ग्लोबल गुमटी

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फ़राज़-ए-दार पे भी मैंने तेरे गीत गाए हैं, बता ऐ ज़िंदगी तू लेगी कब तक इम्तिहाँ मेरा

उत्तर प्रदेश के पूर्वी इलाके में बसा एक मामूली-सा शहर आजमगढ़. शहर की ऊबड़-खाबड़ सड़कों और बेतरतीब फैली गलियों से गुजरते हुए कतई ऐसा महसूस नहीं होता कि इस शहर में कुछ खास है. जंग खाई पान की गुमटियों, प्लास्टर झ्ड़े बेरंग मकानों और बड़े-बड़े गड्ढे वाले रास्तों से निकलकर आप एक बड़े से गेट पर पहुंचते हैं. इसी गेट के भीतर सफेद रंग में पुती वह इमारत है और करीब 15 एकड़ में फैला एक विशालकाय कैंपस.

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यह आजमगढ़ का शिबली नेशनल कॉलेज है, जहां एक अंक से शुरू हुई लड़कियों की मौजूदगी का प्रतिशत आज पचास फीसदी पर पहुंच गया है. यानी लड़के और लड़कियों की संख्या बराबर है.

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कंप्यूटर क्लास लड़कियों से खचाखच भरी है. चेहरे बेशक बुर्के में ढके हैं, लेकिन उनकी आंखों का आत्मविश्वास और की-बोर्ड पर धड़ल्ले से चलती उंगलियां सुखद आश्चर्य से भर देती हैं. इनमें से कई लड़कियां आजमगढ़ के आसपास के इलाकों की हैं, जो मई-जून के 47-48 डिग्री तापमान में भी रोज 40-50 किलोमीटर का सफर तय करके यहां आती हैं और मुस्कराकर कहती हैं, ”अपने पैरों पर खड़ा होना है. कंप्यूटर सीखकर हम नौकरी करेंगे

आजमगढ़ के शिक्षाविद् अल्लामा शिबली नोमानी द्वारा 129 साल पहले स्थापित इस शिबली कॉलेज ने आजमगढ़ को एक पहचान दी है.

जी, हम बात कर रहें हैं शिबली नोमानी की

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शिबली नोमानी एक ऐसा नाम जिन्होनें नौजवानी के दिनों में इस देश की जंगे आज़ादी में भाग लिया तो जब उम्र ढली तो रोशनाई थाम साहित्य और शिक्षा की अलख जगाई.

शिबली नोमानी का जन्म उत्तर प्रदेश के जिला आजमगढ़ के एक गाव बिंदवल में मई 1857 में एक ऐसे दिन हुई जब आजमगढ़ के लोग अपनी पहली जंग-ए-आजादी के सिलसिले में जिला जेल के फ़ाटक को तोड़कर बहुत से क़ैदियों को निकाल ले गए।

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मौलाना शिबली का व्‍यक्‍तित्‍व अनुकरणीय था और वे ज्ञान का भंडार थे। उनकी बौद्धिकता और साक्षरता के कारण उनका तार्किक तथा साहित्‍यिक समाज में दबदबा था। 17वीं शताब्‍दी के सुधारवादी दौर में अपनी बौद्धिक क्षमता और साहित्‍यिक संवेदना के कारण उनका वर्चस्‍व रहा। वह जिस दुनिया में रहे शायद वह दुनिया आज की दुनिया से अलग थी। उनका जीवन, उनके यात्रा वृतांत, उनका मित्र वर्ग इसका प्रमाण है और इन सबसे बढ़कर उनकी विद्वत्‍ता तथा तार्किक समझ का प्रमाण उनकी महत्‍वपूर्ण कृति अल-फारुक हैं, जिसका अनुवाद कई भाषाओं में किया गया है। उनका एक अन्‍य महत्‍वपूर्ण कार्य फारसी काव्‍य की ऐतिहासिक पुस्‍तक शैरुल आजम है जिसने ई. जी. ब्राउन के फारसी साहित्‍य का इतिहास के चार संस्‍करणों में अपनी उपस्‍थिति दर्ज की है, ब्राउन ने इसे 17वीं शताब्‍दी के अंतिम वर्षों की सबसे महत्‍वपूर्ण फारसी रचना बताया है।

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मौलाना शिबली नोमानी जिस सबसे महत्‍वपूर्ण प्रश्‍न को बार-बार उठाते थे वह था कि ब्रिटिश शासन के दौरान भारत और भारतियों को आधुनिक बनाने में शिक्षा की क्‍या भूमिका हो सकती है।

अल्लामा शिबली नोमानी जिंदगी के आखिरी पल में भी शिक्षा के प्रति चिंतित थे। वह चाहते थे कि मुल्क का प्रत्येक बच्चा स्कूल जाए। –  शिबली नोमानी कहते थे कि तालीम हासिल करने के बाद आर्थिक तंगी का शिकार नहीं होना चाहिए। शिक्षा के लिए भेदभाव नहीं होना चाहिए।

 18 नवंबर  1914 को नोमानी साहब इस दुनिया से विदा हो गए थे. 

शिबली नोमानी साहब ने शेरो शायरी और ग़ज़ल की दुनिया में भी ख़ासा मुकाम हासिल किया. पेश हैं उनकी ये ग़ज़ल

तीर-ए-क़ातिल का ये एहसाँ रह गया

जा-ए-दिल सीना में पैकाँ रह गया

की ज़रा दस्त-ए-जुनूँ ने कोतही

चाक कर ता-ब-दामाँ रह गया

दो क़दम चल कर तिरे वहशी के साथ

जादा-ए-राह-ए-बयाबाँ रह गया

क़त्ल हो कर भी सुबुकदोशी कहाँ

तेग़ का गर्दन पे एहसाँ रह गया

हम तो पहुँचे बज़्म-ए-जानाँ तक मगर

शिकवा-ए-बेदाद-ए-दरबाँ रह गया

क्या क़यामत है कि कू-ए-यार से

हम तो निकले और अरमाँ रह गया

दूसरों पर क्या खुले राज़-ए-दहन

जबकि ख़ुद साने से पिन्हाँ रह गया

जज़्बा-ए-दिल का ज़रा देखो असर

तीर निकला भी तो पैकाँ रह गया

जामा-ए-हस्ती भी अब तन पर नहीं

देख वहशी तेरा उर्यां रह गया

ज़ोफ़ मरने भी नहीं देता मुझे

मैं अजल से भी तो पिन्हाँ रह गया

जुनूँ तुझ से समझ लूँगा अगर

एक भी तार-ए-गरेबाँ रह गया

हुस्न चमका यार का अब आफ़्ताब

इक चराग़-ए-ज़ेर-ए-दामाँ रह गया

लोग पहुँचे मंज़िल-ए-मक़्सूद तक

मैं जरस की तरह नालाँ रह गया

याद रखना दोस्तो इस बज़्म में

के ‘शिबली’ भी ग़ज़ल-ख़्वाँ रह गया

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