ग्लोबल गुमटी

jamun

जमुनिया, जमुनिया, जमुनिया..

जमुनिया, जमुनिया, जमुनिया..

 

“जामुन”। बात बड़ी साधारण है कि भला जामुन किसने ना खाया होगा अपनी ज़िंदगी में। पर कभी कभी उसी ज़िंदगी में ऐसे भी पल आते हैं जब आप जामुन को केवल देख सकते हैं, खा नही सकते। दिल्ली महानगर कि सड़क पर जब ठेले पर काले काले चमचम करते जामुन को अकड़ के पड़ा हुआ देखता हुँ तो मन क्रोध से भर जा रहा है। जामुन तब जामुन नहीं लगता है, IS का मुखिया  “अबु बकर बगदादी”  लेटा हुआ है ठेले पर। मन में आता है दोनों हाथों से उठा पीस दूं उसको, मार लात रिद्द छिद्द कर दूं , ठेलवा उलटा दूं और सड़क पर बिखेर दूं जिसे आती जाती गाड़ियां कुचलती जाये।

जामुन की छोड़िये, जामुन बेचने वाला भी गजबे समाजशास्त्री और मनोविश्लेषक होता है और उसका व्यवहार सचिवालय में बैठे बड़ा बाबू की तरह होता है। वो  देखते जान जाता है कि कौन जामुन लेगा और कौन जामुन की बस जानकारी लेगा। आप पैदल पसीना से लथपथ हाथ में झोला या पॉलिथीन लिये घुमते हुए उसके ठेले के पास जा पूछिए “जी भैया, जामुन कैसे दे रहे हैँ?”  ठेला वाला आपकी तरफ देखे बिना जामुन पर पानी का छीँटा मारता रहेगा। आप एक दो बार फिर बोलियेगा, आखिर में एक बार बोलियेगा “अरे भईया, अरे बताओ न जामुन कैसे किलो दे रहे हैं “। किलो सुनते वो आपकी तरफ देखेगा, जामुन देने के लिए नहीं बल्कि सिर्फ आपकी दिमागी हालत देखने के लिए, और तब बड़े कर्कस आवाज में बोलेगा “60 रूपये पाव है, चलो भीड़ हटा लो भैया, आगे ले लो खीरे हरे वाले मिल रहे हैं ” ।

उसके मुँह से ये वाक्य पूरा होने से पहले हम आधी दूर निकल लिये होते हैं । समझ नही आता कि आखिर ये वही जामुन है, जिसे हमारे गाँव में बकरी खा के अघा जाती थी। मुझे याद है, मेरे घर ठीक सटे हाई स्कूल से सड़क पार करते ही एक मजार था और उसके ठीक पीछे एक झाड़ीनुमा जंगल, उसी से सटा एक छोटा पोखर और उसी की मेढ़ के किनारे कतारों में खड़े जामुन के कई पेड़ थे। अक्सर वहाँ जाने के क्रम में मैं सुबह दोपहर स्कूल भी होता जाता था क्योंकि उसी की दीवार टप हम सड़क पार करते थे। भरी दुपहरी में जब लू को भी लू मार दे, हम सारे दोस्त इकट्ठा हो जामुन तोड़ने निकल जाते थे। बहाने के तौर पर हाथ में एक लोटा ले लेते थे जो इस बात का संकेत होता था कि हमे बड़ी मजबुरी में जाना पड़ रहा है वर्ना उस धुप बताश में भला कौन घर से बाहर कदम रखने देता। भला हो गाँव का कि उस समय भी आज के ही विकसित निर्मल भारत की तरह शौचालय मुश्किल से ही होता था घरों में।

अच्छा घर वाले अक्सर हड़काते कि उधर मत जाया करो, वहां भूत रहता है। पर हम जाते थे क्योंकि वहां जामुन भी होता था। भूत का डर बच्चों की मनमानी रोकने का एक अहिंसक तरीका था जिसे सामान्य तौर पर बच्चे मान लेते थे पर हमारा लेवल अब बढ़ चुका था, हम भूत के लेवल से उठ बाप के लात जूते तक पहुँच चुके थे, हमें रोकते तो वही रोकते, भूत नही।

