ग्लोबल गुमटी

पहाड़े

पहाड़ों का गुणा-गणित

आरंभिक शिक्षा-दीक्षा कॉन्वेंट में हुई हो या किसी कनसेरवा राजकीय विद्यालय में ,गणित में कमज़ोर हो या मज़बूत, कैरियर तकनीकी क्षेत्र में बने या ग़ैर-तक़नीकी क्षेत्र में – हममें से शायद ही कोई ऐसा होगा जिसके स्कूली बचपन को पहाड़े के पहाड़ पर कभी न कभी चढ़ाया न गया हो … एक अजीब सी दुविधा से मन दो चार हुआ था जब दो दूनी चार ने गिनती सीख के वर्ल्ड कप ट्रॉफी उठाने वाली फ़ीलिंग को पहली बार ग्रस लिया था … तब पहली बार समझ में आया था कि ये गणित तो हमारे साथ कुछ और ही गणित करने की तैयारी में है …

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जहाँ तक मेरा सवाल है , मुझे स्कूल के गणित वाले गुरूजी अचानक से किसी हिन्दी फ़िल्म की लव स्टोरी के खलनायक की तरह लगे थे … अभी तो “उनसठ-उनहत्तर-उन्यासी-नवासी” के गठबंधन को ठीक समझ भी न पाया था कि पहाड़ों ने मेंरी बाल-मनः सरकार को अल्पमत में लाने की कोशिश शुरू कर दी थी … दिल सिहर उठता था जब भी कोई नया पहाड़ा याद करने को दिया जाता … मरता क्या न करता – मैंने ब्रह्म-मुहूर्त में सप्तम् सुर में पहाड़ा-पाठ करना शुरू कर दिया …

पहाड़ों के साथ अलग अलग अनुभव हुए … जहाँ 2,3 और 4 के पहाड़ों से एक अपनापन और बेफ़िक्री दिखती (जल्दी याद होने के कारण) तो वहीं 5 और 15 के पहाड़े संगीत से लगते…10 और 20 तो समझो गऊ माता की तरह सीधे – मैं बोल उठता – ‘हाय ! दुनिया से सारे पहाड़े तुम जैसे क्यों न हुए ?’ … और 13 , 17 और 19 …? राम-राम ..! महा-दुष्ट ! मुए सारी खुशियों में आग लगाने को अकेले-अकेले ही काफ़ी थे …

समय बदला और मैं धीरे-धीरे उनके ज़ुल्मो-सितम सह-सह कर प्राइमरी से माध्यमिक और फ़िर हायर सेकेंड्री से कॉलेज में आ गया … तब पहली बार मेरे मन ने बगावती तेवर दिखाये थे … क्यों रटवाना इन पहाड़ों को … वो भी 20 तक … अरे ! बेसिक्स सही करवा के अप्लाइड मैथ्स क्यों नहीं पढ़ाता हमारा सिस्टम … क्यों हमें कोल्हू के बैल की तरह जोत दिया गया इन पहाड़ों का कारिंदा बना के …अपने आप को जवाब देता कि चाहे जो हो जाये ये अत्याचार अपनी अगली पीढी के साथ नहीं होने दूँगा … तब मुझे क्या पता था कि मेरी सोंच और समझ की एक और करवट अभी बाकी है…

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आज जब जीवन के तीसरे दशक में घुसे चार साल हो गये तो यही लगता है कि वो भी क्या दिन थे … अनुशासन की पहली सीढ़ी थे पहाड़े … हममें तर्क विकसित करवाने की पहली कोशिश – कि 3 का 4 से गुणा करो या 4 का 3 से उत्तर एक ही होगा … पहाड़ों ने मुझे ये सिखाया की कैसे अप्लायड साइन्स के लिये कुछ बेसिक साइन्स का याद होना भी ज़रूरी है … कैसे कुछ सिम्बल्स का याद रहना कॉन्सेप्ट के लिये ज़रूरी है … प्रत्यक्ष रूप से तो कम लेकिन परोक्ष रूप से मुझे मेरी ज़िन्दगी का पाठ पढ़ा गये वो पहाड़े … और वो गणित वाले गुरूजी तो आज भी मुझे अमरीश पुरी ही लगते है – सिर्फ़ “मिस्टर इण्डिया ” और “घायल ” वाले नही बल्कि “मोहब्बत” और “मुहब्बतें” वाले भी …

 Manu Aashishमनु रीता आशीष

लेखक मूलतः बिहार के सासाराम से हैं और पेशे से इंजीनियर हैं| फिलहाल दिल्ली में कार्यरत हैं|
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