ग्लोबल गुमटी

sahir

मैं तुम्हारा साहिर होना चाहता हूँ

मैं तुम्हारा साहिर होना चाहता हूँ..

वो दोनों मिले और सब कुछ सपने सा था. बेतकल्लुफी के रास्ते एक रिश्ता लिखा जा रहा था छंदमुक्त कविता की तरह. जब नींद किसी के एहसास में सिमटती थी और सुबह उसकी रौशनी के साथ जाती थी. जहाँ रंग बिखरे थे बेपरवाह किनारों से अलग बिना किसी तरीके के और एक एब्स्त्रक्ट सी खूबसूरती देते थे .जहाँ कुछ पिघल रहा था,  अन्दर, रिसता हुआ और बाहर  कुछ बन रहा था.

एक बेमेल रिश्ता मिल रहा था किनारों में हाथ पकड़े धीरे धीरे आकर लेते. कंधे पर मोहब्बत का दुपट्टा डाले वो उड़ रही थी उसका हाथ थामे वो मुस्कुरा रहा था. दोनों फिरते थे आवारा गुनगुनाते हुये मीर को. ठहरे पानी के दूर तक फैले नीले सन्नाटे जैसा ये साथ जिसे आँखों के कोनों से दोनों ने देखा था, जिसे मन ही मन दोनों ने सहेजा था .

और फिर एक दिन उसने कहा “मैं तुम्हारी चाहत बनना चाहता हूँ, चाह नहीं. मैं तुम्हारा साहिर होना चाहता हूँ”

कुछ टूट गया अन्दर. इश्क में साहिर, अमृता का साहिर.

“मैं मोहब्बत का कश लेना चाहता हूँ , एक लम्बा कश और फिर धुँआ कर उड़ा देना चाहता हूँ  अमृता को. बस पीछे रह जाये तुम्हारे लिखने में मेरा अक्स , उन अल्पविरामों में मेरा एहसास जहाँ रूककर तुमने अपने माथे पर गिरते बाल पीछे किये होंगे, उन अल्फाजों में मेरा जिक्र जहाँ कुछ ठिठकते हुये तुमने वही लिखा होगा जो पहले सोचा था.”

पर मैं अमृता नहीं हूँ और न ही तुम साहिर.

नहीं चाहती हूँ कि  “ फिर मिलूंगी “ की उम्मीद के सहारे किसी इमरोज़ के कैनवास पर चित्र बनते मिटते रहे.

नहीं चाहती हूँ कि किसी की पीठ पर तुम्हारा नाम उकेरूँ और फिर उन्हीं  बाहों के घेरे में तुम्हें सोचूं.

नहीं चाहती हूँ कि इंतज़ार साथ रहे बिस्तर के किनारे माथे की पट्टी बदलते और मुहब्बत रहे मन मलंग बस कविताओं में.

मैं अमृता की चाह में ढूँढ रही थी इमरोज़ को क्यूंकि गुंजाईश का  लिबास ओढ़े तो साहिर कहीं न कहीं टकरा ही जाते हैं.

मुझे सहिरों की भीड़ में इमरोज़ की तलाश है.

मैं खुद को खुद से निकाल कर वापस खुद तक ही पहुँचते थक गयी हूँ, मैं रसीदी टिकट नहीं होना चाहती हूँ.

और फिर वो पकड़ ढीली पड़ गयी, शायद अलग रास्तों पर जाने का वक़्त आ गया था.

 

डॉ. पूजा त्रिपाठी 

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