ग्लोबल गुमटी

हरमिंदर सिंह मिंटू

हरमिंदर सिंह मिंटू की गिरफ्तारी

भारत की आजादी के पूर्व मुस्लिम लीग ने एक स्वतंत्र इस्लामिक राष्ट्र पाकिस्तान की मांग की। आजदी के बाद सिक्खों ने भी खालिस्तान नामक एक अलग राष्ट्र की मांग छेड़ दी। उनका तर्क यह था कि जैसे हिंदुस्तान हिंदुओं के लिए रह जाएगा, पाकिस्तान मुसलमानों का हो जाएगा; वैसे ही सिखों के लिए खालिस्तान का होना जरुरी है। और यहीं से जन्म हुआ खालिस्तान आंदोलन का।
नेहरु जी ने खालिस्तान की मांग तो नहीं मानी किंतु उन्होंने सिक्खों को भारत में एक अर्ध-स्वायत्त राज्य देने का वादा किया। आजादी के पश्चात पाकिस्तान से ज्यादातर सिक्ख भारत आ गए और धर्म के आधार पर किसी राज्य के निर्माण के दूरगामी खतरे को भांपकर सिखों की भावनाओं को तुष्ट करते हुए भी भविष्य में किसी अन्य सांप्रदायिक विभाजन को टालने के उपाय के रूप में  भाषाई आधार पर भारत में एक अलग राज्य पंजाब का निर्माण किया गया।

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इसके पश्चात पंजाब की राजनीतिक पार्टी अकाली दल ने जल विवाद का हवाला देते हुए पंजाब राज्य के पूर्ण स्वायत्तता की मांग की। ज्ञात हो कि इस पार्टी के कुछ सदस्य अलग राष्ट्र की मांग पर अब भी तुले हुए थे। इसके लिए उन्हें ब्रिटेन, अमेरिका और कनाडा में रहने वाले प्रवासी सिक्खों का भरपूर समर्थन भी मिल रहा था।
धार्मिक सिख गुरु जरनैल सिंह भिंडरावाले के गिरफ्तारी के पश्चात अलग खालिस्तान आन्दोलन ने और तूल पकड़ा। हलाकि स्वयं भिंडरावाले अलग राष्ट्र का समर्थन तो नहीं करते थे किंतु उनके ज्यादातर समर्थक अलग राष्ट्र का निर्माण चाहते थे। इंदिरा जी की सरकार ने भिंडरावाला व उनके सहयोगियों को स्वर्ण मंदिर से निकालने के लिए ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया जिसके परिणाम आगे चलकर बहुत ही घातक सिद्ध हुए। इंदिरा जी की हत्या कर दी गई और खालिस्तान की मांग ने और उग्र और रूप धर लिया। इस दौरान भारत व भारत के बाहर कई खालिस्तानी आतंकवादी संगठनों का जन्म हुआ जिनमें खालिस्तान कमांडो फोर्स , द ऑल इंडिया सिक्ख स्टूडेंट्स फेडरेशन और बब्बर खालसा प्रमुख थे।
आगे चलकर सन 1986 में ऐसे ही एक संगठन खालिस्तान लिबरेशन फोर्स का जन्म हुआ। वर्तमान में इस संगठन को हरमिंदर सिंह मिंटू संचालित कर रहा है। पिछले कई वर्षों में इस संगठन को पंजाब में कई आतंकवादी घटनाओं के लिए जिम्मेदार पाया गया है।
नवंबर 2014 को 45 वर्षीय मिंटू को पंजाब पुलिस ने इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा से गिरफ्तार किया था जब वह थाईलैंड से लौट रहा था। उस समय उसके ऊपर डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम की हत्या के प्रयास, तीन शिव सेना कार्यकर्ताओं की हत्या और आतंकवादी घटनाओं के 10 अन्य आरोप थे। आई एस आई की सहायता से इसने पंजाब में स्वतंत्रा दिवस समारोह के दौरान हमले की योजना भी बनाई थी जो कि सफल नहीं हुआ।

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मिंटू थाईलैंड से ही अपने संगठन का संचालन करता था। इसके लिए वह अत्याधुनिक तकनीक का प्रयोग करता था। साथ ही युवाओं को जोड़ने के लिए वह इन्टरनेट का प्रयोग करता था। मिंटू एक फर्जी पासपोर्ट के माध्यम से अपनी पहचान छुपा कर पूरे यूरोप, पूर्व एशिया व पकिस्तान में यात्राएं करता था और चंदा इकठ्ठा करता था।
नवम्बर 2014 में पकडे जाने के बाद हरमिंदर को जेल में बंद कर दिया गया था। कल रात 27 नवम्बर 2016 को मिंटू अपने कुछ साथियों के साथ जेल से फरार हो गया। हालांकि 24 घंटे के भीतर मिंटू को पुलिस ने पुनः पकड़ लिया है। ख़बरों के अनुसार जब मिंटू को दिल्ली के निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार किया गया, वह गोवा भागने की फिराक में था। अपनी पहचान छुपाने के लिए उसने अपनी दाढ़ी भी छोटी करा ली थी।

हरमीत मिंटू

हाल के दिनों में पंजाब के युवाओं में ड्रग्स सेवन की बढ़ती प्रवृति और रचनात्मक कार्यों में घटती सामाजिक रुचि समाज के साथ साथ सुरक्षा की दृष्टी से भी चिंताजनक है। कभी साहित्यकारों, कवियों, संगीतकारों की उर्वर भूमि रही पंजाब की भूमि की नयी पीढी अमृता प्रीतम, कृष्णा सोबती, साहिर लुधियानवी, गुलजार, जगजीत सिंह जैसी रचनात्मक शख्शियतें देने में नाकाम रही है। इस नयी पीढ़ी के आदर्श अपने गानों में शराब, ड्रग्स, महंगी कारों, बुलेट और बंदूकों का बखान करने वाले रैप गायक हैं। जमीन से आ रही आर्थिक समृद्धि और विदेशों से आ रहे धन ने इस लहर को और नकारात्मक बढ़ावा दिया है। दीगर बात है कि हरित क्रान्ति के कारण कृषि उत्पादन में आये उछाल से आर्थिक रूप से  नए नए समृद्ध हुए पंजाब में भी लगभग ऐसी ही स्थिति थी जिसने खालिस्तान की उग्रवादी विचारधारा को युवाओं के बीच पैर पसारने का मुफीद मौक़ा दिया था। कई सुरक्षा एजेंसियों और विश्लेषकों ने इस बात को बार बार दोहराया है कि पंजाब के युवा एक बार फिर से अलग खालिस्तान और इसके अतिवादी आन्दोलन की तरफ बड़े पैमाने पर आकर्षित हो रहे हैं। इसलिए इस बार पंजाब के चुनावों में ड्रग्स सबसे बड़ा मुद्दा है और समय की मांग है इसे सिर्फ चुनाव ही नहीं बल्कि समाज की सामूहिक संवेदना और चिंता का मुद्दा भी बनाना पड़ेगा।

Manasमानस 

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