ग्लोबल गुमटी

flight

मैं आसमान में धान बो आया हूँ..

मैं आसमान में धान बो आया हूँ..

 

सामान्यतः हवाई यात्राओं पर नहीं लिखता। एक तो ये सोचकर कि, इन हवाई लोगों के लिए क्या जमीन की जुड़ी सोंधी सोंधी बातें जाया करूँ और दूसरा कारण ये रहा है कि, अमूमन इकोनॉमी क्लास की सीटें एक दूसरे से इतनी सटी होती हैं के बगल में बैठा आदमी आपकी सांसे तक गिन के बता देगा कि, आपने पूरी यात्रा में कितनी बार साँस लिया-छोड़ा और कितनी बार हवा में जहाज़ के धड़धड़ाने से आपकी साँस अटकी। पीछे बैठा यात्री भी इतना करीब होता है कि, वो न भी चाहे तो आपके बालों की रूसि गिन के बता दे। ऐसे में इन सब के बीच बैठ पोस्ट लिखना एकदम लाज टाइप लगता है, लगता है कोई वेंटिलेटर से रूम में झांक रहा है।

मैं वैसे भी जहाज़ का हमेशा से एक दर्शनीय पैसेंजर रहा हूँ क्योंकि मैं शायद एकमात्र पैसेंजर दीखता हूँ जो जहाज़ के रनवे पर पहुँच उड़ान की प्रक्रिया धरते ही दोनों हाथ जोड़ ईश्वर की प्रार्थना में लीन हो जाता हूँ, कई बार मंत्र भी बुदबुदाता हूँ,और ये तब तक करता हूँ जब तक जहाज़ अपनी ऊंचाई पकड़ स्थिर न हो जाय। मुझे ये करता देख लोग हँसते हैं, क्योंकि वो इस सत्य को जान चुके होते हैं कि अगर ऊपर आसमान में जहाज़ गड़बड़ाया तो ईश्वर भी कुछ नहीं कर सकते। पर दर्ज़नो बार हवाई यात्रा के बाद भी मेरी रेल और बस टाइप जय गणेश, हे भोलेनाथ का जयकारा लगा के यात्रा शुरू करने की आदत नहीं गयी। ये मेरी आस्था की पराकाष्ठा है और आस्तिकता की कसौटी। मुझे भरोसा रहता है कि ईश्वर ऊपर ही तो रहता है फिर उपरे के मामले में कैसे नहीं सुनेगा और बचाएगा?

खैर, आज मन ये किया कि डायरेक्ट जहजिया से लिखूं तो एक बार।

मेरे ठीक बगल में भर अंगुली सोना का अंगूठी में हर ग्रह का उपाय वाला पत्थर पहिन एक बिजनेसमेन बैठे हैं। मुझे ये देख संतोष हुआ की वक़्त पर मूड खराब होने पर साधन संपन्न लोगो का भी ग्रह ठीक उसी तरह उखाड़ता है जैसे कोई दारोगा,बाहुबली गरीब गेरूआ का झोंपड़ी।वर्ना दुनिया तो पैसे वालों को तो अजातशत्रु मान के चलती है।

फ्लाइट अभी टेक ऑफ हुई है कि बगल वाले धनाढ्य व्यापारी ने मुझ से पूछा है “आप राँची जा रहे हो?” “काहे बीच में दू चार और स्टॉपेज है क्या इसका?” -मैंने अकबका के पूछा है। इस पर बड़ी लजियायी सी हंसी के साथ मुहवा घुमा लिया है और एयर होस्टेस की तरफ देख बड़े अदब से मुस्कुराया है। बड़े लोग बेवजह हंसी नहीं खर्च करते, सो उसे हँसता देख एक थकी सी वायु परिचारिका उसके पास आई है “या,एनीथिंग यू वांट सर?” मुझे लगा यार ये ग्रामर के हिसाब से गलत अंग्रेजी बोली। पर तुरंत ख़याल आया के ये हमारी वाली पास करो, पास करो वाली स्कूल की अंग्रेजी नहीं जिसके एक ग्रामर मिस्टेक से नाना कह देते थे-“अंग्रेजी ठोस करो,ग्रामर सीखो।” ये बाजार की अंग्रेजी है और बाज़ार हर ग्रामर और व्याकरण से मुक्त है, यही तो है मुक्त बाज़ार, खुली दुनिया और इसका नंगा व्यापार।

