ग्लोबल गुमटी

गांधी जी को लेटर

गांधी जी को लेटर

श्रीमान गांधी जी,

आशा है आप जहाँ कहीं भी होंगे दुखी होंगे क्योंकि दुखी रहने का ठेका आपने मरने के पहले भी ले रखा था। सब 15 अगस्त 1947 का जश्न मना रहे थे और आप कलकत्ते में अपने ठेका सम्हाले हुए थे।

मेरी ज़रा आपसे कुछ शिकायतें हैं।

पहली तो है कि आपने इतना कुछ ख़ास काम तो किया नहीं लेकिन फिर भी नम्बर 1 के स्वतंत्रता सेनानी बन गए। अफ़्रीका से आकर भारत के टूर पर निकल गए। लोगों को लगा आपने ‘सबका साथ, सबका विकास’ के लिए टूर मारा है, लेकिन कोई पढ़ा लिखा व्यक्ति समझ सकता है कि इसमें आपकी घूमने की  आकांक्षा छुपी हुई थी।इंग्लैंड और अफ़्रीका तो आप घूम ही चुके थे।

फिर धोती, चरखे से बनी हुई, इसलिए पहनी कि  चरखे वाली कम्पनी (जो अंग्रेज़ चलाते रहे होंगे)  ने आपको रॉयल्टी का वादा कर रखा था। शक तो यहाँ तक है कि  विदेशी कपड़ों को जलवाने में भी अंग्रेज़ों की माचिस कम्पनी का हाथ था। लोगों के कपड़े जल गए और कुछ दिन बाद जब आंदोलन ठंडा हो गया तो लोगों ने फिर विदेशी कपड़े ख़रीद लिए- यों कपड़ा कम्पनी भी अपने फ़ायदे में पहुँचायी।

तो जब सब में स्वार्थ था तो फिर नम्बर 1 क्यों?

दूसरी शिकायत ये है कि अपने जगह बहुत घेर ली। बाक़ी नेता तो पानी का घूँट पीकर ना रह जाते होंगे जब हर शहर में एक mg (महात्मा गांधी) रोड और बापू बाज़ार मिल जाता होगा और उनके नाम पर पतली सी गली बंटी होगी। अधिकतर लाइब्रेरी आपकी स्मृति में बंटी हैं।चौराहों पर मूर्तियों में भी आप अपनी लट्ठ सहित विराजमान हैं।सरकार की अधिकतर योजनाएँ भी आपके नाम पर हैं। गंदगी हो, लोगों को रोज़गार देना हो, हरिजाओं को समाज में सम्मिलित करने का बीड़ा हो-सबमे आप ही छा जाते हो। इतिहास में आपको पढ़ो, राजनीति विज्ञान में आपको पढ़ो फिर समाज शस्त्र में भी पढ़ो। फिर मार्क्सवाद, माओवाद, लेनिनवाद काम थे जो आप एक गांधीवाद चला गए।वैसे भी, गांधी  वाद काम और गांधी-विवाद ज़्यादा लगता है।

ख़ैर, कहने का मतलब ये है कि  आप इतनी स्पेस घेर कर रखोगे तो लोगों का motivation  ख़त्म हो जाएगा। जब उन लोगों को लगता है कि उनका नाम नोट पर नहीं आ सकता और उनकी किताब ‘सत्य के प्रयोग’ से ज़्यादा नहीं बिक सकती तो वे काम करने बंद  कर देते हैं और यही देशोन्नति  में बाधक है। मतलब क्या आप समझ रहें हैं कि आप देशोन्नति में बाधक बन रहें हैं।

जैसा कि कई लोग समझने भी लगे हैं कि आप एक ब्रिटिश एजेंट थे- बात सोलह आने सही है। बहुत मज़े से रहे आप उनके राज में।इतना प्रेम था आपका उनसे कि  आप उनके राज्य से कभी बाहर गए ही नहीं सिर्फ़ गोलमेज़ सम्मेलन को छोड़कर- वो भी फिरंगियों के बीच में ही। और जैसे ही देश आज़ाद हुआ, आपको भारत में रहना नागवार गुज़रा और ‘बँटवारे की आग’ को शांत करने के नाम पर आपने पाकिस्तान भ्रमण का प्लान बना लिया। और जब ये प्लान फैल होता हुआ दिखा, आपने ही गोडसे की इवेंट मैनज्मेंट कम्पनी को स्वयं को मारने का टेंडर दे दिया। लेकिन जब गोडसे टीम 18 अगस्त, 1948 की प्रार्थना सभा में सही जगह बम नहीं गिरा पाया तो आपने उसको अकेले में बुलाकर ‘गैंगस ओफ़ वासेपुर’ की तर्ज़ पर कहा,”बेटा, तुमसे ना हो पाएगा।”

