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“लालटेन”.. घर की रौशनी

“लालटेन”.. घर की रौशनी..

 

कल आधी रात कुछ समय के लिए लाईट चली गई तो बिस्तर से अंदाजन उठ हाथ  टटोल कर मोमबत्ती खोजने लगा। 5 मिनट किचन में  हाथ टटोलने के बाद एक आधी जली पिघली मोमबत्ती मिली। जैसे ही जलाने के लिए माचिस उठाया कि खयाल आया कि मैँ  दिल्ली जैसे जागरूक महानगर मेँ हूँ जहाँ मैंने जाना कि “मोमबत्ती एक राजनीतिक वस्तु है जो रात में नहीं दिन में जलाई जाती है और इससे प्रकाश नहीं, भड़ास निकलता है”। इतना मन में आते ही चुपचाप वापस जा बिस्तर में घुस गया और तब याद आने लगा मुझे अपने गाँव का “लालटेन”।

वो एक ज़माना था जब गाँव के हर घर की चौखट पर शाम एक लालटेन ज़रूर टँगा होता था। मेरे पापा अक्सर कहा करते हैं  “दरवाजे पर ये दो चीज़ें रहनी ही घर को घर बनाती हैं,  एक तो साँझ को जलता लालटेन और दूसरा दुआर की चौकी पर बैठे बुजुर्ग”। हाँ उस समय गाँव में भले बिजली नहीं थी, पर रौशनी जरूर थी। मेरे दादा जो कि सरपंच थे वो तो साँझ होते हाथ में लालटेन लिये एक बार घूम आते कि कहीं कोई समस्या तो नहीं, कोई बीमार तो नहीं .. बूढ़ापे में भी लालटेन की मीठी रौशनी में उनको समस्याएँ साफ दिखती थी  जो आज लोगों को जलते दूधिया लाईट में भी धुँधली दिखती हैं । वापस फिर देहरी पर बिछी चटाई पर आ के लालटेन रख देते थे जहां गाँव के कुछ बुजुर्ग जवान आधी रात तक ताश खेलते थे। लालटेन की धीमी ऊँची होती रोशनी में भले ताश का पत्ता साफ दिखे ना दिखे पर लोगों का आपस में स्नेह, घुलना-मिलना और साफ दिल साफ-साफ दिखता था।

रात को सोने के वक्त लोग खटिया के नीचे लालटेन ज़रूर रख सोते थे। केवल रात को खटिया के नीचे लालटेन का होना NSG कमांडो की सुरक्षा वाला विश्वास देता था। मन में लगता था कि रात-बिरात कोई बात हो जाए तो लालटेन है न, मान लो कहीं  कुछ खरखर की आवाज सुन ली, कहीं कुछ धड़ाम की आवाज सुन ली, कहीं गाय रंभाने की आवाज सुन ली, कहीं  लगा कि कुछ गड़बड़ है तो फटाक उठे और लालटेन तेज कर लाठी उठाया और इलाका चेक कर आये। लालटेन हाथ में हो तो बड़ी हिम्मत रहती थी। मतलब लालटेन रौशनी और भरोसा दोनों देता था।

आज गाँव-गाँव लाईट है, बिजली है पर रौशनी नहीं। मुझे याद है कि हम शाम होते लालटेन जला पढ़ने बिठा दिये जाते थे। सूरज के ढलते जैसे हम नानी को लालटेन का शीशा पोछ के बाती डाल के लालटेन जलाने की तैयारी करते देखते हमें लगता जैसे कसाई याकूब मेमन के फाँसी की तैयारी कर रहा है। सात बजे मास्टर साब आते, वो खुद बाती का वोल्टेज बढ़ाते और हमें बीजगणीत बनाने देते। लालटेन के आसपास कई कीड़े-मकोड़े आ के फड़फड़ाते और खुद जलती लौ की मुहब्बत पर कुर्बान भी हो जाते। मास्टर साब उन कीड़ों के पार्थिव शरीर दिखाते हुए कहते “चलो जल्दी बनाओ रे हिसाब, बैठ के कौपी क्या ताकता है, मुरख कलम से कान खोद रहा है। जान लो अगर फेर गलत हिसाब बनाया तो ई कीड़वा जैसा फड़फड़वा के मारेंगे”। हम किसी तरह सही गलत हिसाब बनाते और मास्टर साब हमारा रोज हिसाब लगाते। हमें याद है कि, सातवीं के छात्र के रूप में लालटेन की पीली रौशनी में निर्मल कॉपी के हल्के पीले पन्नों पर जब हम गंगा नदी पर लेख लिखते थे तब “गंगा नदी” आज की तरह इतनी गंदी और राजनीतिक ना थी साहब।

