ग्लोबल गुमटी

डियर नानी

एक चिठ्ठी उनके नाम जिन्हें मैंने कभी देखा ही नहीं

कल मैंने नीलेश मिश्रा का एक इन्स्टाग्राम पोस्ट देखा जिसमें वो अपनी नानी को याद कर रहे थे, लाल साड़ी में उनकी नानी प्यारी लग रही थी. उस पोस्ट में नानी की कहानियाँ थीं, नमक लगे अमरुद थे, चाट बतासे थे और थी एक सुन्दर सी नानी. वो पोस्ट पढ़कर मुझे अपनी नानी की याद आ गयी, वो नानी जिन्हें मैंने कभी देखा ही नहीं.

डिअर नानी

(तुम अभी होती तो डिअर का मतलब समझाते तुम्हें खालिस जौनपुरिया भोजपुरी में )

तुम होती तो कैसी होती: कहानी सुनाने वाली प्यारी सी नानी या क्या तुम हमें बगीचे से आम चुराकर तोड़ने पर डाँटने वाली नानी होती, क्या तुम रोटी में घी चुपड़ कर ये कहती कि “घी खा नहीं तो बच्चे कैसे जनेगी” या हर बात पर “एक हमारा ज़माना था” वाली नोस्टालजिक नानी होती.

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तो डिअर नानी, इन सभी “क्या “ के जवाब मुझे कभी नहीं मिल पायेंगे क्यूँकि सच तो ये है कि मैंने तुम्हें कभी देखा ही नहीं और न ही मैंने तुम्हारी कभी कोई तस्वीर देखी है. फिर भी आज याद आती है तुम्हारी, बिना देखे, बिना सुने, बिना जाने क्या किसी की याद आ सकती है?  पर डिअर नानी, आज जो तुम्हें मैं ये चिट्ठी लिख रही हूँ तो तुम्हारी तस्वीर बनाना भी जरुरी है. सोचती हूँ कि अगर मैं माँ जैसी दिखती हूँ तो माँ तुम जैसी दिखती होगी. तो मेरे मन के पिक्चर फोल्डर में तुम दिखती हो मुझे माँ जैसी, सफ़ेद बालों के साथ, सीधे पल्ले वाली साड़ी पहने, सर पर पल्ला डाले, सिन्दूर भरी बीच से मांग निकाल कर बालों को बांधे  और  माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी .हो सकता है तुम वैसी न दिखती हो, पर मेरी कल्पना में मेरी नानी ऐसी ही दिखती है.

न तुम सिर्फ बहुत जल्दी इस दुनिया से चली गयी पर “पता है मेरी नानी कहती है” वाली मेरी कहानियाँ भी अपने साथ ले गयी. कहानियाँ – मेरी माँ के बचपन के किस्से, नदी किनारे रहने वाले उस भूत की कहानी जो खाना न खाने वाले बच्चों को पकड़ता होगा, राम सीता की वही कहानियाँ जो तुम अनेको बार दोहराती, राजा रानी के किस्से जिसमें शायद तुम हमें सीख ढूँढने बोलती, बूढ़ों वाली चिढ़चिढ़ाहट या फिर तुम्हारे हाथ का बना कुछ अच्छा सा खाना, सब कुछ तो ले गयी तुम अपने साथ.

पर कभी कभी तुम्हारी याद आ जाती है जब कोई अपनी नानी का ज़िक्र करता है या कभी बिना किसी मतलब के भी और उस याद में तुम दिखती हो माँ जैसी, लाल साड़ी पहने, सर पर पल्ला डाले, माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी.

डिअर नानी, तुम्हें फिर कभी लिखूंगी कोई और चिठ्ठी, कितना कुछ तो है तुम्हें बताने को और उस चिठ्ठी से तुम्हें ले आउंगी कुछ देर के लिये अपने पास क्यूँकी याद आती है तुम्हारी.

पूजा

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3 Comments on “एक चिठ्ठी उनके नाम जिन्हें मैंने कभी देखा ही नहीं

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