ग्लोबल गुमटी

मैं प्यार लिखना चाहती हूँ

मैं प्यार लिखना चाहती हूँ

‘कभी धरती के तो कभी चाँद नगर के हम हैं’ वह कविताएँ लिखता है, प्रेम बुनता है, उसके शब्दों में छिपा अपना ज़िक्र पहचानकर मुस्कुराती भी हूँ| लेकिन मैं इंतज़ार नहीं करती कि अपनी कविताओं में वो मुझे नदी, बहार, बादल या कोई और उपमा दे, मैं बस सोचती हूँ हँसते हुए कितनी मासूमियत से उसकी आँखें मूँद जाती हैं| किसी रीतिकालीन नायिका की तरह मेरी आँखों को झील सी गहरी कहे ऐसी भी कोई उम्मीद मैं नहीं रखती|

मुझे पसंद आता है यूँ ही बीच बात में अचानक उसे कॉम्प्लीमेंट दे देना| रीतिकाल से वर्तमान तक प्रेमिकाओं का रूप वर्णन और प्रेम के कसीदे पढ़े गए हैं, किसी प्रेमिका की नज़र से एक पुरुष(प्रेमी) के रूप सौन्दर्य का वर्णन न के बराबर ही रहा है| मैं कोई स्यूडो फेमिनिस्ट नहीं कि इसे स्त्री उपभोग की वस्तु नहीं कहकर सारे प्रेम पर आधारित साहित्य को हवा में उड़ा दूँ , सच पूछो तो मैं प्रेम को घनानंद की एक काव्य-पंक्ति में परिभाषित मानती हूँ-

‘अति सूधो सनेह को मारग है’

फिर भी सवाल तो उठता ही है ज़हन में कि क्या प्रेम सिर्फ पुरुषों ने किया? या सृष्टि के निर्माण के साथ सारा सौन्दर्य स्त्रियों के हिस्से आया और सारा सौन्दर्य-बोध पुरुषों के| मुझे फूल बहुत पसंद हैं, लेकिन दुकानों में सजे फूल मेरा ध्यान कभी नहीं खींचते| मुझे लगता है फूलों को उनका स्वाभाविक जीवन मिलना चाहिए, उनका वास्तविक सौन्दर्य भी वही है| ठीक वैसे ही मेरा उसके प्रति प्रेम सजावट की वस्तु नहीं, क्यारी में खिला जीवंत फूल है| मैं अनगिनत प्रेम-पत्र लिखना चाहती हूँ, क्योंकि लडकी होकर प्यार करना छिछोरी बात रही है और उसका इज़हार बेहयाई|

प्यार को लेकर समाज से हमारी लड़ाई दोतरफा नहीं चौतरफा है| सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने के लिए संघर्षरत होना अपेक्षाकृत सरल है बनिस्पत इसके कि एक लड़ाई जो निरंतर खुद से लड़ी जानी है. जो डर हमारे भीतर कूट-कूटकर भर दिए जाते हैं, उनसे लड़ना ज़रूरी होता है| दो अलग शहरों में दो जोड़ी नन्हे पैर अपनी पसंद के रंग का आकाश तलाश रहे हैं| मेरी उँगलियों पर जो तेरह शहर उसने गिने हैं, उन्हें बस नक़्शे पर ही नहीं अपनी आँखों से देखना चाहती हूँ| ऊँचे-ऊँचे पहाड़ चढ़ना चाहती हूँ, समंदर की लहरों को घंटों यूँ ही चुपचाप सुनते हुए अपने तलवों तले देर तक महसूस करना चाहती हूँ. बहुत सारी गलतियाँ करना चाहती हूँ, आधी रात किसी चौराहे पर बैठ अन्ताक्षरी खेलना चाहती हूँ, इन सबसे इतर मैं प्यार करना चाहती हूँ| मैं प्यार में दुनिया की सबसे खूबसूरत कविता लिखना चाहती हूँ|

मैं कुछ और नहीं प्यार लिखना चाहती हूँ.

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