ग्लोबल गुमटी

झारखण्ड

आज एक सपना जन्मा था झारखंड के रूप में…

जोहार।

आज 15 नवंबर है।आज से 16 साल पहले ठीक आज ही के दिन करीब 11 बजे अपने सेंट जेवियर्स कॉलेज, राँची में इतिहास की कक्षा में बैठा था कि अचनाक मांदर और ढोल की थाप कान मे पड़ी। हम सब निकल के बाहर आये तो देखा प्रांगण मे छात्र-छात्रा नाच रहे हैं।पता चला इतिहास बन चुका है। नया राज्य झारखंड बन चुका था। “आबुआ दिशुम,आबुआ राज” का सपना पुरा हो चुका था। सर उठा के देखा तो आसमान में आश्चर्यजनक रूप से एक इंद्रधनुष बन गया था। नीचे अबीर उड़ रहे थे। मेरे जैसे लड़कों के लिए वो अजीब भावुकता वाले उलझन का क्षण था। सुबह जिस कक्षा मे एक बिहारी के रूप मे घुसा था,अब बाहर आया तो मै झारखंडी हो चुका था। एक आँख बिहार के विरह में भीगी थी, दुसरी में झारखंड के लिए खुशी का पानी था। कभी नाचता कभी बैठ जाता। फिर खुद को समझाया,कि क्या बिहार और क्या झारखंड। ये बँटवारा नही,बस सुविधाओ के वितरण का नाम है। अपने अंदर के हिन्दुस्तान को जगाया और अबीर उड़ाने लगा।

हर नया राज्य एक सपने के साथ निर्मित होता है और उसी को जीता है। झारखंड के निर्माण के पीछे भी तिलका माँझी, सिद्धो-कान्हु,चाँद-भैरव, झुनी-फूलो, बिरसा, तेलंग खड़िया, शेख भिखारी, पांडेय गणपत राय और नीलाम्बर-पीताम्बर जैसे कई दीवानों का सपना था। सपना था कि सदियों से हाशिये पर नंगे भुखे रहे आदिवासियो का उत्थान हो, हर झारखंडी की उन्नति हो। ये काम सिर्फ आदिवासियो के लिए आदिवासियो के द्वारा नही होना था, इसमे एक-एक झारखंडी का सपना, उसका खून, उसका पसीना शामिल था जो इस धरती पर जन्मे और इसी मे मिल जाने वाले थे। झारखंड को प्रकृति ने छप्पर फाड़ के उपहार दिया, दामन खनिजो से भरा, आँचल में नदी भरे, मस्तक पर पहाड़ गाड़े और छाती पर भरपूर जंगल उगाये। हमे बस अपना काम करना था और इन उपहारों का सही उपयोग और वितरण करना था।

आज 16 साल बाद उस झारखंड को देख रहा हुँ। सपने अब भी सिरहाने पड़े हैं। दोगली राजनीति ने एक अखंड झारखंड मेँ दो झारखंड गढ़ दिये, एक आदिवासियों का झारखंड दुसरा गैरआदिवासियों का झारखंड। बाँटना राजनीति का सबसे सबसे कारगर फार्मुला है और इसे यहाँ खुब भुनाया गया। एक ही जमीन पर जन्मे पर जन्मे भाईयोँ को दो वर्गो मे बाँटा गया।करना तो ये था कि पेट भरे झारखंडियोँ के हाथ हाशिये पर खड़े झारखंडियोँ का हाथ पकड़ उन्हे अपने साथ लाना था पर दोनो के हाथ बँटवारे की लाठी थमा दी गईँ। राज को किसने नही लुटा? क्या सोरेन, क्या मुंडा, क्या कोड़ा, क्या मरांडी, क्या पांडे, क्या दुबे, क्या यादव, क्या सिँह, क्या सिन्हा, क्या महतो और क्या दास..ऊपर बैठे लोगोँ मेँ कोई बँटवारा नही रहा,सारा फसाद गाँव देहात मेँ सदियोँ से साथ रह रहे घुलमिल गये संस्कृति और समाज के बीच बोया गया। इस राज मे केंद्र से चमचमाती योजनाएँ उल्का पिंड की तरह आती जो जमीन तक आते आते भस्म हो जाती और ये भभूत नेता और बड़े बाबुओं के ललाट चमकता। दुसरी तरफ हरे भरे झारखंड को कब लाल दाग लग गया पता न चला। लगभग 18 जिले लाल चादर की लपेट मे है जहाँ जंगलों में पीपल पलाश और सखुआ महुआ की जगह बंदुक और कारतूस उग आये हैं। जंगल में कोयल नही कूहुकती, दहशत बोलता है। कानून दुबका है और बंदुक न्याय करती है।

