ग्लोबल गुमटी

गुनाहों का देवता

गुनाहों का देवता

गुनाहों का देवता-आँसुओं से भीगी एक प्रेम कहानी

गुनाहों का देवता- बगीचे में नरम घास पर लेटकर बादलों को देखती हुई दो सहेलियाँ- सुधा और गेसू . सुधा जो ज़िन्दगी को यूँ ही बादलों को देखते हुए बिता देना चाहती है और गेसू जो अपनी मंगनी हो जाने से बेहद खुश है.

हँसी ठहाकों के बीच सुधा का गेसू से यह पूछना कि हम लड़कियों को शादी-ब्याह से मुक्ति क्यों नहीं मिलती मुझे आज भी उतना ही प्रासंगिक लगता है जितना १९४९ में प्रकाशित धर्मवीर भारती के उपन्यासगुनाहों के देवता’ की सुधा के लिए है या जितना १९३७ में प्रकाशित जैनेन्द्र के उपन्यास ‘त्यागपत्र’ की मृणाल के लिए था. लड़कियों के जीवन में तमाम अनिश्चितताओं के बावजूद अगर कुछ निश्चित मान लिया गया है तो वह है शादी !

चंदर और सुधा की कहानी पढ़ते हुए अगर 17 वर्ष की उम्र में आप बिलख-बिलखकर रोये हैं और सात वर्ष बीत जाने पर उसे कच्ची उम्र का असर मानते हैं तो एक बार फिर पढ़िए, पीड़ा के उन क्षणों में फिर उतरिये, मेरी तरह आप भी पायेंगे कि रोना बिला वज़ह तो नहीं आया था. वे आँसूं जो सुधा के लिए सुधा के साथ बहाए गए हैं वे कितने सच्चे और कितने पवित्र थे. गुनाहों का देवता पढ़ते हुए पम्मी का जीवन भी कुछ कम ध्यान आकर्षित नहीं करता, ‘एक कहानी लिखने के लिए कितनी कहानियों की ट्रेजेडी बर्दाश्त करनी पड़ती है’ पम्मी का चंदर को बोला गया यह वाक्य उसके जीवन का फ़लसफ़ा है. और मानुषिक जीवन का भी.

सुधा के बारे में जब भी सोचती हूँ, समानांतर रूप से मृणाल मेरे साथ चलती है . ‘मैं चिड़िया होना चाहती हूँ’ जैसी मासूम इच्छा वाली मृणाल. माता-पिताविहीन एक बच्ची, जिसने चुनाव किया, प्रेम किया, सही-गलत, पाप-पुण्य, नैतिक-अनैतिक की सामाजिक परिभाषाओं को एक फूँक से उड़ा दिया. खुद को बर्बादी के मंज़र तक धकेला पर अपनी चिड़िया होने की ख्वाहिश को आकाश दिया. सतरंगी पंखों वाली चिड़िया , मृणाल ! जाने क्या समानता है दोनों लड़कियों में कि इनसे दिल जुड़ जाता है. इसी समानता के लिए अज्ञेय ने लिखा होगा ‘जहां दुःख है/वहाँपर एक सुलगन/ पिघला कर हमें/ फिर जोड़ देती है.’ यहाँ यह दुःख ही है जो सुधा और मृणाल दोनों को एक ही धरातल पर ला खडा कर देते हैं.

भारती जी के शब्दों में ‘दुबली-पतली, नाटी सी साधारण-सी बहुत सुन्दर नहीं, केवल सुन्दर लेकिन बातचीत में बहुत दुलारी’ सुधा! पिता के सामने छोटी बच्ची जैसे जिद्द करती, और चंदर की माँ बन ध्यान रखने वाली सुधा ! जिसका ह्रदय विश्वास से भरा हो, ऐसा विश्वास जिसे बड़े से बड़ा तूफ़ान भी डिगा ना सके. चंदर को दिए वचन के साथ जो सच में इतनी ऊंचाई पर पहुँच गई जहां से खुद चंदर भी उसे नहीं छू सकता था.

