ एकदम वफादार रहेगा….सुधा बोली…खाओ धरती माता के किरिया..कि कभी दगाबाजी नहीं करोगे, आँख का पुतरी नीयन जानोगे, मानोगे तब तो हम पियार करें वरना अबहींन हम कट लेते है……चंदर कुछ बोलता इसके पहले ही सुधा चन्दर के सीने से लग गई, और बोली काजोल और अजय देवगन अब तक साथ में हैं ना…………चन्दर ने भी सुधा को कस के गले से लगाते हुए का….हाँ जानेमन अब तक तो हैं साथ में, आगे का कौन जानता है…

सुधा ने चन्दर को हलकी सी चपत लगाई और सिमटती चली गई चन्दर की बाहों में

चाँद आज भी पूरे शबाब पर था, गंगा अविरल बह रही थी, और दूर कहीं रेडियो पर आवाज़ आ रही थी

छोड़ेंगे न हम तेरा साथ ओ साथी मरते दम तक

…..गुनाहों का देवता  धर्मवीर भारती का वो उपन्यास है जो मोहब्बत करने वालों का महाग्रंथ कहा जाता है. कहा जाता है कि इलाहाबाद का कोई लड़का जब जवान होता है तो उसके सिरहाने गुनाहों का देवता  ज़रूर पड़ा होता है. भावनाओं के महासमंदर में उमड़ घुमड़ आँखों से पाताल गंगा निकाल देने वाली इस प्रेम कहानी का अपना एक अलग ही मजा है. गुनाहों का देवता में सुधा के प्यार और चंदर की नैतिकता के बीच में जो जंग चलती है वो आपको अंत तक बांधे रहती है. पर हमने कोशिश की है इस कहानी को एक अलग रंग में परोसने की. सुधा भी वही है, चंदर भी वही है, और इलाहाबाद भी वही है, पर ये आज के दौर की मोहब्बत है. ये आज ही कल की कहानी है. तो कैसी लगी आपको ये नयी गुनाहों का देवता  की कहानी का ये नया फ्लेवर, कमेंट करके हमें ज़रूर बताये और शेयर भी करें 

3 Comments on “काजोल और अजय देवगन- गुनाहों का देवता

Leave a reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

आपकी भागीदारी