अच्छा जामुन पेड़ और पोखरा का पिँढ़, ऊपर से दोपहर 12 से 1 बजे का समय, गाँव के बुजुर्गों के अनुसार ये भूत के उत्पात की सबसे आदर्श दशा थी, हमारे लिए भी यही आदर्श समय था जामुन तोड़ने का। टीम का सबसे एक्सपर्ट पेड़चढ़वा लड़का फटाक पेड़ चढ़ता और जामुन से लदे डाल हिलाता, हम नीचे बाढ़ पीड़ितो की तरह लुटम लुट मचा के जामुन जमा करते। कई बार पेड़ चढ़ने वाला बस डाल डुलाता रह जाता और नीचे वाले सब जामुन खा जाते। अच्छा, मुँह में लाख जामुन हो पर मन के एक कोने में भूतवा वाला बात बैठा जरूर रहता था, जैसे पेड़ चढ़े लड़के की डाल हवा से इधर उधर हिली की वो भूत-भूत बोल नीचे सीधे पोखर में कूद जाता। पर हम सब भागते नहीं, भूत रोज मिलेगा, जामुन साल में बस 15 दिन..

सो हम डटकर मुकाबला करते थे। अब हम नीचे से ढेला मार जामुन झड़ाते, मार ढेला, मार ढेला..। कभी ढेला मार में निशाना चूकते ही हमें भूत के अस्तित्व का भरोसा एकदम हो जाता। “अरे साला, अबे ई दोगला भूतवा को देखा, हमरा ढेला केने फेंकवा दिया”। ये सुनते हम जितना खाया उतना संतोष कर निकल लेते, सब अगले दिन पर छोड़।

मालूम आज तक पैसा से खरीद जामुन नही खाये हम। चाहे तो चुरा के या तो झड़ा के खाये। आज भी पूछा तो गाँव में जामुन कौड़ी के ही भाव मिल रहा है। पर दिल्ली आ क्या हो गया हमरे जमुनवा को? अभी सोचा तो उछल गया। ठीक ही तो कर रहा है जामुन।

जामुन हर भरे पेट की औषधीय जरूरत है। मेरे जामुन ने ये नब्ज पकड़ ली। इसने खाली पेट की तबाही देखी थी, आज भरे पेट की मजबुरी भी समझ रहा है। इसने हमारी तरह गाँव से आके खीरा ककड़ी की तरह मामुली होना स्वीकार नहीं किया। इसे अपना मोल पता था। ये शहर खाये अघाये लोगों से भरा पड़ा है , और उनका पेट ना जाने कितनों के खून-पसीने को चूस-ठुँस फूला है। जब-जब उनके पेट में किसी गरीब की आह गुड़-गुड़ करती है, उनको जामुन की जरुरत पड़ती है और ये जामुन उनसे पूरी कीमत वसुलता है।

ये उनके पनीर और पिज्जा से ज्यादा कीमत लेता है उनकी मरोड़ के बदले। उस पर भी पूरी नही, हल्की मिठास ही देता है। ये जामुन ही है जो एक ठेले के आगे लाखों की गाड़ी को रूकने के लिए मजबुर कर देता है और एक किलो के बदले 200 रू-300 रू गरीब ठेले वाले को दिलवाता है।

ये अमीरों की हेंकड़ी तोड़ता है जब तंदुरी और बर्गर खाये पेट का इलाज मैक्स और फोर्टिज वाले भी नही कर पाते हैं, तो ये जामुन की शरण में आते हैं ।

इस अर्थ में मेरा जामुन मेरा बिरसा मुंडा है, मेरा सिद्धु कान्हु है, मेरा तिलका माँझी है। ये महाजनों से कभी मजबुरी में बंधक रखे पायल, नथिया, झुमका, खून-पसीना वो सब वसुलने की कवायद करता है जो सदियों पहले से आज तक लुट रहा है कोई।

आप देखिये न कितना काला है ऊपर से जामुन, पर अंदर कितना सफेद, मीठा, मांसल और औषध के गुण से भरपूर। जो कहिये जामुन फिर भी चाहे जितनी कीमत ले पर नुकसान नहीं दे रहा, उनके पेट को राहत ही देता है। इसकी लड़ाई किसी को नुकसान पहुँचाने की नहीं बल्कि बस अपना सच्चा हक पाने की है। ये लड़ाई जंगल से लेकर ठेले के जामुन तक जारी है साहब।

 मैं अपने जामुन के साथ हूं, इसकी कीमत और बढ़े, ये और चढ़े। अरे मेरे लिए तो ये आज भी पोखरे के पीढ़ पर बिना किसी कीमत खड़ा है, बस मेरे जाने भर की देर है।

हां ये जो ठेले पर शान से बैठा है न ये “जामुन मेरा बिरसा मुंडा है”। जय हो।।

 

नीलोत्पल मृणाल

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