मेरी तरह आपके दिल में भी सुधा के लिए वही दुलार उमड़ता होगा जो अपने आस-पास फुदकती किसी भी इठलाती, अल्हड़ता की आड़ में छिपी समझदार लड़की के प्रति उमड़ता होगा. जैसे कोई बचपन की साथी, जिसके साथ स्कूल में सबसे पीछे की लाइन के बेंच पर बैठकर छिपकर खाना खाया हो और मुँह दबाने पर भी हँसी का फव्वारा फूट पडा हो. जिसके साथ क्लास से बाहर निकाल दिए जाने पर भी आँखों की चमक फीकी ना पडी हो.

जिसके साथ कविताएँ पढ़ी हों, पहले-पहले प्यार की चुहल और छेड़ की हो. वही बचपन की सहेली सुधा जब दर्द से चीखती है तो कलेजा मुँह को आता है (यकीन मानिए कलेजा मुँह को आना का प्रयोग मैं पहली बार किसी घटना के लिए कर रही हूँ) और मैं आगे पढ़ते हुए घबराने लगती हूँ. नहीं सुधा के साथ ये नहीं हो सकता. ये वही पल था जब हॉस्पिटल में किसी अपने की चीखें आपको नास्तिक होते हुए भी एक मूर्ती के सामने हाथ जोड़ने पर विवश कर दे.

सुधा की चींख, कराह और चंदर के लिए पुकार कितनी रातों तक मेरे कानों में गूंजती रही. एक रात में किताब पढ़कर जब ख़त्म की तो सर भारी था, चेहरा आँसूओं से भीगा हुआ. सुधा जा चुकी थी. अगले दो दिन मातम में बीते, मैंने किसी अपने खो दिया था. यह कोई एतिहासिक कृति है ऐसा कोई दावा नहीं लेकिन असह्य पीड़ा की जो अनुभूति अपने पात्रों के साथ भारती जी पाठकों को करवा गए हैं वही इस उपन्यास की खासियत है.

संदेह, मांझे सा उलझा मन, खालीपन, आदर्शवाद, विश्वास और अविश्वास की जंग, अपराधबोध और सुधा की मृत्यु यही सब रहा जिसने आदर्शवाद की तलाश में फँसे एक युवक को गुनाहों का देवता बना दिया. हमें प्रेम का जो आदर्शवादी स्वरुप बताया जाता है वो उस ऊंचाई पर स्थापित है जहाँ से मनुष्य चोट ही खाता है. प्रेम बराबरी और साहचर्य है ऐसा कोई नहीं सिखाता. लेकिन प्रेम में त्याग और पवित्रता की बातें करना-सुनना हम सभी को पसंद आता है.

प्लूटोनिक लव की जो भावना चंदर और सुधा के बीच पनपती है वहाँ छिछलेपन के लिए कतई जगह नहीं थी. सुधा को किसी और से शादी के लिए मनाते हुए चंदर सुधा से पूछता है ‘हम लोगों ने स्वर्ग की ऊंचाइयों पर साथ बैठ कर आत्मा का संगीत सुना सिर्फ इसलिए कि उसे अपने ब्याह की शहनाइयों में बदल दें?’

प्रतिउत्तर में सुधा भी एक सवाल पूछती है- ‘मैं जानती हूँ कि मैं तुम्हारे लिए राखी के सूत से भी ज़्यादा पवित्र रही हूँ, लेकिन मैं जैसी हूँ मुझे वैसी ही क्यों नहीं रहने देते? मैं शादी नहीं करुँगी.’ प्रेम में देवत्व का जो आदर्श चंदर स्थापित करना चाहता था उसमें वह सुधा को साधारण लड़कियों की तरह भावुक नहीं देखना चाहता था वह खुद से सवाल करता है कि कहीं उसने सुधा का गलत मूल्यांकन तो नहीं किया ! कहीं सुधा में भी प्रेम और घृणा का स्तर सामान्य तो नहीं है !