अच्छा लालटेन तभी रौशनी के साथ-साथ ज़िन्दगी का प्रतीक भी था। रात के घुप्प अँधेरे में किसी सुनसान पगडंडी को पार करते जब दूर कोई लालटेन टिमटिमाती नजर आती, राहगीर जान जाता कि ओ आगे कोई गाँव है, कोई घर है। अच्छा लालटेन केवल घर ही नहीं बल्कि भूत के भी काम आता था। मेरे पापा जब भी भूत का किस्सा सुनाते तो बताते “अस्पताल के पीछे वाले पोखर के जामुन पेड़ के पीछे एक सफेद साड़ी पहने औरत लालटेन लिये खड़ी थी”। सच दुनिया के किसी भूत के पास ना तब ट्युब लाईट या सीएफल था ना अब।

अच्छा मेरे गाँव के घर अब भी जब कि चौबीस घंटे भड़भड़ाते जैनरेटर की सुविधा है, फिर भी चार लालटेन शाम को तेल भर तैयार रहता है। मैं गाँव में मुख्य घर से अलग गाय वाले गोहाल के पास खपरैल कमरे में सोता हूँ और आज भी माँ एक लालटेन जला के मेरे खटिया के पास रख देती है और तब जा खुद निश्चिन्त हो सोती है कि चलो बेटे के पास लालटेन है, रात को डर नहीं लगेगा। मेरे घर चार लालटेन का कारण ये है कि एक दो तो सदा मेरे पापा के उपयोग में आता है। वो जब भी गुस्सा होते हैं, सामने रखा लालटेन तड़ित चालक का काम करता है। मेरे पिता गुस्से में अक्सर लालटेन पटक देते हैं और इस तरह लालटेन हमेशा किसी भी दूसरी चीज को क्षतिग्रस्त होने से बचा लेता है।

अब तो गाँव में भी लालटेन लगभग लुप्त है और उसकी जगह चाइनीज़ लैंप आ गया है। इसकी सफेद रौशनी आँख को चुभती है। इसमें लालटेन वाली कोमलता नहीं। लालटेन का पीला मिट्टी वाला रंग लिये रोशनी बड़ी मीठी होती थी। ये बात अलग है कि लालटेन को भी अब घर की चौखट से उतार राजनीति का चिह्न बना चुनाव में उतार दिया गया है। अभी-अभी बिहार में लालू जी ने नितीश जी के गले में अपने दो-दो लालटेन टाँगे हैं। एक का गाल फूला और “लाल” है, दुसरे का वजन लगभग “टेन”  है। उम्मीद है कि अंधेर दिखते बिहार को थोड़ी रौशनी मिले। खैर राजनीति वाला राजनैतिक लालटेन तत्काल लालू जी का घर अंजोर किये हुए है। हमें तो अपने दुआर पर लालटेन बचाना है। इस बार सोचता हूँ कि, गाँव से एक लालटेन लेता आऊँगा। बड़े महानगरों की लाईट का कोई भरोसा नहीं ।

और आखिरी बात, कि लालटेन हमारी जड़ों और हमारी मिट्टी से इतना जुड़ा हुआ है कि देखिये न  उसमें  “मिट्टी का तेल”  जलता है। जय हो।

 

नीलोत्पल मृणाल

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