गोडसे समझता था कि आपका जीवन रावण, कंस, हिट्लर आदि से बहुत प्रभावित था इसलिए वो बोला-“बापू, दुर्योधन का, हिरण्यकश्यप का, मुसोलिनी का, सबका बदला लेगा रे तेरा गोडसे।” और इस प्रकार अंग्रेज़ों के विदा होने के कुछ समय बाद ही आप भी कट  लिए।

एक बात आपकी हॉबी को लेकर भी कहनी है।जेल जाना आपकी प्रमुख हॉबी रहा। आज़ादी के पहले तो लोगों ने ज़्यादा इस पर ध्यान नहीं दिया परंतु आज़ादी के बाद से आज तक लोग ‘जेल जाना’ अपनी हॉबी बनाए हुए हैं। संजय दत्त इसमें आपसे प्रभावित दिखते हैं। ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ का असर स्पष्ट झलकता है। सलमान खान भी जाना चाहते हैं परंतु कोर्ट अड़ंगा लगाए बैठा है। सलमान की उच्चस्तरीय वकीलों की टीम और उनकी ‘भाई’ मंडली पूरी कोशिश में है कि  उनकी हॉबी भी पूरी हो जाए।

वैसे ही उपवास करना आपकी दूसरी हॉबी रहा। आप जानते थे कि डेली खाओ तो दाल-रोटी ही मिलेगी और 2 दिन का उपवास कर लो तो जूस और बहुत से पकवान मिलेंगे। आपकी इसी हॉबी को फ़ॉलो करते हुए पता नहीं कितने नींबू  पानी/ संतरे का रस गटक जाते हैं।

मैं तो सोच रहा था कि आपकी hobbies  इतनी विचित्र हैं कि  अपने ias की परीक्षा दी होती तो इंटर्व्यू बोर्ड प्रभावित हुए बिना नहीं रहता।

ख़ैर, एक शिकायत आपके पैटेंट करने के तरीक़े से भी है।आपने चरख़ा, ‘वैष्णव जन तो तैने कहिए’,साबरमती,चश्मा-लाठी कॉम्बिनेशन, धोती,’रघुपति राघव राजा-राम’- आदि कई चीज़ें अपने नाम कर लीं हैं। मैं नेहरूजी की पीड़ा समझ सकता हूँ कि परिवार आगे उन्होंने बढ़ाया लेकिन परिवार आज ‘गांधी परिवार’ हो गया है।

अंत में, मेरी सम्वेदनाएँ आपके साथ हैं क्योंकि मैं जनता हूँ कि  कोई आपको समझ नहीं पाया।मंडेला, मार्टिन लूथर किंग, विनोबा भावे ने आपको समझने में बड़ी भूल की। लेकिन अब लोग धीरे-धीरे समझदार हो गए हैं। सत्याग्रह का दुराग्रह किसी को नहीं है और अहिंसा का तांडव और मंज़र देखने को नहीं मिलता, हिंसा से शांतिपूर्वक काम हो जाते हैं।लोग राजघाट जाना छोड़ चुके हैं। सब टाई लगाकर पूरी देशी संस्कृति के अनुसार 5 सितारा होटेल में बफ़े में भोजन जीमते हैं।

अब कोई आपकी खादी कि कम्पनी पर फ़िदा नहीं है, फ़िदा हैं तो उसपर जिसपर आपकी फ़ोटो है। सबके पर्स में अपने प्रियजनों  की फ़ोटो हो ना हो लेकिन आपकी ज़रूर होती है। पहले लोग मरते समय पर्स निकालकर अपनी पत्नी की फ़ोटो देखते थे, अब आपकी देखने लगे हैं।आपकी आपके समय में उतनी आवश्यकता नहीं थी जितनी आज आपके फ़ोटो की है।

मेरी तो यही भावना है कि  आप धरती पर ना आइएगा लेकिन अपनी फ़ोटो भिजवाते रहिएगा।

आपको समझने वाला,

इंडियास्तानी

5 Comments on “गांधी जी को लेटर

Leave a reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

आपकी भागीदारी