प्रश्न है यह मूल्यांकन क्यों? देवत्व की चाह क्यों? सुधा की बलि देकर कैसा देवत्व ? सुधा की रुखाई पर भी चंदर सोचता है कि लड़कियां भावनाओं की बनी होती हैं, साधना करना उन्हें आता ही नहीं क्या . दूसरी तरफ वह यह भी भलीभांति जानता है कि सुधा उसकी आत्मा है और वह खुद अपने हाथों से अपनी आत्मा को घोंट रहा है. एक ह्त्या का पाप उसके सर चढ़ सकता है.

प्रणय-विवाह और त्याग-पवित्रता के अंतर्द्वंद में फंसा चंदर दरअसल साधारण नहीं हो पा रहा. यह देवत्व की चाह मनुष्य को मनुष्य नहीं रहने दे पाती. वही चंदर जो सुधा को त्याग और पवित्रता की राह दिखाता है आगे चलकर बिनती से कहता है कि कोई भी लड़की कितनी भी प्रतिभाशाली क्यों ना हो प्रेम में शरीर की चाह रखती ही है. सुधा का वैवाहिक जीवन के प्रति दुःख भी उसे एक ढोंग जैसा प्रतीत होने लगता है.

दरअसल हमेशा से सेक्स को भारतीय परिवेश में जिस नज़र से देखा गया है वही कंडीशनिंग पाकर चंदर उसे प्रेम का निकृष्ट रूप मान बैठा. बिनती के सेक्स को खाने-पीने-हँसने-बोलने जितनी एक स्वाभाविक प्रक्रिया कहने पर चंदर सोचता है – ‘ज़िन्दगी यह है-मांसलता और प्यास और उसके साथ-साथ अपने को छिपाने की कला…’ अपने अंतर्द्वंदों में फंसा चंदर खुद भी संवेदना का पात्र है- लड़कियों की कोमलता से उसे वितृष्णा सी होने लगती है –‘औरतों के रोने की कहाँ तक परवाह की जाये , वे कुत्ते, बिल्ली तक के लिए उतने ही दुःख से रोती हैं.’ चंदर की कटुता उसकी ज़द्दोज़हद का ही नतीजा थी.

वहीँ दूसरी ओर गाँव से आई छुईमुई लड़की बिनती जो अपनी बुआ से डांट खाकर रो दिया करती थी अब दबंगई के साथ अपनी बात कहने लगी और शादी करने से साफ़ इनकार कर दिया. और अपने स्वाभिमान की रक्षा की ज़िम्मेदारी खुद उठा ली. चंदर के व्यक्तित्व को गढ़ने में एक और कड़ी बनती है पम्मी. जिसके बाहुपाश में चंदर को एहसास होता है कि केवल सेक्स की इच्छा रख लेने भर से कोई निकृष्ट कोटि का नहीं हो जाता.
चंदर को देवता का स्थान देने वाली सुधा , जिसने कभी प्रेम का प्रतिदान नहीं चाहा. पीड़ा के अंतिम क्षणों में भी केवल चंदर को पुकारती है. उसके निश्छल प्यार ने कहीं ना कहीं चन्दर के प्रेम, प्रणय, पवित्रता और त्याग के आदर्शों को बौना बना दिया. आसुओं से भीगी यह प्रेम कहानी आत्मा को छीलती है और सवाल खडा करती है कि क्यों मनुष्य के नाजुक और भावात्मक कन्धों पर देवत्व का बोझ डाला जाता है. क्यों हमें कीचड भरी ज़मीन पर खड़े होकर सतरंगी पतंग उड़ाने को विवश किया जाता है और क्यों आखिर लड़कियों का जीवन लड़कियों जैसा तय कर दिया जाता है.

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