ग्लोबल गुमटी

खिड़की के पार एक गुड़िया

खिड़की के पार एक गुड़िया

खिड़की – बचपन में मैं हमेशा खिड़की पर बैठी एक लड़की को देखती थी, गुड़िया जैसी, एक जगह बैठे, वह हिल नहीं सकती थी, कमर के नीचे लकवा लग गया था पर यह मुझे नहीं पता था, मुझे दिखती थी वो खिड़की से बाहर ताकते उदास आँखों के साथ। मुझे लगता था जिसे स्कूल नहीं जाना होता हो वह उदास कैसे हो सकता है।मुझे बस वो एक गुड़िया लगती, बोलने वाली गुड़िया। बड़ी बड़ी आँखें और छोटा सा चेहरा , वह आँखें बड़ी करके आने जाने वालों को देखती, पता नहीं मेरा यह भ्रम था कि सच मुझे लगता था कि स्कूल बस देखकर उसकी आँखें चमक जाती थी.
एक दिन मैं घर से बिना बताये दूध पिये बस स्टैंड चली गयी, दूध से नफरत थी मुझे, मेरे पापा सिर्फ मुझे शर्मिंदा करने के लिये वो दूध का गिलास लेकर बस स्टैंड आ गए, मैंने दूध पिया और सब हंस रहे थे. उस वक़्त सिर्फ मैंने खिड़की के उस पार बैठी गुड़िया की आँखों में देखा, मुझे लगा वो मुस्कुरायी थी, सिर्फ यही सोच कर मुझे अच्छा लगा. आते जाते ,मैंने हमेशा उसे देखा और हर दिन चाहा कि उसके जैसा हो जून, उसके जैसा जिसे होमवर्क नहीं करना पड़ता हो, उसके जैसा जिसे दूध नहीं पीना होता हो बस स्टैंड पे, उसके जैसा जिसे रिपोर्ट कार्ड पर पापा की साइन नहीं लेनी होती हो और उसके जैसा जिसे जूते पोलिश करने से भूल जाने पर चाक नहीं घिसना पड़ता हो.
मैंने सालों उसे देखा, एक दिन वो वहाँ नहीं थी। खिड़की पर बैठी मेरी गुड़िया।हिम्मत ही नहीं हुई पूछने कि वो कहाँ गयी। सोचा वो गुड़िया यहाँ की तो थी नहीं वो हम जैसे स्कूल नहीं जाती थी, उसके कोई दोस्त भी नहीं थे, वह अपनी बड़ी बड़ी आँखों से बस स्टैंड पर बच्चों को देखती थी और मैं उसे। वह कभी बड़ी भी नहीं होती थी,वैसा ही छोटा चेहरा और वही बड़ी बड़ी आँखें . इर एक दिन वो खिड़की पर नहीं दिखाई, फिर कितने ही दिन वो खिड़की पर नहीं दिखी और यूँ ही हमने स्कूल भी ख़त्म कर लिया पर वो खिड़की पर कभी नहीं दिखी.
वजह, जवाब, लॉजिक इन सब से आँखें मूँद कर खिड़की पर खड़े होना कितना सुकून देता है………कभी आजमा कर देखा है।मैं आज भी हर खिड़की पर उसे ढूंढती हूँ, मैं आज भी वह बात नहीं सुनना चाहती जो शायद मुझे पता है।

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