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चीन मालिनी अवस्थी

चीन : मालिनी अवस्थी जी की नजर से…

यदि संभव हो, तो हर भारतीय को चीन ज़रूर जाना चाहिए। चीन देखने के बाद बहुत सी बातों को देखने समझने का आपका नजरिया हमेशा के लिए बदल जायेगा।

भारत 1947 में आज़ाद हुआ और चीन जो जापान के साथ द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका में और आतंरिक संघर्षों के कारण लगभग बर्बाद हो गया था, वहाँ 1949 में, कम्युनिस्ट शासन स्थापित हुआ। गरीबी, कुपोषण, अनियंत्रित जनसँख्या, महामारियाँ और खस्ती आर्थिक व्यवस्था किसी भी देश के लिए बड़ी चुनौती थीं लेकिन चीन ने दृढ़ता से सबका मुक़ाबला किया और वह भी किस तरह!! आज चीन की तरक्की की कहानी सबके सामने है। शंघाई में तरक्की का जो नज़ारा देखा तो अमरीका की चमक उसके आगे फीकी लगी। तकनीक, अनुशासन, व्यापार, समृद्धि और सफलता की चमक से दमकता चीन देखकर सलाम करने को जी चाहा।

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सिर्फ अपनी मातृभाषा मैंडरिन और कॅन्टोनीज़ को ही आधार मानकर और बिना अंग्रेज़ी शिक्षा के अपनी तकनीक और शिक्षण व्यवस्था को दृढ़ता से संचालित कर के चीन ने मिसाल रखी है। इंग्लिश न जानने के कारन भाषाई समस्या वाक़ई आड़े आती है। (अधिकतर इशारों से, हाव-भाव से अपनी बात बतानी पड़ती थी)

इसके अलावा ख़ास बातें जो मुझे चीन में लगीं, और सभी को जाननी चाहिए वो यह कि वहां फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब, गूगल और लगभग तीन हज़ार वेबसाइट्स सब निरस्त हैं, बैन हैं। सिर्फ इसलिए, क्योंकि इनका नियंत्रण अमेरिका से चलता है और चीन अपने देश की गोपनीयता और नियंत्रण बनाये रखना चाहता है। फेसबुक की तरह चीन में खुद की सोशल साईट हैं, स्वनियंत्रित सर्च इंजन हैं जहाँ से नेट पर जानकारियां हांसिल की जा सकती हैं। टीवी पर लगभग साठ सत्तर चैनल हैं लेकिन, एक भी नकारात्मक समाचार आप को नहीं दिख सकता।

चीन में कम्युनिस्ट शासन को लेकर सभी के मन में उत्सुकता और एक पूर्वाग्रह रहता है, मुझमे भी था शायद। लेकिन शंघाई देखकर और रहकर, बहुत से भ्रमों का निवारण हो गया। दुनिया वैश्वीकरण को बढ़ गई है, और आज सफल होने के लिए समय के साथ क़दम मिलाना किसी भी देश की ज़रुरत है, इस बात को चीन ने बखूबी समझा है लेकिन यह उन्होंने किया है सख्ती और उदारता के अद्भुत समन्यव से। शंघाई में प्रत्यक्षतः हर तरह की आज़ादी दिखी, युवा जोड़े भी दिखे, आधी रात में सड़क पर चलती युवा लड़कियां भी दिखीं, फैशन की इंतेहा दिखी, सफ़लता की चमक से दमकते कामकाजी चीनी स्त्री और पुरुष चारों और दिखे। अपनी भाषा, अपनी परम्पराओं के प्रति आदर, संस्कृति के प्रति गर्व एक ज़िद की तरह उसका पालन करने का अभिमान, अथाह सामान, अथाह समृद्धि, और अथाह परिश्रम; ऐसा है चीन।

देश ऐसा ही होना चाहिए, आज के चीन जैसा। परम्पराप्रिय होते हुए भी आधुनिक, सख्तअनुशासनप्रिय और निज हितों के प्रति आग्रही!
चीन हमसे बहुत बहुत आगे निकल गया। हाँ यह सच है कि हमने भी चहुँमुखी प्रगति की है लेकिन बहुत कमियाँ हैं। कार्यान्वयन में, अनुशासन में। एकता में।

मालिनी अवस्थी जी की वाल से साभार.

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