ग्लोबल गुमटी

क्योकि पुराने कलकत्ता को पता है कि

कोलकाता के रास्ते कलकत्ता की ओर

कोलकाता (kolkata)– जिसको हमारे बचपन ने कलकत्ता के नाम से जाना है| पहली बार जाना हुआ वहां| एयरपोर्ट से निकलकर वो पीली टैक्सियाँ जो कलकत्ता की ट्रेडमार्क पहचान हैं| और आगे जाने पर दिखती हैं गगनचुम्बी इमारतें|, विश्व के सुप्रसिद्ध ब्रांड्स के जगमगाते लोगोज से अटे पड़े मॉल और बीच में सकुचाते हुए, सांस लेने की कोशिश करते हुए विक्टोरियन आर्किटेक्चर की इमारतें| नया कोलकाता पुराने कलकत्ता से हाथ छुडाने की भरसक कोशिश तो कर रहा है पर अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत के साथ पुराने कलकत्ता को पता है कि उसका अस्तित्व पानी में नमक की तरह मिला हुआ है, जो दिखता तो नहीं पर एहसास जरूर दिलाता है

|कोलकाता

 

पार्क स्ट्रीट –एक अलग ताजगी, स्वछंदता की महक के साथ| आज तो इसे फास्ट फ़ूड कल्चर की फ्रेंचाइजियों ने हथिया लिया है, पर वही कहीं किसी कोने में कॉफ़ी हाउस में कॉफ़ी और सिगरेट के धुओं के बीच डेरोजियो के ‘यंग बंगालीज’ ने क्रान्ति लाने की बात की होगी| फुसफुसाहटों के बीच सूर्य सेन की बहादुरी पर दो-तीन कॉफियां और पी गयी होंगी, और शायद इसी गली में वो सारा साहित्य मिलता होगा जिसे अंग्रेजों नेप्रतिबंधित किया होगा|

कोलकाता की इसी आबोहवा में कहीं किसी कोने में शान्तिनिकेतन से ग्रेजुएट और शरतचंद्र पढने वाली चोखेर बाली  तैयार हो रही होगी एक रॉ से रूप में| पूजा की तैयारी चल रही थी| लोग खरीदारी कर रहे थे, गाहे बगाहे हमें मूर्तियाँ भी जाती हुई दिखी थीं| वो मूर्तियाँ जो एक-दो दिन के बाद देवी बन जायेंगी और पूरा कलकत्ता जश्न में, खुशी में नहा उठेगा| त्यौहार हमारे जीवन में कितने महत्वपूर्ण हैं, देश के किसी भी क्षेत्र में, हमारी रूटीन जिन्दगी से कुछ पलों के लिए भाग जाने का त्योहारों से बड़ा कोई माध्यम नहीं|

कोलकाता

कलकत्ता – सिटी ऑफ ज्वॉय! पर सवाल यह है कि ‘ज्वॉय’ की परिभाषा क्या हो! क्या कोई शहर आपको ज्वॉय देता है, या उस शहर में किसी का साथ? क्या ज्वॉय बंगाल की मिष्टी दोई में है या किसी के साथ शेयर करने में| अगर बांटने में ज्वॉय का उच्चतम स्वरुप है तो फिर कभी-कभी अधिकार या हक़ क्यूँ ज्वॉय देता है|

दुर्गा पूजा जो बंगाल की सबसे विशीष्ट पहचान है, इसमें देवियों की प्रतिमा स्थापित होती है| श्वेत, सौम्य, शक्ति का केंद्र, माँ सी ममता, आराध्या, पूज्या, पूरे बंगाल को उत्सव और ज्वॉय के रंग में रंग देने वाली| उस प्रतिमा की मिट्टी में वेश्याओं के आँगन की मिट्टी डाली जाती है|

कोलकाता

किम्वदंती ये है कि वेश्या के घर में घुसने से पहले उस आँगन की मिट्टी में मनुष्य अपने सारे पुण्य छोड़कर अन्दर जाता है| अजीब विरोधाभास है ये, पवित्र मिट्टी तथाकथित सबसे निकृष्ट जगह से| और आश्चर्य की बात यह है कि रेनेसांस की भूमि, सामाजिक सुधारों का थियेटर, मार्क्सवाद के प्याले और रोबिन्दो संगीत की लहरियों के बीच भी यह प्रथा आज भी वैसी ही है| पर क्या समाज में वेश्या का होना मनुष्य में सेक्स की भूख की सबसे बड़ी परिणति नहीं है? और क्या अगर हम उसे निकृष्ट मानें, गंदा, मानें तो भी सेक्स उतना ही बड़ा सच नहीं है समाज का जितनी पूजा की मूर्तियाँ? यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में, गलियों में, चौराहों में, हुगली के किनारे बैठकर हर जेनेरेशन के ग्रूप्स ने सेक्स को डिस्कस किया है साहित्य में, फिल्मों में, मॉडर्निटी में, आजादी में पर फिर भी उस जगह की मिट्टी के बिना मिट्टी की मूर्ति, मूर्ति से देवी तक का सफ़र नहीं कर पाती|

कोलकाता

कलकत्ता या फिर कोलकाता के बारे में फिर लिखूंगी किसी नयी विचारधारा में, नए आउटलुक से| वैसे जाते जाते बता दूं कि साल्ट लेक सिटी से धोखा मत खाइएगा , यहाँ कोई साल्ट लेक है ही नहीं

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