ग्लोबल गुमटी

क्या आज की शादी में भी कुंडली मिलान जरूरी है ?!

कुंडली मिलान की औचित्यता पर सवाल

कुंडली मिलान समय की रफ्तार के साथ धीरे- धीरे मंद पड़ने लगा है ! वक्त का तकाजा भी है कि बरसों से उपजे प्रेम को सिर्फ एक झटके में तोड़ कर खाक बना देने की क्षमता रखने वाले इस पुरातनपंथी पंरपरा को समाज अब उन्मुक्त होकर तार्किक आधार पर इसे त्यागने की मानसिक स्थिति में पहुंचे ! हम अभी जिस दौर से गुजर रहे है वह एक संक्रमण काल है ,जिसमें पुरातन परंपराओं को अर्वाचीन तकनीकी युग के तर्को से कड़ी टक्कर मिल रही है ! जरुरत इस बात की है कि हम जब भी विवाह से संबधित कोई फैसला ले तो उनमें एक संतुललिता का पुट होना चाहिए , सिर्फ इस कसौटी पर कि कुंडली में दोष होने से यह शादी नहीं होनी चाहिए ,एक समाज व परिवार को पुरातन राह पर धकेलने के समान है ! यह दुख तब और बढ़ जाता है जब बड़े- बड़े आईकानिक चेहरे व समाज के प्रबुद्ध लोग भी हमारे सामने एेसी गलतियां करते जाते है !

कुंडली मिलान निश्चित रुप से हर परिवार का निजी मामला है, लेकिन वही परिवार जो बचपन से अपने बच्चों को हर खुशियां देने के लिए कृतसंकल्पित रहता है, जब वही बच्चे अपनी पसंद के जीवनसाथी चुनते है तो परिवार उनपर कुंडली रुपी ग्रहण लगा देते है. होना तो यह चाहिए कि अगर रिश्ते बनाने वाले दोनों परिवारों में सही तालमेल हो तथा लड़के व लड़की की आपसी रजामंदी हो तो विवाह से पूर्व कुंडली मिलान को नजरअंदाज कर देना चाहिए. ऐसे दो दोस्त जो बरसों से एकदूसरे को बखूबी जानते है, उनका आपसी सामंजस्य उत्तम हो, वो अगर जीवनसाथी बनने का फैसला करते है तो ऐसे में कुंडली मिलान की व्यर्थ क्रिया से बचा जाना चाहिए. कुंडली बनाने में हुई त्रुटी, कुंडली मिलाने में हुई त्रुटी का दंश आखिर समाज कब तक झेलेगा? अगर यह मान लें कि कुंडली मिलान ही किसी परिवार की प्रथम प्राथमिकता है तो क्या वे अपने बच्चों का विवाह उस परिवार या उन बच्चों से करने के लिए राजी होगें जिनमें न तो कोई तालमेल हो और न ही पसंद की गुजांईश हो जबकि वहां कुंडली में गणना माकूल हो? हमारे परिचय के एक लोग है जिनका विवाह पूर्व कुंडली मिलान में कोई दोष नहीं था यथा- नाड़ी दोष, मंगल दोष, कालसर्प दोष आदि तथा ज्योतिष के अनुसार ३४ गुण गणना बना था, लेकिन शादी के बाद न तो कभी उनमें तालमेल हो पाया न ही एक अच्छा दांपत्य जीवन, आखिरकार उन्हें अलग रहने के लिए मजबूर होना पड़ा. और ऐसी घटनाओं के लिए ज्योतिषी बता देंगें की उस ज्योतिषी के कुंडली मिलान में त्रुटी रही होगी.

एक ऐसे दौर में जन्मे व पले-बढ़े बच्चे पर जिसने बचपन से ही विज्ञान को गले लगाया हो व तर्क की कसौटी पर हर चीज को परखा हो, उसके ही फैसलों पर जब परिवार कुंडली मिलान रुपी पंरपरागत परंपरायें थोपती है तो उसका तिलमिलाना स्वभाविक है. प्रेम करने के लिए जब जाति, धर्म, रंग नहीं देखा जाता तो फिर इसे आगे बढ़ाने में कुंडली रुपी रोड़ा कहां से आ जाता है ?

आज कुंडली मिलान की औचित्यता पर ही गहरे सवाल उठ रहे है. हम स्वयं द्वारा जानी परखी एवं दिखाई दे रही चीजों से मुंह छिपाकर कबतक इन कल्पनीय अंकों के भ्रम में अपने भावी गहरे रिश्तों को तिलांजली देते रहेंगें? यह एक सच्चाई है कि एक ही कुंडली मिलान हेतु अगर हम दस ज्योतिषों या पंडितों के पास जाए तो सब का परिणाम चौकाने वाला होगा. अगर इन दस में से दो- तीन भी एक बता दें तो धन्य समझिए. ऐसे में पूरे समाज को तार्किक दृष्टिकोण अपनाते हुए कुंडली मिलान की ऊहापोह में फसने से बचते हुए अपने सोच, विचार, तालमेल एवं वास्तविकता को यर्थाथता में परिणत करते हुए समाज को एक रचनात्मक दिशा में ले जानी चाहिए ।

 

प्रभाष मिश्रा

लेखक साहित्यिक सांस्कृतिक मंचो पर बहुत सक्रियता के साथ कार्यशील हैं

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