ग्लोबल गुमटी

लल्लनटॉप

क्यूंकि ये मज़ाक फूहड़ है लल्लनटॉप नहीं…

एक फूहड़ और निहायत घटिया लेख, ना चुटकुला ना कोई व्यंग्य.

आप इन्हें देखकर कंफ्यूज हो जाते हैं कि यह परिवार है या छोटा-मोटा अनाथालय

जहाँ माँ दूध पिलाती है, पिता टहलाता है, दादी गोद में झूला झूलाती है और दादा लोरी सुनाते हैं वहाँ अनाथालय की कल्पना आला दर्जे की बेवकूफी और फूहड़ता नहीं तो और क्या! अब ज़रा अनाथालय को समझिये आप, जहाँ आपके द्वारा वर्णित सारे सुख नहीं मिल पाते वे होते हैं अनाथालय. उस पर तुर्रा यह कि ‘यहाँ आहत किया जाता है’. जी यहाँ बिलकुल आहत नहीं किया जाता है. यहाँ बिहारियों के IAS होने का उदाहरण नहीं दिया जाएगा पर आप जैसे अति सिविलाईज़्ड और प्रिविलेज़्ड क्लास लोगों की तरह मेनरिज़्म पर चुटकुलानुमा आलेख लिखकर दांत भी नहीं निपोरे जाएंगे. आपकी ‘खुद’ के पैसे से की गई हवाई यात्रा वर्णन के क्रम में मेरी पहली हवाई यात्रा- 

पहली हवाई यात्रा को लेकर बेशक आपकी ही तरह का उत्साह था मुझमें भी लेकिन टिकट का खर्च सरकारी था, माने मेरे पिता जो एक मामूली सरकारी मुलाज़िम हैं को मिली एलटीसी के ज़रिए. आपके द्वारा वर्णित ‘अनाथालय’ सरीखा भरा-पूरा परिवार है. एयरपोर्ट से लेकर वायुयान तक हर चीज़ अनोखी और हाई क्लास लग रही थी तो कुछ पूछने में भी संकोच होता था. वॉशरूम कहाँ है जैसा सवाल भी पूछा और अगर आप यकीन करें तो हम जैसे डाउन मार्केट लोग जिन्हें बार-बार पेशाब आता है लू में जाकर फ्लश बटन दबाने के शौकीन नहीं है. तिस पर फ्लाइट में मिला खाना भी हमारे लिए आकर्षण बन गया था. मेरी मां जो भी खा पाने में असमर्थ थी मेरी प्लेट में सरका देती थी और मैं भी सभ्य होने की कवायद करते हुए उन्हें रोकती कि यह घर नहीं है माँ फ्लाइट है जो बच रहा है बच जाने दो.

एक और प्यारा किस्सा बताती हूँ आपको. अनभिज्ञता मज़ाक उड़ाने की चीज़ नहीं. मेट्रो स्टेशन पर करीब 60-65 वर्षीय अम्मा सबको अपना वॉलेट लगाकर एंट्री करते हुए देखकर मुझसे पूछती हैं बेटा ये मशीन बटुए में से पैसे खींच लेती है क्या? उस मासूमियत का फेसबुक पर मज़ाक उड़ाने जैसा भोंडा ख़याल मुझे नहीं आया.

ट्रेन में भी मेरी समझ से आपको यह अख्तियार नहीं है कि आप सहयात्री को उठा कर बाहर फेंक दें.

अब अगर उस तस्वीर की बात करें, जहाँ इस सस्ते चुटकुलेनुमा लेख (व्यंग्य तो नहीं कहा जा सकता इसे) को जेनरेलाइज़्ड भाषा में लिखा गया, उसे  ‘बिहार एयरलाइंस’ टैग लाइन से जोड़कर दर्शाया गया है. मेरा सीधा सवाल उस मसखरेपन से है जहाँ आप एक राज्य, क्षेत्र, जाति, समुदाय, धर्म के लोगों को टारगेट करते हैं. चाउमीन, चिंकी, चावल, बिहारी, बहादुर, संता-बंता, मुसल्ला, मोमो, मद्रासी कहकर मज़ाक या चुटकुला कहकर अपनी जान छुड़ा लेते हैं. ऐसे लेखों का प्रयोजन क्या है आखिर? कौन सा सुधार अपेक्षित है? अपने ‘भिन्न-भिन्न साइज़’ वाले बच्चों को घर छोड़कर आएँ? ‘बिहार एयरलाइन्स’ जैसा सस्ता और बेहूदा मज़ाक करने पर ‘भावनाएं आहत होने के डर से हटा ली गई तस्वीर’ चोरी और सीनाज़ोरी से अधिक कुछ नहीं.  ऐसी वैचारिक दरिद्रता अगर ध्यान आकर्षित करने के लिए ही परिलक्षित की जा रही है तो फिर कुछ भी कहना व्यर्थ है. वरना अपने लिखे हुए के प्रति जवाबदेही समझी जानी चाहिए, यहाँ तक कि अगर साफ़ नियत से लिखा गया था लेकिन गलत अर्थ संप्रेषित हो गया है तो स्पष्टीकरण भी अपेक्षित है.

और हाँ आखिर में यह कहना भी ज़रूरी है कि मज़ाक और व्यंग्य को समझना भी ज़रूरी है. दोनों की सीमाएँ हैं. सामाजिक विद्रूपताओं पर कटाक्ष व्यंग्य कहलाता है, जिसका मकसद समाज के नग्न यथार्थ को उघाड़ना हो, सुधार की मंशा से लिखा जाता है. मज़ाक और मखौल में भी अंतर है वरना तो लेखक होने से बेहतर सुझाव है कि कृष्णा-सुदेश की टीम में शामिल हो जाइए. नाम और शोहरत दोनों ज़्यादा मिलेगी.   

अदिति शर्मा 

One Comment on “क्यूंकि ये मज़ाक फूहड़ है लल्लनटॉप नहीं…

Leave a reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

आपकी भागीदारी