ग्लोबल गुमटी

सलाम नेहरु

कई तर्क दिए जाते हैं आज की ‘पढ़ी-लिखी’ जेनरेशन द्वारा हमारे पहले प्रधान मंत्री को गाली देने के लिए। मैं उनका कोई भक्त नहीं हूँ लेकिन उन बिंदुओं पर चर्चा तो की ही जा सकती है।

  • कई लोग नेहरू को भारत के विभाजन का ज़िम्मेदार माने हैं। वो कहते हैं कि नेहरू ने  गांधी के उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया जिसमें गांधी जिन्ना को प्रधानमंत्री पद देना चाहते थे। इसलिए नेहरू का लालच और स्वार्थ विभाजन करा गया।
    ख़ैर, ये सिक्के का सिर्फ़ एक ही पहलू है। ये बात सही है कि उन्होंने जिन्ना के लिए पद छोड़ने से इंकार कर दिया था लेकिन इसलिए क्योंकि यदि ऐसा होता तो हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग में जमकर हिंसा होती और कोंग्रेस मूक़दर्शक ही बनी रह जाती। हिंदू महासभा वैसे भी कोंग्रेस को प्रो-मुस्लिम कह चुकी थी, ऐसा होने पर बात और पुख़्ता हो जाती। सरदार पटेल स्वयं नेहरू के साथ थे (1) और नेहरू ने कहा भी था-“हम विभाजन नहीं चाहते, लेकिन हमारे पास कोई दूसरा उपाय नहीं है।” आप स्वयं परिस्थिति को सोचिए, आप भी पाएँगे कि कोई और रास्ता नहीं था।
  • लोग भद्दी गालियाँ इस्तेमाल करते हुए नेहरू के एडविना माउंटबेटन के साथ सम्बंध को नाजायज़ बताते हैं।
    मैं आपसे एक बात पूछता हूँ। क्या किसी व्यक्ति की मित्र महिला/लड़की नहीं हो सकती? क्या जिसे भी साथ में देखो, सबको शारीरिक सम्बन्ध का जामा पहनाया जा सकता है? एडविना का पति (लॉर्ड माउंटबेटन) हमेशा उसके साथ रहता था एवं दोनों की मित्रता के बारे में जानता भी था। बुद्धिमान व्यक्ति इस तर्क से भी सहमत होंगे कि पब्लिक फ़िगर अपने गुप्त सम्बन्धों को सार्वजनिक करने से बचते ही हैं (बिल क्लिंटन और मोनिका लेविंस्की की तरह) लेकिन ऐसा इन दोनों की मित्रता में नहीं था।
    साथ ही, आपको विश्वास नहीं होगा कि ये नेहरू की माउंटबेटन के साथ मित्रता ही थी जिसने हमको फ़िरोज़पुर (पंजाब-पाकिस्तान बॉर्डर) दिलवाया।(2) जिन्ना हमेशा दुखी रहते थे और इस मित्रता को कोसते रहते थे।
  • नेहरू को कश्मीर मुद्दे को UN तक ले जाने के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाता है।
    इसमें कोई दोराय नहीं कि ये मुद्दा आज भी मुसीबतों की जड़ है और UN तक ले जाने का निर्णय ग़लत साबित हुआ। अवश्य ही सरदार पटेल सहमत नहीं थे लेकिन नेहरू ने ये निर्णय इस बात को मद्देनज़र रखते लिया कि UNO को शांति स्थापित और सही निर्णय के लिए जाना जा रहा था। यदि हम गुट निरपेक्ष नहीं रहे होते तो शायद निर्णय हमारे पक्ष में जा भी सकता था। ये शीत युद्ध में हमारे किसी का समर्थन ना करने और पाकिस्तान के अमेरिका को खुले समर्थन का नतीजा ही था।
    थोड़ा और पीछे जाएँ तो आप ये भी पाएँगे कि नेहरू ही शेख़ अब्दुल्ला के मित्र थे और शेख़ के नेतृत्व में ही कश्मीरी मुस्लिम हिंदुस्तान से मिलने को राज़ी हुए थे।(3)
  • नेहरू और सरदार पटेल के आपसी मतभेद पर भी कई उँगलियाँ उठाई जाती हैं जिसमें आख़िरकार नेहरू को ही दोष दिया जाता है।
    निस्सन्देह, दोनों के बीच मतभेद थे। लेकिन दोनों के बीच तब भी एक-दूसरे के लिए आदर था। 1948 में गांधी की मृत्यु के समय सरदार के कंधे पर ही नेहरू फूट-फूट कर रोए थे। दोनों कई मुद्दों पर एक थे, कुछ पर अलग-अलग भी थे लेकिन दोनों देश का ही भला चाहते थे, अपना नहीं।नेहरू अपने ही देश में अजनबी से बन गए थे जब 1950 में उन्होंने सरदार पटेल को खोया था।
  • 1962 में चीन से मिली हार भी नेहरू की ही ग़लती थी।
    नेहरू के नेतृत्व में भारत पहला देश बना जिसने कॉम्युनिस्ट चीन को मान्यता दी। चीन की स्थायी सदस्यता का भी सपोर्ट किया। 1945 में झाऊ एनलाई के साथ पंचशील साइन होते ही “हिंदी चीनी भाई भाई” भी हो गए। उस समय यदि नेहरू और एनलाई भाई नहीं थे तो किसी पक्के मित्र से काम भी नहीं थे।(4)
    इन सबके बावजूद, दलाई लामा और तिब्बतियों को नेहरू ने भारत में शरण दी लेकिन साथ ही मतभेद करने की उम्मीद से तिब्बत को चीन का हिस्सा मानना भी स्वीकार किया।
    इतनी घनिष्ठ मित्रता होने के बावजूद जब 1962 में हमला हुआ तो स्वयं नेहरू भी आश्चर्यचकित रह गए थे। इतिहास में हम पहले नतीजा देखते हैं फिर उस समय लिए गए निर्णयों कि समीक्षा करते हैं। नेहरू के पास इतिहास नहीं था, उनको आगे के लिए निर्णय लेने थे, जिसमें वो चीन को सही ढंग से समझ नहीं पाए और पूरे देश को शर्मिंदा होना पड़ा।
    इसके बाद वो ऐसे ही जिए जैसे किसी ने उनकी ‘पीठ में छुरा’ घोंपा हो। वो भी गांधी की तरह अंत में असफल रहे लेकिन गांधी की तरह उन्होंने ने भी कभी देश का बुरा नहीं सोचा।

