ग्लोबल गुमटी

life in a metro

लाइफ इन अ मेट्रो..

लाइफ इन अ मेट्रो..

भीड़ से भरी मेट्रो में महिला सीट पर अपना क़ब्ज़ा जमाये औरत सरीखी लड़की। कानों में इयरफोन घुसाये , दाएँ हाथ में मार्कर से कुछ अंडरलाइन करते अंग्रेज़ी शब्द और बाँए हाथ में सिल्वर पेपर में लपेटा हुआ पराँठा । दोनों पैरों पे रखा बैग और बैग पर रखे किताब के बग़ल आधा खुला टिफ़िन ।

पूरा चित्र घंटों दिमाग़ में कौंधा के क्या सच में हम इतने व्यस्त हैं कि तीनों ज़रूरी कामों को हम अलग-अलग नहीं कर पा रहे या किसी और कार्य के लिए समय बचा रहे हैं।क्या सच में हमारे पास भोजन का भी वक़्त नही?  या हम समय का सही उपयोग करना सीख गये। अगर समझदारी सच में यहाँ तक आ पहुँची है तो अगली पीढ़ियाँ कमोड पे बैठकर अध्ध्यन करेगी ।

जल्द ही हमारी तेज़ रफ़्तार वैज्ञानिक पीढ़ी नाश्ते और खाने की गोलियाँ इजाद कर लेंगीं ।  लोगों की अपनी जेब ही टिफ़िन बन जाएगी और हम अपना ब्रेकफ़ास्ट , लंच , डिनर साथ लेके घूमेंगे ।
चीज़ें इत्मीनान से करते थे ईश्वर सौ बरस की ज़िंदगी देता था अब जल्दिया गये तो साठ पे आ ठमके ।
……है न कमाल…।।

लेखक राहुल सिंह ‘शेष दिल्ली और आसपास होने वाले कवि सम्मेलनों में नियमित रूप से जाने  वालों के लिए एक जाना हुआ नाम और पहचाना हुआ चेहरा हैं| मूलत उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ से आते हैं और फिलहाल दिल्ली में एक प्राइवेट कंपनी में कार्यरत हैं|

 

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