तब तक बगल वाले ने एक पेपर बोट जूस ले लिया है। बड़ा धीरे धीरे पी रहा है, जूस सतुआ की तरह थोड़े पिया जाता है और वो भी जहाज़ में हों तो तब तो पीने का अंदाज़ ऐसा तो होना ही चाहिए की देखने वाले को लगे जूस पी पी के अघाया हुआ आदमी है, देखिये न। अरे उ त बस टाइम पास के लिए ले लिया हल्का हल्का पीने को, किसी दलिद्र को देखिएगा, एके बार में गटगटा के पी जाता। बड़े लोगो के खाने पीने में एक लालित्य होता है, मुँह के चलने में एक आरोह अवरोह होता है। हम चबेना चबाने वाले जैसा नहीं चलता हबर हबर उनका हाथ मुँह।

खैर,जूस पी के आये आत्मविश्वाश को बटोर उसने फिर मुझ से पूछा है “क्या करते हो भाई आप?” मैंने जो बोला है, सुन जूस पानी में बदल गया होगा “जी सर,सर मैं हिंदी का साहित्यकार हूँ,और बतौर पेशा किसानी करता हूँ,खेती बाड़ी का काम है।” सुनते ही वो उचक के बोला है “व्हाट?आप किसान हो?” मैंने हुमच के कहा है “हाँ आप एक किसान के साथ बैठे हैं जहाज़ में।” उसने पूछा है फिर “कितना कमा लेते हो?” मैं गजबे कॉन्फिडेंस में बोला हूँ “जेतना में आराम से जहाज़ में घूम फिर सकूँ।” फिर मैंने उसे अपनी कई हवाई यात्राओं का वृतांत सुना दिया है, ये भरोसा दिलाने के लिए कि ये मेरी पहली यात्रा नहीं और जब ये यक़ीन हो गया तो किसानी की कई गूढ़ बातें की है, रोपाई-कटाई से लेकर माटी गुड़ाई पर बात कर दी है, जिससे इसे ये भी तो भरोसा हो जाय की सच में किसान ही हूँ और एक किसान है उसके साथ कन्धा सटाये इस जहाज़ी यात्रा में।

मैंने उससे अपने किसान होने की बात, जाहिर है कि झूठ कही है। पर आज मैं ये झूठ बोलना चाहता हूँ, एक अजीब सा सुकून खोज रहा हूँ इस झूठ के पार। किसान नाम सुनते ही, एक फंदे पर झूलती आत्महत्या वाली लाश का चित्र खींचते हैं लोग। अखबार से लेकर फेसबुक या न्यूज़ चैनल सब के लिए किसान का मतलब है, दुनिया भर की भूख मिटाने को अन्न उपजाते किसान का खुद भूख झेलते,भीख मांगते मर जाने का किस्सा। जिस किसान के हाथ जीवन भर “हल” होता है, उसी की समस्याओं का कोई “हल” नहीं निकल पाता। वो आलू उपजाता है, आप हम उसी के आलू की चिप्स खाते हैं और वो उसी आलू का छिलका खा सोता है।

हम आप अब ऐसी तस्वीरें देखने के आदी हो चुके हैं साब। अब एक किसान का मरना कोई सनसनी नहीं। सनसनी तो था,एक किसान का जहाज़ पर उड़ना।

मैंने उस बड़े व्यापारी को एक किसान से दाब दिया है । मैं जानता हूँ की इससे क्या होना,पर रोज़ रोज़ ये मरने के किस्सों से भी क्या बदलना? संपन्नता आयेगी-जायेगी पर एक किसान अपनी छवि क्यों तार तार कर, अपना आत्मसम्मान क्यों गाड़ दे इस वैभवशाली दुनिया के पिछवाड़े किसी खेत में? अरे किसान भी उड़ सकता है साब। मैंने उस बड़े आदमी के मस्तिष्क में एक हँसते घूमते किसान का चित्र बो दिया है। मैंने उसकी दिवाली वाली उत्सवधर्मिता का सत्यानाश कर दिया है जब वो काजू की बर्फी खाते हुए अपने ड्रॉइंग रुम की बैठक में अपने साथी पेट भर बुद्धिजीवी दोस्त के मुंह किसी मरते किसान की चर्चा पर उसे बौद्धिक विलास करता सुनेगा तो वो उछल के रोकेगा उसे। वो कहेगा “हर किसान मरने को पैदा नहीं होता, उसके मन वो तस्वीर बो आया हूँ मैं।”

हाँ मैं आसमान में उसके साथ उड़ान पर हूँ, मैं नहीं मरने वाला फंदे पर झूल के, नहीं मरेगा कोई मेहनतकश यूं हार के। मैं आसमान में धान बो आया हूँ, मैं उस उड़ते आदमी को जमीन पर ले आया हूँ।

जय हो।

 

नीलोत्पल मृणाल

 

7 Comments on “मैं आसमान में धान बो आया हूँ..

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