अब एक बार नेहरू की विशेषताओं पर भी नज़र डाल लेते हैं।

  • वो स्वयं एक विचारक थे ना कि सिर्फ़ चापलूस। उनके पिता (मोतीलाल नेहरु) की 1928 की रिपोर्ट पर भी उन्होंने प्रश्न उठाए थे एवं गांधी से भी असहमति कई बार व्यक्त की थी।
  • वे स्वतंत्र भारत के बेहद प्रसिद्ध नेता थे। पहले चुनाव में, जिसमें कोंग्रेस की जीत पक्की थी, सबसे ज़्यादा रैलियाँ नेहरु ने की थी। राजगोपालचारी उनसे मतभेदों के चलते बाद में कोंग्रेस से अलग हो गए थे लेकिन नेहरू की मृत्यु के समय उन्होंने लिखा था-“नेहरू मुझसे 11 वर्ष छोटे थे लेकिन 11 गुना अधिक प्रसिद्ध थे और देश को उनकी मुझसे 1100 गुना अधिक ज़रूरत थी।”(5)
  • वो विश्वस्तरीय नेता भी थे। गुट निरपेक्ष आंदोलन में अहम भूमिका रही। उन्ही के कारण विश्व आज हमको तीसरी दुनिया का नेता मानती है जिसमें लगभग 120 देश हैं। उस समय पता था कि USA और USSR, दोनों ही सहायता नहीं करेंगी लेकिन फिर भी ये कठिन लेकिन स्वतंत्र रास्ता चुनने की दम दिखायी। जब आयज़ेन्हावर (उस समय के USA के राष्ट्रपति) के सचिव ने नेहरू से पूछा कि वो उनके साथ हैं या ख़िलाफ़, नेहरू ने कहा-“हाँ।” मतलब सही कामों में साथ हैं और ग़लत कामों में नहीं। (उदाहरण के लिए 1956-75 का वियतनाम युद्ध)।(6)
  • स्वतंत्रता के बाद भारत को कई नए आयाम दिए जिसके कारण आज उस समय को ही ‘नेहरुवीयन एरा’ कहा जाने लगा है। कहते हैं उस समय भारत का पूरा बजट न्यू यॉर्क के बजट के बराबर था। फिर भी नेहरू ने उसमें से पूरा देश सम्हाल लिया और वैश्विक स्तर पर देश का नाम रहा सो अलग।
  • उनके कैबिनेट में अलग-अलग विचारधारा के लोग रहे। अम्बेडकर, श्यामाप्रसाद मुखर्जी। उन्होंने जयप्रकाश नारायण से भी निवेदन किया था परंतु वे शामिल नहीं हो पाए। लगभग सारे संसद सत्रों में उपस्थित रहे एवं सभी के विचारों को ध्यान से सुना भी।
  • नेहरू एक ऐसे व्यक्तित्व रहे हैं जिन्होंने ने उस समय देश को जोड़े रखा जब सारे पंडित भारत को ‘असफल राज्य’ का दर्जा दे रहे थे। 1964 के पाकिस्तान के एक पत्रकारों के सम्मेलन में एक पाकिस्तानी पत्रकार ने भारतीय पत्रकार से कहा-“हमारे जिन्ना और लियाक़त जल्दी चले गए और तुम्हारे नेहरू अभी तक ज़िंदा हैं इसलिए तुम लोग हमसे आगे निकल गए, एक बार उनको भी चला जाने दो, फिर तुम भी हमारे बराबर आ जाओगे।”(7)

किसी पत्रकार ने एक बार पूछा कि आपकी मृत्यु के बाद लोग आपको किस रूप में याद रखें? तो उन्होंने कहा-“एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जिसने अपने जीवन भर सिर्फ़ देश की उन्नति को ही सर्वोपरि रखा।”
जब उनकी मृत्यु हुई, तब उनके cupbourd से एक स्लिप निकली जिस पर लिखा था-
“miles to go before I sleep.

सन्दर्भ: 

1.Gandhi- ऑस्कर विजित फ़िल्म-रिचर्ड एटनबरो
2.bbc documentary on partition of india
3.प्रधानमंत्री- ABP न्यूज़ सिरीज़
4.PAX INDICA- शशि थरूर
5.MAKERS OF MODERN INDIA- रामचंद्र गुहा
6.PAX INDICA- शशि थरूर
7. इंदर महरोत्रा- नेहरू की जीवनी के लेखक और पत्रकार

अगम जैन

अगम जैनलेखक भारतीय पुलिस सेवा में चयनित है. मूलतः उदयपुर, राजस्थान से है  फिलहाल मसूरी में ट्रेनिंग अकादमी में हैं. व्यवस्था और समाज दोनों में इनकी नज़र बहुत गहराई तक जाती है और इसी को वो अपने लेखों में बहुत संवेदना के साथ परोसते हैं.

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3 Comments on “सलाम नेहरु

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