धरती के नीचे प्रचुर संसाधन है और ऊपर बेरोजगारी, अशिक्षा, बीमारी, कुपोषण, अराजकता और पलायन है।आप अभी आईए संथाल परगना के किसी गाँव, सैकड़ो की संख्या मे रोज मोटरी गदेड़ी बाँध आदिवासीयों का जत्था पशुओं की तरह बस में ऊपर नीचे लद के धनकटनी के बंगाल जा रहा है कमाने। वापसी मे लायेगा बोरी भर चावल, 400 रूपया, एक चाईना मोबाईल और एक जोड़ी कपड़ा। और उन आदिवासी बहनों का मत पूछियेगा जो लेके आती हैं शारिरिक यातनाओ का एक सिसकता बीता हुआ कल और पेट में एक और आने वाला भुखा नंगा झारखंडी। खटिया पर लेटा जाता बीमार और डॉक्टर के अभाव में उसी खटिया पर लाश बन के लौटता झारखंडी बता देगा कि आज झारखंड कहाँ है। आज का अख़बार तो ऐसा लिखता है जैसे सपने से भी ज्यादा हसीन झारखण्ड गढ़ा जा चुका है, पर अगर किसी भी सच को देखना हो तो 16 पन्ने के अख़बार को पलटने से निकल गाँव की पगडंडी पर आईये। वहां से पढ़िए झारखण्ड को। स्कूलो मे नंगे बदन मिड डे मील के लिए लाईन लगे थरिया बजाते बच्चे झारखंड की शिक्षा व्यवस्था का सच है। सरकारी योजनाओं ने समाधान को कम बिचौलियों को ज्यादा जन्म दिया। डिजिटल इंडिया के नारों के बीच गाँव का गाँव कागज पत्तर के जाल मेँ उलझा है, हर भोले झारखंडी के पीछे एक दलाल लगा है उसे नोचने के लिए। किसी का जॉब कार्ड गिरवी है तो किसी का पासबुक बंधक।

इन सब के बीच एक झारखंड महेंद्र धोनी और दीपीका कुमारी का भी है। सारी विसंगतियों के बीच भी जंगल के वनफूल की गमक फैल भी रही है। राज्य की प्रतिभाएँ सारी सीमा तोड़ आगे बढ़ने को संघर्ष कर रही हैँ।सिविल सेवा से लेकर मल्टी नेशनल कंपनी तक का सफर करने वाले झारखंडी कम नहीं हैं। पर इतना कुछ काफी नही है।आज बिरसा के मूर्तियों को गर्दन से आँख तक मालाओं से ढक दिया जायेगा। पर बिरसा के सपनों को नही ढक पाएंगे ये नेता। ये सपना अभी अधुरा है।

मैं खुद संथाल परगना की धरती पे जन्मा हुँ। मैं किसी बड़े विश्वविद्यालय में बैठा कोई आदिवासी चिंतक या शोधार्थी नही बल्कि इस संस्कृति का हिस्सा हुँ। मैंने यहाँ के लोगों के जीवन-समाज का तानाबाना देखा है, मैं इसी धागे से गुँथा और बुना हुँ। इसके रंग को जिया है। इनकी समस्याओ को भी नंगी आँखों से देखा है, उसको महसुस किया है। मेरे अंदर मांदर की थाप है तो दुसरी तरफ एक नये झारखंड के निर्माण की छटपटाहट भी। अभी बहुत काम बाकी है और उम्मीद भी कि ये सब पुरा हो। झारखंड की स्थापना के बाद मैने एक कैसेट रिलिज किया था और उसी में  एक गीत लिख के गाया था

“15 नवंबर के बिहनवा हो, झारखंड निर्माण हो गईल। पुरा भईल बिरसा के सपनवा हो,झारखंड निर्माण हो गईल।।अब ना सुनब लालू के भषनवा हो,अब ना लेब केकरो एहसनवा हो,झारखंड निर्माण हो गईल।”।

मेरा झारखंड अभी बनना बाकि है। साढ़े तीन अक्षर के सदाबहार शब्द “उम्मीद” के साथ 15 नवंबर की शुभकामना। बाकी तो आज मांदर पीट नाचने का दिन है ही, क्या जनता, क्या नेता….ढोल पीटना किसे अच्छा नहीं लगता। रांची में भी उत्सव है, लाखों लाख बेसुध पड़े झारखंडियों का गीत गाने सुनिधि चौहान आयीं हैं सरकार के बुलावे पर। जय बिरसा। जय हो।

नीलोत्पल मृणाल

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