ग्लोबल गुमटी

littilization

लिट्टीलाइजेसन

लिट्टीलाइजेसन

 

“लिट्टी-चोखा” आहा नाम सुनते ही आपके मुँह में पानी आ जाय पर मेरी तो आँखों में पानी भर आता है। मुँह तो मैं आज भी इसके लिए बाये रहता हूँ । एक अनोखी भावुकता है लिट्टी के साथ।

लिट्टी युपी बिहार का स्वादिष्ट ही नही अपितु आम साधारण लोगों का शाही फूड था ये। इसकी लोकप्रियता का कारण केवल इसका स्वाद नहीं था बल्कि इसके बनने में इसकी कम लागत, कम समय, बिना किसी बर्तन और तामझाम के बनने और गरीब, किसानों, कामगारों के पेट की आग को दिन-दिन भर बुझाये रखने की अद्भुत योग्यता से है,  जिसने इसे “जनभोजन” का दर्जा दिला दिया था। लिट्टी केवल  a  type of desi food  नहीं है  बल्कि यह एक पूरा मैकेनिज्म है जो किसानों कामगारों और साधारण आम लोगों के भूख तंत्र से जुडा है।

एक तो इसके बनने में बस आटा और सत्तु चाहिए। बस सत्तु को भी कुछ नहीं करना, उसमें तनी नमक डाला, कच्चा सरसों तेल, हरिहर मिर्चा का टुकड़ा, कच्चा लहसुन, नींबू निचोड़ा, अजवायन और तनी अँचार का मसाला, सब डाल एकदम रगड़ के मिला दिये। एकदम लहरदार चटक सत्तु मसाला तैयार। अब आटा साना सत्तु डाला और बड़का गोला बनाया और कहीं भी गोयठा कंडा की भौरी जलाई और सेंक लिया। मिल के चार लिट्टी खाई और चल दिए देश खाने वालों के यहाँ पानी पी-पी के मजदूरी करने।

जी लिट्टी विज्ञान कहता है लिट्टी खा के पानी पीते रहने से वो अंदर फूलता है और भूख नहीं लगती, पेट भरा महसुस होता है। इतना चमत्कारी और गरीबों कि संजीवनी हुआ करता था ये लिट्टी। गाँव देहात के लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा का प्रतीक था ये लिट्टी। इतना ही नहीं, भले इसे बनाने में संसाधन कम लगते हों पर जो भी संसाधन लगते थे वो बिना सब के मिले कहाँ से जुटते। केवल भोजन नहीं बल्कि लिट्टी तो खुद आग पर जल समाज को जोड़ने वाला फेवीकोल था।

बिरजु जा के अपने गोहाल से गोयठा उठा लाया, तो लखंदर आटा सान रहा है, ताजा लहसुन मिर्चा के लिये दौड़ के हरिया अपनी बाड़ी से तोड़ आया, इधर गणेशर गोला बाँध रहा है तो उधर बजरंगी आग पर हल्का हल्का सेंक रहे हैं। जब तक लिट्टी सेंक रहा है सब छिरिया के बैठे हैँ बोरा बिझाये, गाँव का किस्सा “अहो सुने कल गौरी मंडल के मुर्गा मार के कउन तो खा गया और बदमाशी देखिये कि खाय के पंखी द्वार पर टांग गया”। तब तक गंभीर टॉपिक पर चर्चा उठ जाती “ई साला सुने बिजली SDO फेर लौटा दिया, कहा ट्राँसफरमर हईए नही है अभी, बताईये तीन महीना से अँधार मेँ हैँ, साला 5000 तो खिला चुके चंदा उठाय के बिजली ऑफिस को, बहुत आफत है महराज”।

ऐसी और ना जाने कितनी बातें। जी हाँ ऐसा होता था लिट्टी, ये अंदर पेट को गर्मी देता था बाहर रिश्तों को, चर्चाओं को गर्मी देता है। ये हमारा इतना अपना था कि आज मन भावुक हो उठता है इसे खुद से दूर और पराया होता देख। आज शहर में जब इसे लिट्टी से लिट्टीज बनते देखा तो आँख भर आई। 80 रुपये में 2 पीस मिलने लगा है ये। कहाँ तो हमरे गाँव का लिट्टिया एकदम बदल गया है यहाँ आ के। हमे देख मुँह फेर लेता है। मैंने उससे कहा भी कि शहर आ के तेरी कीमत बढ़ी है पर कद छोटा भी हुआ है। हमारे यहाँ तु लिट्टी का गोला था यहाँ छोटी सी लिट्टीज की गोली हो गया है।

पर वो खुश है यहाँ। कहा “अमीरों की संगत में अब मेरा लिट्टीलाईजेशन हो गया है, इसमें कद और गुणवत्ता घटती है पर कीमत बढ़ जाती है”। कहा अब यहाँ भी लोग खाते कम और बचाने ज्यादा लगे हैं तभी तो यहाँ भी हिट हूँ । मगर लिट्टी नही जानता यहाँ लोग उसे चम्मच से खाते हैँ हम उसे मन से खाते थे। जब एक साहब को मैँने लिट्टी की पेट काँटा चम्मच भौंकते देखा तो लगा जैसे बचपन के साथी को खुखरी गँथा दी किसी ने, दिल दहल गया।

कुछ भी हो पर हाँ चलिये आज जब लिट्टी को मालपुआ और पनीर टिक्का और दाल बाटी चुरमा के साथ कतार में सजा हुआ देखता हूँ तो संतोष मिलता है कि अपना लिट्टी अब बड़ी औकात वाला हो गया। वो आज भी मेरा उतना ही लगता है जितना पहले। जय हो।

 

नीलोत्पल मृणाल

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