ग्लोबल गुमटी

जब तक रहे गंग जमन धारा, अटल रहे विश्वास हमारा-गुनाहों का देवता

तलाश 

गुनाहों के देवता की तीसरी किश्त-

दिन अपनी ढलान पर था, शाम हो आई थी, और अल्लापुर मोहल्ले का एक घर रंग बिरंगी टिमटिमाती लाइटों से जगमगाता हुआ ढीकचुक ढीकचुक फ़िल्मी और भोजपुरिया गानों में डूबा था….बीच बीच में घर की औरतों का मंगल गीत भी गूँज रहा था….हाँ आज चन्दर की बहन का ब्याह जो था।

लम्ब्रेटा स्कूटर को खड़ी कर उसके पीछे लदे हुए पत्तल के बोरे को निकालते हुए रघुनन्दन बाबु ने आवाज़ लगाई…चंदरवा रे!! अरे हो चंदरवा… ई बोरा ले जाके हलवाई के मथवा पे पटक दे, लिखवाते समय तो बोला नहीं, अब जब बरात दुअरे लगने वाली है तब याद आया है भैंसा को….चन्दर सीढ़ी पर चढ़ नीम के पेड़ में बंधा लाउडस्पीकर का मुँह किसी ख़ास दिशा में सेट कर रहा था…चन्दर भागा भागा आया और बोरा ले जाके हलवाई को दे आया।

आज चन्दर के घर की रौनक देखते ही बन रही थी, कितने सारे रिश्तेदार, नातेदार, आस पड़ोस वाले, जैसे सारा शहर जमा हो आया हो। शादी बियाह ही तो वो उत्सव होता है जब हम सब मिलके किसी का साथ देते है और अगर ख़ास तौर पर बिटिया का बियाह हो तब तो जैसे वो पूरे गाँव पूरे मोहल्ले की इज्जत बन जाती है, और इन सबमें सबसे आगे थे चन्दर के दोस्त…मंटू तो तीन दिन से यही था, न खाने की सुध न पीने की, बस शादी की तैयारियों में लगा रहा।

रात के आठ बज रहे थे और दूर से बारात के आने की आवाज़ सुनाई दे रही थी, घर की औरतें छत का कोना थाम रही थी, और जिम्मेदार मर्द आगवानी के लिए आगे आ गए थे, पर चन्दर कुछ बेचैन था, सबसे बात कर तो रहा था पर नज़रें कुछ ढूंढ रही थीं, बार बार छत पर देखता, कभी आते जाते रास्ते पर देखता…..तभी उसे आते हुए मंटू दिखा..इशारों में ही बात हुई, पर मंटू ने इंकार में गर्दन हिला दी, चन्दर और उदास हो गया। किसी ने पीछे से आवाज़ दी…बेटा चन्दर कइसे हो!! बहुत दिन से लटका नै देखा तुमको अपने छत पे तो सोचा पूछ लें सब ठीक तो है ना?? ये पाड़े जी थे, चन्दर ने खीज के कहा…सुनो चचा दुआरे आये हो, कायदे से रहो, खाओ पियो आशीष दो और निकल लो, एक तो वैसे ही माथा भन्ना रहा है ऊपर से लोड न दो, समझे का!!!

बारात आ पहुंची थी, इलाहाबाद में बारात में गाना बजने का कुछ नियम था… ऐसे ऐसे गाने बजते थे कि आपको अपने कान पर यकीन न हो, …गाना बज रहा था…तोहार लहंगा उठाई देब रिमोट से…..ऐ छिलटुआ की दीदी सुना तनि पियार करे द.. और इसके जस्ट बाद…आये हम बाराती…नेक्स्ट….मार दे सटा के लोहा गरम बा…नेक्स्ट..काला ई काला कौआ काट खायेगा और अंत में नागिन के साथ जो तांडव होता था वो अद्भुत था, अकल्पनीय था…फिलहाल बाराती नाचते गाते धीरे धीरे अंदर आ रहे थे, पर चंदर अब भी एक कोने में खड़ा किसी को तलाश रहा था…

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घोड़े पर बैठे दूल्हे को देख चन्दर न जाने क्या सोचने लगा कि आँखे भीग आई थी, घर की सजावट, बारात, नाच, गाना, इतना जलसा..चन्दर जैसे शांत हो गया था, इतने शोर में भी वो खामोश था, इतने सारे लोगों के बीच में भी वो खुद को अकेला पा रहा था।

द्वार पूजा की रस्म खत्म हो चुकी थी, और सब अब खाना खा रहे थे, बारात की तरफ से आई कोई लड़की, लगातार चन्दर को घूरे जा रही थी, चन्दर की नज़र उड़ते उड़ते उस पर पड़ी, चन्दर और मंटू आस पास ही थे, मंटू ने कहा…अबे चन्दर ई का हो रहा है भाई, एकदम से लालटेन हो गई है बे, ऐ भाई तुम्हार मन न हो तो हमको आगे बढाओ न? चन्दर ने उसका हाथ पकड़ा और कहा…जा जा बेटा… हम नहीं जानते ई कौन है..जब देखो तब तुम्हरे दिमाग में एकै बात घूमती रहती है…

रात हो आई थी और चंदर की बेचैनी भी काली रात की तरह और गहरा गई थी, किसी ने चन्दर से पानी मंगाया, हैंडपंप से पानी भरते समय न जाने क्या हुआ कि चन्दर फूट फूट कर रोने लगा, वहां कोई नहीं था, जल्दी से खुद को सामान्य किया और फिर अंदर चला गया।

शादी की रस्में अदा हो रही थीं, दूल्हा और दुल्हन बैठे थे, पंडित मंत्रोच्चार के बीच रस्म करवा रहा था, मंडप के कोने में कुछ लड़कियां और महिलायें बैठ मंगल गीत गा रही थी, चन्दर वहीँ खड़ा कुछ कुछ काम कर रहा था, पर वो अब भी कुछ तलाश रहा था…बारात से आई वो अंजान लड़की अब भी चन्दर को वैसे ही देखे ही जा रही थी।

उत्तर भारत में शादी ब्याह के मौके पर औरतें जो गीत गाती हैं उसमें प्रेम भरी गाली दी जाती है, ये गाली, दूल्हे को, दूल्हे की बहन से लेकर फूफा मामा बहनोई और भाई तक को मिलती थी….चन्दर गालियां सुन कभी कभी मुस्कुरा देता था…लड़कियों के कोने से एक ताना भरा गीत हुआ कि…. अरे दुलहिन का भईया बड़ा रसखोर, चितचोर है रे रसिया….ये गाली चन्दर को थी…आती हुई आवाज़ों में एक आवाज़ जानी पहचानी सी लगी,…चौंक के चन्दर ने जब लड़कियों की तरफ देखा तो अचानक से उसका चेहरा चमक उठा……सुधा लड़कियों के बीच में बैठ चन्दर को गाली देने में सबसे आगे थी…..नज़र से नज़र मिली, तो सुधा ने कनखियों से बारात में आई उस लड़की की तरफ इशारा किया जो कबसे चन्दर को घूरे जा रही थी…सुधा गा रही थी..चन्दर में जैसे जान आ गई हो….थोड़ी देर बाद सुधा उठी, और हैण्डपंम की तरफ बढ़ गई….चन्दर भाग के पीछे पीछे गया, और पानी चलाने लगा…सुधा दोनों हाथों से पानी पी रही थी, और अंत में पानी का छींटा मारते हुए चन्दर से बोली….का हुआ, काहे मुरझुराये थे जी, जाओ न, उस लड़की को ताड़ो, हमरा का है, हम तो यही रहेंगे, इसी घर में, चन्दर ने सुधा की बाह पकड़ते हुए कहा….सुधा, तुमको नहीं पता, आज हम मर गए थे, ई बताओ थी कहा…सुधा ने कहा..यही थे, हमेशा यही थे, तुमको दिखे तब न, छत पे थे, आज हम चाहते थे कि तुम हमका ढूंढो, हमका पा लो, पर तुम तो किसी और को ताड़ने में लगे थे…..

चन्दर ने आँखों में आंसू आ गए और बोला…नहीं रे सुधा…एक पल भी हमरा मन नहीं लगा था…अब आगे से ऐसा न करना…सुधा ने चन्दर की आँखों में आये आंसू पोछते हुए कहा..अच्छा ये बताओ..ऐसी ही बरात लाओगे न!! हम भी ऐसे ही सजेंगे न, हम उस दिन पर छिप जाएंगे, हमको ऐसे ही ढूंढना…पा लेना, और अपने साथ ले चलना, जनम जनम तक के लिए, चन्दर ने सुधा को बाहों में भर लिया था….

उधर शादी ख़त्म हो चुकी थी और मंडप से पंडित की आवाज़ आ रही थी

जब तक रहे गंग जमन धारा
अटल रहे विश्वास हमारा

गुनाहों का देवता  धर्मवीर भारती का वो उपन्यास है जो मोहब्बत करने वालों का महाग्रंथ कहा जाता है. कहा जाता है कि इलाहाबाद का कोई लड़का जब जवान होता है तो उसके सिरहाने गुनाहों का देवता  ज़रूर पड़ा होता है. भावनाओं के महासमंदर में उमड़ घुमड़ आँखों से पाताल गंगा निकाल देने वाली इस प्रेम कहानी का अपना एक अलग ही मजा है. गुनाहों का देवता में सुधा के प्यार और चंदर की नैतिकता के बीच में जो जंग चलती है वो आपको अंत तक बांधे रहती है. पर हमने कोशिश की है इस कहानी को एक अलग रंग में परोसने की. सुधा भी वही है, चंदर भी वही है, और इलाहाबाद भी वही है, पर ये आज के दौर की मोहब्बत है. ये आज ही कल की कहानी है. तो कैसी लगी आपको ये नयी गुनाहों का देवता  की कहानी का ये नया फ्लेवर, कमेंट करके हमें ज़रूर बताये और शेयर भी करें 

3 Comments on “जब तक रहे गंग जमन धारा, अटल रहे विश्वास हमारा-गुनाहों का देवता

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